क्या मानव सभ्यता अपने विकास के सबसे निर्णायक मोड़ पर खड़ी है? यह प्रश्न अब केवल पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों या नीति-निर्माताओं तक सीमित नहीं रह गया है। हिमालय के सिकुड़ते ग्लेशियर, लगातार बढ़ती हीटवेव, असामान्य वर्षा, घटती जैव-विविधता, सूखते जलस्रोत और तेजी से बदलती जीवनशैली मिलकर एक ऐसे भविष्य की ओर संकेत कर रहे हैं, जहां पर्यावरण का प्रश्न सीधे मानव अस्तित्व, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता से जुड़ जाता है।
विश्व पर्यावरण दिवस 2026 के अवसर पर देश के विभिन्न क्षेत्रों के पांच प्रतिष्ठित विशेषज्ञों – पर्यावरणविद् डॉ. वंदना शिवा, जल संरक्षण के क्षेत्र में पद्मश्री से सम्मानित जलयोद्धा उमा शंकर पांडेय, पर्यावरणविद् एवं सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत सिन्हा, अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त भूगोलवेत्ता एवं प्राकृतिक आपदा विशेषज्ञ प्रो. रूपेंद्र सिंह और शिक्षाविद् एवं सामाजिक चिंतक डॉ. बीरबल झा – से बातचीत के दौरान एक बात बार-बार उभरकर सामने आई कि पर्यावरणीय संकट अब भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता है।
दुनिया क्या कह रही है?
विशेषज्ञों की चिंताएं केवल भारत तक सीमित नहीं हैं। पिछले कुछ वर्षों में संयुक्त राष्ट्र, विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की रिपोर्टों ने भी इसी दिशा में गंभीर संकेत दिए हैं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन की 2025 में जारी “स्टेट ऑफ द ग्लोबल क्लाइमेट” रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 वैश्विक स्तर पर अब तक का सबसे गर्म वर्ष दर्ज किया गया। वैश्विक औसत तापमान औद्योगिक क्रांति-पूर्व काल की तुलना में लगभग 1.55 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। रिपोर्ट में समुद्र के बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और समुद्र-स्तर में लगातार वृद्धि को मानवता के लिए गंभीर चेतावनी बताया गया है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की नवीनतम Emissions Gap Report के अनुसार वर्तमान नीतियों और उत्सर्जन की प्रवृत्तियों को देखते हुए दुनिया अभी भी उस रास्ते पर नहीं है जो वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रख सके। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि यदि देशों ने ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तेज और व्यापक कटौती नहीं की, तो इस सदी के मध्य तक जलवायु जोखिम और अधिक गंभीर हो सकते हैं।
जैव-विविधता के मोर्चे पर भी स्थिति चिंताजनक है। संयुक्त राष्ट्र समर्थित वैश्विक आकलनों ने संकेत दिया है कि मानव गतिविधियों के कारण लाखों प्रजातियां अस्तित्व के संकट का सामना कर रही हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि जैव-विविधता का नुकसान केवल वन्यजीवों का संकट नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर खाद्य सुरक्षा, जल सुरक्षा, कृषि और मानव स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।
डॉ. वंदना शिवा मानती हैं जैव-विविधता का क्षरण सबसे बड़ा खतरा
क्वांटम फिजिक्स और दर्शनशास्त्र में डॉक्टरेट डॉ. वंदना शिवा देश की प्रमुख पर्यावरणविद्, लेखिका, और खाद्य संप्रभुता की वैश्विक पैरोकार रही हैं। जैव-विविधता, बीज संरक्षण, किसानों के अधिकारों और टिकाऊ कृषि पर चार दशकों से अधिक समय से काम कर रही डॉ. वंदना शिवा मानती हैं कि मानवता के सामने सबसे बड़ा संकट जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण या जल संकट नहीं, बल्कि जैव-विविधता का क्षरण है। उनके अनुसार जल संकट, खाद्य असुरक्षा और जलवायु परिवर्तन जैसे अधिकांश संकट अंततः जैव-विविधता के नष्ट होने से जुड़े हुए हैं।
