पाकिस्तान ने शुक्रवार (27 फरवरी) को काबुल और दो दूसरे अफगान प्रांतों पर भीषण बमबारी की। यह हमला अफगानिस्तान के पाकिस्तानी सैनिकों पर बॉर्डर पार से हमला करने के कुछ ही घंटों बाद किया गया। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इस स्थिति को अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के साथ ‘खुली जंग’ बताया। पाक ने पहले ही आरोप लगाया था कि अफगानिस्तान पाकिस्तान के अंदर हमले करने वाले मिलिटेंट्स को पनाह देता है। लेकिन दोनों देशों के बीच के मुद्दे इतिहास में बहुत पुराने हैं।

1947 के बाद से कुछ समय को छोड़कर पाकिस्तान-अफगानिस्तान के रिश्ते आपसी अविश्वास, दुश्मनी, आरोप-प्रत्यारोप और दुश्मनी से भरे रहे हैं। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच यह नेगेटिविटी पहले वाले में सिविलियन और सीधे मिलिट्री शासन के दौरान, और दूसरे वाले में बुनियादी सिस्टम बदलावों, उथल-पुथल और दो नाकाम सुपरपावर दखल के दौरान भी जारी रही है। सोवियत यूनियन (1979-1989) और यूनाइटेड स्टेट्स (2001-2021) द्वारा। दोनों ही समय में पाकिस्तान ने अफगान विरोध में मदद की है।

अफगानिस्तान में राजशाही में बदलाव

अफगानिस्तान में 1973 में राजशाही खत्म हुई और कुछ समय के लिए राष्ट्रवादी राज रहा। इसके बाद 1989 तक 11 साल तक कम्युनिस्ट सरकार रही। इस दौरान सरकार ने समाज और राजनीति को बदलने की नाकाम कोशिश की। इसके बाद तीन साल तक राष्ट्रवादी प्रेसिडेंट नजीबुल्लाह का राज रहा, जो 1992 में खत्म हो गया। इसके बाद पहले के मुजाहिदीन और तालिबान के बीच 9 साल तक सिविल वॉर चला। ये दोनों 1994 में सामने आए और पाकिस्तान की मदद से 1996 में काबुल समेत अफगान इलाके के बड़े हिस्से पर तेजी से कब्जा कर लिया।

11 सितंबर 2001 को अल-कायदा के आतंकवादी हमलों की वजह से 2001 के आखिर में अमेरिका के हमले से तालिबान को अफ़गानिस्तान से पाकिस्तान खदेड़ दिया गया। अमेरिका ने एक इस्लामिक अफगान रिपब्लिक बनाया, जो अपनी जड़ें नहीं जमा पाया। अपनी तरफ से अमेरिकी सेना तालिबान के विद्रोह को हराने में नाकाम रही। हार मानकर अमेरिका अगस्त 2021 में अफगानिस्तान से वापस चला गया। तालिबान ने फिर से पाकिस्तान की मदद से अपने अफ़गान दुश्मनों को मिलिट्री की मदद से हरा दिया और इस बार पूरे अफगानिस्तान पर शासन करने लगा।

कई बड़े मुद्दे

अफगानिस्तान और पाकिस्तान को बांटने वाले मुद्दे अफ़गानिस्तान के डूरंड लाइन को इंटरनेशनल बॉर्डर मानने से इनकार करने से लेकर, ट्रांज़िट और ट्रेड पर कंट्रोल, और इस्लामिक आस्था के बंधनों के बावजूद सामाजिक मतभेदों तक हैं। अफगान सरकारों और लोगों में इस बात का लगातार गुस्सा है कि पाकिस्तान ने बिना सोचे-समझे उन्हें कंट्रोल करने और उनका फ़ायदा उठाने की कोशिश की है। खासकर जब से उनका राजशाही सिस्टम खत्म हुआ है।

पाकिस्तान अफगानों को अहसानफरामोश (एहसान फरामोश) मानता है। पाक का मानना है कि उन्होंने लाखों अफ़गान शरणार्थियों को पनाह दी और अफ़गान विद्रोहियों को दो सुपर पावर को हराने में मदद की लेकिन आखिर में भारत का साया हमेशा अफ़गान-पाकिस्तान के आपसी रिश्तों पर मंडराता रहा है।