वे याद दिलाती हैं कि हिमालयी क्षेत्रों में जंगलों की कटाई और प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र के कमजोर होने से जलस्रोतों पर गहरा असर पड़ा है। उनका स्पष्ट मत है कि यदि मानव समाज प्रकृति की मूल शक्तियों और उसकी विविधता को नज़रअंदाज़ कर केवल तकनीकी समाधानों पर भरोसा करेगा, तो समस्याएं और गंभीर होंगी।
आज जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), जीन-संपादित फसलें और कॉर्पोरेट कृषि वैश्विक बहस के केंद्र में हैं, डॉ. शिवा चेतावनी देती हैं कि तकनीक प्रकृति का विकल्प नहीं बन सकती। उनका कहना है कि प्रकृति से संबंध मजबूत करना ही समाधान है। वे बच्चों को प्रकृति से जोड़ने, स्कूलों में प्रकृति आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने और स्थानीय बीजों तथा पारंपरिक कृषि ज्ञान को संरक्षित रखने की आवश्यकता पर बल देती हैं। उनके शब्दों में, “प्रकृति से रिश्ता और तगड़ा करना होगा।”
डॉ. शिवा की सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी यह है कि पर्यावरणीय संकट को भविष्य का संकट मानना एक भ्रम है। उनके अनुसार संकट पहले से मौजूद है और लगातार गहरा होता जा रहा है। विश्व पर्यावरण दिवस पर उनका संदेश भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ा है—”प्रकृति रक्षति रक्षिता”। अर्थात यदि हम प्रकृति की रक्षा करेंगे तो प्रकृति हमारी रक्षा करेगी।
यदि डॉ. वंदना शिवा जैव-विविधता को संकट की जड़ मानती हैं, तो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भूगोलवेत्ता और प्राकृतिक आपदा विशेषज्ञ डॉ. रूपेंद्र सिंह जलवायु परिवर्तन को वर्तमान समय की सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौती बताते हैं। उनके अनुसार जलवायु परिवर्तन अब केवल तापमान वृद्धि का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि जल, खाद्य, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा बहुआयामी संकट बन चुका है।
हिमालय दक्षिण एशिया की जल सुरक्षा और करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार है
डॉ. सिंह विशेष रूप से हिमालय को लेकर चिंतित हैं। उनका कहना है कि हिमालय केवल एक पर्वत श्रृंखला नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की जल सुरक्षा, जैव-विविधता और करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार है। ग्लेशियरों में तेजी से हो रहे परिवर्तन, हिमनदीय झीलों का विस्तार और उनसे जुड़े भू-जोखिम भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी हैं। वर्ष 2021 की ऋषिगंगा-धौलीगंगा आपदा का उदाहरण देते हुए वे बताते हैं कि बढ़ते तापीय परिवर्तन और अस्थिर हिम संरचनाएं भविष्य में प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता को और बढ़ा सकती हैं।
उनका मानना है कि हीटवेव, फ्लैश फ्लड, अत्यधिक वर्षा, लंबे सूखे और मौसम की अनिश्चितता अब धीरे-धीरे “न्यू नॉर्मल” बनते जा रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण वायुमंडल में अधिक ऊर्जा और नमी उपलब्ध हो रही है, जिससे चरम मौसमीय घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ रही हैं। वर्ष 2050 की ओर देखते हुए वे जल संकट, खाद्य असुरक्षा, जलवायु प्रवासन, स्वास्थ्य जोखिम और प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती तीव्रता को सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल करते हैं।
पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत सिन्हा इस संकट को आधुनिक विकास मॉडल और बढ़ते उपभोग से जोड़कर देखते हैं। उनके अनुसार जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि वर्तमान का अनुभव है। रिकॉर्ड तोड़ गर्मी, असामान्य वर्षा और चरम मौसमी घटनाएं इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। वे मानते हैं कि औद्योगिक क्रांति के बाद से प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की गति लगातार बढ़ी है और आधुनिक उपभोग आधारित जीवनशैली ने इस संकट को और गहरा किया है।
प्रशांत सिन्हा के अनुसार तकनीकी और औद्योगिक प्रगति ने जीवन को सुविधाजनक अवश्य बनाया है, लेकिन इसकी एक बड़ी कीमत पर्यावरण को चुकानी पड़ रही है। उनका मानना है कि यदि कार्बन उत्सर्जन में कमी नहीं आई और जैव-विविधता के नुकसान की वर्तमान गति जारी रही, तो वर्ष 2050 तक पृथ्वी मानव जीवन के लिए उतनी अनुकूल नहीं रह जाएगी जितनी आज है। वे तापमान वृद्धि, समुद्र-स्तर में बढ़ोतरी, कृषि उत्पादन में अस्थिरता और जल तथा ऊर्जा के लिए बढ़ते संघर्ष को भविष्य की गंभीर चुनौतियों के रूप में देखते हैं।
जल संकट के मुद्दे पर पद्मश्री से सम्मानित जलयोद्धा उमा शंकर पांडेय का दृष्टिकोण विशेष महत्व रखता है। पिछले तीन दशकों से “खेत पर मेड़, मेड़ पर पेड़” अभियान के माध्यम से जल संरक्षण पर काम कर रहे पांडेय कहते हैं कि पानी का प्रश्न अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का प्रश्न बनता जा रहा है। उनके अनुसार भारत के अनेक हिस्सों में पानी की कमी मौसमी समस्या न रहकर सालभर की वास्तविकता बन चुकी है।
बुंदेलखंड का उदाहरण देते हुए वे बताते हैं कि जल संकट केवल पानी की कमी तक सीमित नहीं रहता; यह कृषि, रोजगार, पलायन और सामाजिक स्थिरता को भी प्रभावित करता है। उनका कहना है कि जल संकट का सीधा संबंध खाद्य सुरक्षा से है। यदि जल उपलब्धता लगातार घटती रही, तो खाद्यान्न उत्पादन पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
उमा शंकर पांडेय हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने, नदियों के बदलते स्वरूप और तेजी से बढ़ते शहरीकरण को भविष्य की जल सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा मानते हैं। उनके अनुसार पानी का संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है; इसे जन आंदोलन का रूप देना होगा। वे कहते हैं कि जल संरक्षण को अभियान नहीं, जीवनशैली बनाना होगा। उनके शब्दों में, “पानी सिर्फ एक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है।”
पर्यावरणीय संकट के सामाजिक और सांस्कृतिक आयामों पर शिक्षाविद्, साहित्यकार और सामाजिक चिंतक डॉ. बीरबल झा विशेष ध्यान आकर्षित करते हैं। उनका मानना है कि पर्यावरण संकट केवल वैज्ञानिक या सरकारी विषय नहीं है, बल्कि यह सामाजिक व्यवहार, जीवनशैली और सांस्कृतिक मूल्यों से भी गहराई से जुड़ा हुआ प्रश्न है।
डॉ. झा के अनुसार शिक्षा व्यवस्था अभी इस चुनौती का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है। विद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा दी जाती है, लेकिन वह अक्सर पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित रह जाती है। वे कहते हैं कि जब तक पर्यावरणीय चेतना को व्यवहार और जीवन-पद्धति का हिस्सा नहीं बनाया जाएगा, तब तक वास्तविक परिवर्तन संभव नहीं होगा।
नई पीढ़ी और प्रकृति के बीच बढ़ती दूरी को वे एक गंभीर चिंता के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार यदि बच्चे और युवा प्रकृति को केवल स्क्रीन पर देखेंगे, तो उसके प्रति भावनात्मक जुड़ाव विकसित नहीं हो पाएगा। वे तकनीक और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर बल देते हैं।
डॉ. झा भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में प्रकृति के प्रति सम्मान को विशेष महत्व देते हैं। वे महाकवि विद्यापति की गंगा-स्तुति का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि भारतीय संस्कृति में नदियों, पर्वतों, वृक्षों और प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवनदाता के रूप में देखा गया है। उनके अनुसार आधुनिक पर्यावरणीय चिंतन को भारतीय सांस्कृतिक चेतना से जोड़ना समय की आवश्यकता है।
इन सभी विशेषज्ञों की बातों को एक साथ देखें तो स्पष्ट होता है कि जलवायु परिवर्तन, जल संकट, जैव-विविधता का क्षरण, असंतुलित विकास मॉडल और प्रकृति से बढ़ती सामाजिक दूरी वास्तव में एक-दूसरे से जुड़े हुए संकट हैं। इनमें से किसी एक समस्या का समाधान अकेले संभव नहीं है। प्रकृति, अर्थव्यवस्था, समाज और संस्कृति के बीच संतुलन स्थापित किए बिना टिकाऊ भविष्य की कल्पना नहीं की जा सकती।
विशेषज्ञों की चेतावनी और वैश्विक आंकड़ों का संगम
दिलचस्प बात यह है कि इस लेख के लिए जिन भारतीय विशेषज्ञों से बातचीत की गई, उनके निष्कर्ष वैश्विक संस्थाओं की रिपोर्टों से काफी हद तक मेल खाते हैं। डॉ. वंदना शिवा जैव-विविधता को मूल संकट मानती हैं, प्रो. रूपेंद्र सिंह जलवायु परिवर्तन को जल, खाद्य और राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न बताते हैं, प्रशांत सिन्हा विकास मॉडल और अति-उपभोग को संकट की जड़ मानते हैं, उमा शंकर पांडेय जल संकट को मानव अस्तित्व की चुनौती बताते हैं और डॉ. बीरबल झा समाज तथा शिक्षा को प्रकृति से पुनः जोड़ने की आवश्यकता पर बल देते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों के इन विशेषज्ञों की राय मिलकर एक ही संदेश देती है – पर्यावरण का संकट अब किसी एक क्षेत्र का संकट नहीं रहा, बल्कि यह मानव सभ्यता के भविष्य का प्रश्न बन चुका है।
विश्व पर्यावरण दिवस हमें यह याद दिलाता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी कार्यक्रम या अंतरराष्ट्रीय समझौते का विषय नहीं है। यह जीवन के हर क्षेत्र -खेती, शिक्षा, उद्योग, शहरी नियोजन, जल प्रबंधन और व्यक्तिगत जीवनशैली – से जुड़ा प्रश्न है। वर्ष 2050 की पृथ्वी कैसी होगी, इसका निर्णय आज लिए जा रहे निर्णयों पर निर्भर करेगा।
यदि मानवता ने समय रहते चेतावनियों को गंभीरता से लिया, प्रकृति के साथ अपने रिश्ते को पुनर्स्थापित किया और विकास को पर्यावरणीय संतुलन के साथ जोड़ा, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित और टिकाऊ भविष्य संभव है। लेकिन यदि वर्तमान प्रवृत्तियां जारी रहीं, तो पर्यावरणीय संकट सामाजिक, आर्थिक और मानवीय संकटों का रूप ले सकता है। शायद यही विश्व पर्यावरण दिवस का सबसे बड़ा संदेश है – पृथ्वी को बचाने का प्रश्न अंततः मानवता के भविष्य को बचाने का प्रश्न है।
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ब्रह्मांड में पृथ्वी एकमात्र ज्ञात ग्रह है, जिस पर पानी और जीवन है। महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन होने के साथ यह पारिस्थितिकी तंत्र और जलवायु को भी बनाए रखता है, जिस पर हमारी निर्मित और प्राकृतिक दुनिया, दोनों निर्भर हैं। भले इस ग्रह का सत्तर फीसद हिस्सा पानी से ढका हुआ है, पर केवल एक फीसद तक ही आसान पहुंच है। तेजी से बढ़ती आबादी और बदलती जलवायु के बीच, दुनिया भर में पानी को लेकर तनाव बढ़ रहा है। अत्यधिक दोहन, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण भूजल संसाधनों पर दबाव बढ़ता जा रहा है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