डूरंड लाइन पर मसला गंभीर

अफ़गान पश्तूनों के लिए 2,640 km की डूरंड लाइन एक ऐतिहासिक जख्म है। इसका नाम ब्रिटिश इंडिया के विदेश सचिव सर मॉर्टिमर डूरंड के नाम पर पड़ा, जिन्होंने 1893 में अफगान शासक अमीर अब्दुल रहमान खान को अपने इलाकों का बँटवारा मानने के लिए मजबूर किया था। इसका मतलब पश्तून कबीलों का बँटवारा भी था जो तब तक उनके सब्जेक्ट थे। डूरंड लाइन पर हाल ही में एक थीसिस में अफगान विद्वान नबी साहक ने सही बताया है कि डूरंड लाइन का असली मकसद ब्रिटिश और अफ़गान प्रभाव वाले इलाकों का एक ज़ोन तय करना था। यह लाइन पाकिस्तान और पश्चिम में मौजूदा आम सोच के उलट, एक परमानेंट इंटरनेशनल बॉर्डर बनाने के लिए नहीं थी।

हालांकि एक बार तय होने के बाद भारत के ब्रिटिश शासकों ने इसे एक परमानेंट इंटरनेशनल बॉर्डर माना। पाकिस्तान ने भी अपने बनने के समय यही माना था। अफगानिस्तान ने उस मतलब को मानने से मना कर दिया। 1947 में ब्रिटेन के भारत से जाने से पहले अफ़गानिस्तान ने उससे डूरंड लाइन एग्रीमेंट छोड़ने की गुज़ारिश की। इसका मतलब यह होता कि ब्रिटिश इंडिया को दी गई सारी पश्तून जमीनें अफगानिस्तान को वापस मिल जातीं, जिससे सिंधु नदी असल में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बॉर्डर बन जाती। ब्रिटिश ने ऐसा करने से मना कर दिया। नतीजतन अफगानिस्तान अकेला ऐसा देश बन गया जिसने UN में पाकिस्तान की एंट्री का विरोध किया।

राजा जाहिर शाह के चचेरे भाई और 1953-63 तक प्रधानमंत्री रहे दाउद खान ने पश्तूनिस्तान के मकसद का समर्थन किया। इसका मकसद पाकिस्तान की सारी पश्तून जमीनों को अफ़गानिस्तान में मिलाना था। 1961 में दोनों देशों के बीच दुश्मनी शुरू हो गई। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के साथ अपना जमीनी बॉर्डर बंद कर दिया, जिससे कमी हो गई। इससे अफ़गानिस्तान अपने दूसरे पड़ोसी सोवियत यूनियन पर और ज़्यादा डिपेंडेंट हो गया। दाउद ने ज़ाहिर शाह को हटाकर 1973 में प्रेसिडेंट बन गए। उन्होंने पश्तूनिस्तान के आइडिया को फिर से शुरू किया, लेकिन पाकिस्तान के परेशानी खड़ी करने और बॉर्डर फिर से बंद करने की वजह से उन्हें इसे छोड़ना पड़ा। 1976 तक दाउद और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने आपसी रिश्ते नॉर्मल कर लिए थे, लेकिन उनसे पहले और बाद के दूसरे प्रधानमंत्री की तरह दाउद ने डूरंड लाइन को इंटरनेशनल बॉर्डर नहीं माना। असल में जब पाकिस्तान ने 2018 में खैबर-पख्तूनख्वा की कबायली एजेंसियों को खत्म किया, तो उस समय के अफगान राष्ट्रपति अशरफ़ गनी ने ऑफिशियली विरोध किया।

ट्रेड और ट्रांज़िट पर मुश्किल

अफगानिस्तान जमीन से घिरा हुआ है। इसके मुमकिन ट्रांज़िट रूट पाकिस्तान, ईरान और सेंट्रल एशियन रिपब्लिक से होकर जाते हैं, जो पहले सोवियत यूनियन का हिस्सा थे। इनमें से पाकिस्तान का रूट ज़्यादा पसंद किया जाता है। सभी अफगान सरकारें चाहती हैं कि पाकिस्तान भारत-अफ़गान ट्रेड को वाघा से अफगानिस्तान तक सड़क के रास्ते जाने दे, लेकिन पाकिस्तान ने ज़िद करके भारतीय एक्सपोर्ट को और असल में भारतीय मदद को इस रास्ते से जाने से मना कर दिया है। इससे अफगानिस्तान में नेगेटिव भावनाएँ पैदा हुई हैं।

हालांकि ज़्यादा गुस्सा तब होता है जब पाकिस्तान ज़मीन के रास्ते या कराची पोर्ट के जरिए सामान को अफ़गानिस्तान में आने से रोकता है। इस तरह पाकिस्तान कनेक्टिविटी और ट्रांज़िट को ज़बरदस्ती के तरीके के तौर पर इस्तेमाल करता है।

पश्तून-पंजाबी बंटवारा

पश्तूनों और सिंधु नदी के दक्षिण और पूरब में रहने वाले लोगों के रहन-सहन के तरीकों में ऐतिहासिक अंतर रहे हैं। यह सच है कि पाकिस्तान सरकार ने अपने KP प्रांत में कई पठानों को शामिल किया है और KP और अफ़गान मूल के पठानों की बड़ी आबादी है। पाकिस्तानी पठानों ने, अपने अफ़गान भाइयों के सपोर्ट से पंजाब के दबदबे वाले पाकिस्तान सरकार और सेना द्वारा कबायली एजेंसियों को खत्म करने को अपने रहन-सहन का अपमान माना है। यही एक वजह है कि अफ़गान पश्तून तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को अपना रिश्तेदार मानते हैं। आज यही असली झगड़े की वजह है।

‘शुक्रिया’ का सवाल बड़ा

पाकिस्तान को लगता है कि उसने सोवियत के खिलाफ़ अफ़गान जिहाद के दौरान अफ़गान शरणार्थियों और सात मुजाहिदीन ग्रुप्स को पनाह दी थी। लेकिन ऐसा न होता, तो अफ़गानिस्तान पूरी तरह से सोवियत के पैरों तले आ गया होता। उसे यह भी यकीन है कि उसकी मदद से ही तालिबान अमेरिका को हरा पाया। इसलिए ऐसा लगता है कि अफ़गानिस्तान के मौजूदा शासकों और लोगों को उसका शुक्रगुजार होना चाहिए। दूसरी ओर अफ़गान लोग पाकिस्तान में अपने साथ हुए बर्ताव से नाराज हैं, और मानते हैं कि इन समयों के दौरान इस्लामाबाद की नीतियों ने उसके अपने फ़ायदे पूरे किए। इसलिए पाकिस्तान का शुक्रगुजार होने की मांग गलत है।

भारत का एंगल क्या है?

पाकिस्तान को हमेशा डर रहा है कि भारत और अफगानिस्तान एक ही समय में उस पर दबाव डालेंगे। इसलिए वे चाहते हैं कि अफगान भारत के साथ अपने रिश्ते कम रखे। लेकिन कोई भी अफगान सरकार नहीं चाहती कि उसकी विदेश नीति के फ़ैसले इस्लामाबाद में लिए जाएं। यह दोनों देशों के बीच हमेशा तनाव का एक कारण है। आज पाकिस्तान को यकीन है कि तालिबान भारत के लिए दरवाज़ा खोलकर पाकिस्तान के फ़ायदों को नुकसान पहुंचा रहा है और यह उनके लिए माफ़ न की जा सकने वाली नाशुक्री है। पढ़ें पाकिस्तान के खिलाफ अफगान सेना ने शुरू किए जवाबी हमले

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अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच छिड़े युद्ध से दोनों देशों को भारी नुकसान हुआ है। इन दावों के बीच एक बड़ा सवाल उठ रहा है- आखिर सैन्य रूप से ज्यादा मजबूत कौन है? पाकिस्तान या अफगानिस्तान? किसकी सेना, हथियार और रणनीतिक स्थिति ज्यादा प्रभावशाली है? पढ़ें पूरी खबर