कोरोना काल के बाद से यूरोप जाने वाले भारतीयों की संख्या में तेजी देखने को मिली है। आंकड़े बताते हैं कि हर साल 10 लाख से ज्यादा भारतीय Schengen Visa के लिए आवेदन करते हैं। यह वीजा सीधे-सीधे 27 यूरोपीय देशों में एंट्री देता है। इन वीजा एप्लिकेशंस में एक बड़ा नाम VFS Global का है। यह एक वीजा प्रोसेसिंग कंपनी है जिसका हेडक्वार्टर ज्यूरिख और दुबई में मौजूद है। भारत से जो लोग यूरोप जाते हैं, उनमें से ज्यादातर इसी VFS Global कंपनी की मदद लेते हैं। इस कंपनी को वीजा प्रोसेसिंग का मुख्य गेटवे भी कहा जा सकता है।
लेकिन अब इस सिस्टम पर गंभीर सवाल उठे हैं। असल में यूरोपीय अधिकारियों की 150 इंस्पेक्शन रिपोर्ट्स सामने आई हैं। ये रिपोर्ट्स 2020 से 2025 के बीच की हैं जिनमें 20 यूरोपीय देशों में मौजूद VFS Global के वीजा सेंटरों की जांच की गई।
असल में नीदरलैंड के Utrecht स्थित गैर-लाभकारी मीडिया संगठन Lighthouse Reports ने ये रिपोर्ट्स हासिल की थीं। इस जांच में कई बड़े मीडिया संस्थान शामिल थे। भारत में द इंडियन एक्सप्रेस, जर्मनी में Der Spiegel और फ्रांस में Le Monde जैसे संस्थानों ने इस जांच में भाग लिया।
हमारे सहयोगी इंडियन एक्सप्रेस ने इन रिपोर्ट्स की विस्तृत पड़ताल की है। न सिर्फ VFS Global की वित्तीय गतिविधियों को ट्रैक किया गया, बल्कि दिल्ली और मुंबई के वीजा सेंटरों पर करीब 150 आवेदकों से बातचीत भी की गई।
पड़ताल के दौरान मुख्य रूप से चार बड़ी बातें सामने आईं।
पहली, आवेदकों का निजी और बायोमैट्रिक डेटा बिना एन्क्रिप्शन वाली डिस्क में रखा जा रहा था।
दूसरी, डेटा को ट्रांसपोर्ट और हैंडल करने के तरीकों पर सवाल उठे।
तीसरी, ‘वीजा शॉपिंग’ बड़े स्तर पर हो रही थी। इसका मतलब यह था कि ट्रैवल एजेंट ऐसे यूरोपीय देशों से Schengen Visa दिलवा रहे थे जहां मंजूरी जल्दी मिलती थी जबकि पर्यटक असल यात्रा किसी दूसरे देश की कर रहा था।
चौथी, VFS Global ने यह स्पष्ट तरीके से नहीं बताया कि उसकी Value Added Services यानी VAS- जैसे प्रीमियम लाउंज या दूसरी सुविधाएं पूरी तरह वैकल्पिक हैं।
इंडियन एक्सप्रेस को अपनी पड़ताल में कई और बातें भी पता चलीं-
खुलासा नंबर 1: ट्रैवल एजेंट नकली VFS अपॉइंटमेंट बेच रहे थे।
खुलासा नंबर 2: राष्ट्रीय वर्क वीजा के लिए फर्जी रोजगार अनुबंध पत्र तक बेचे जा रहे थे।
खुलासा नंबर 3: नई दिल्ली स्थित स्विस मिशन में 2020 में लौटाए गए पासपोर्ट अभी भी VFS के पास मिले।
खुलासा नंबर 4: जिन लोगों से कंपनी ने गलत फीस वसूली थी, उन्हें रिफंड देने की प्रक्रिया बेहद खराब रही।
खुलासा नंबर 5: स्विस ऑडिटर्स ने यहां तक लिख दिया कि उनका सिस्टम ‘बिल्कुल काम नहीं कर रहा।’
खुलासा नंबर 6: भारत में VFS Global की सेवाएं GDPR नियमों का पालन नहीं कर रही थीं।
खुलासा नंबर 7: कुछ मामलों में VFS Global ने सुधारात्मक कदम भी उठाए।
लक्जमबर्ग दूतावास की स्थिति
भारत में लक्जमबर्ग दूतावास फिलहाल 13 वीजा आवेदन केंद्रों के साथ काम कर रहा है। बड़ी बात यह है कि ये सभी केंद्र VFS Global ही चला रहा है।
लक्जमबर्ग दूतावास ने कई गंभीर चिंताएं जताई थीं। हालांकि इसके बावजूद VFS कंपनी का कॉन्ट्रैक्ट 2024 से 2027 तक के लिए साइन कर लिया गया। नए कॉन्ट्रैक्ट में व्यक्तिगत डेटा सुरक्षा नियमों को थोड़ा और मजबूत किया गया।
2022 की जांच में पाया गया था कि बायोमैट्रिक डेटा को बिना एन्क्रिप्शन वाली कॉम्पैक्ट डिस्क में सेव किया जा रहा था। संवेदनशील डेटा का इस तरह रखा जाना सवालों के घेरे में था।
एक और खुलासा यह हुआ कि अगर डेटा कलेक्शन या ट्रांसमिशन में किसी प्रकार की गलती होती थी तो VFS कंपनी बायोमैट्रिक डेटा को खुले और बिना एन्क्रिप्शन वाले ईमेल से भेज देती थी।
हैरानी की बात यह भी रही कि जिन CDs में आवेदन और बायोमैट्रिक डेटा सेव था, उन्हें समय रहते नष्ट भी नहीं किया जा रहा था। यह हाल तब था जब दफ्तर में CD श्रेडर मौजूद था। जांच में 18 महीने से ज्यादा पुराने आवेदन डेटा वाली CDs भी मिलीं।
2024 की नई दिल्ली इंस्पेक्शन रिपोर्ट में ‘वीजा शॉपिंग’ का मुद्दा एक बार फिर उठाया गया। हालांकि दूतावास का तर्क था कि इस समस्या को सीधे तौर पर VFS कंपनी से नहीं जोड़ा जा सकता। लेकिन 2024 में ऐसे मामलों में बढ़ोतरी जरूर देखने को मिली।
रिपोर्ट में कहा गया कि फर्जी अपॉइंटमेंट के लिए ट्रैवल एजेंट ज्यादा जिम्मेदार हैं। जून 2024 के बाद से दूतावास ने फर्जी रोजगार अनुबंध पत्रों में भी बढ़ोतरी देखी जिन्हें ट्रैवल एजेंट राष्ट्रीय वर्क वीजा आवेदन के लिए इस्तेमाल कर रहे थे।
वीजा शॉपिंग को लेकर रिपोर्ट में विस्तार से लिखा गया कि कई लोग ऐसे देशों से वीजा लगवा रहे थे जहां मंजूरी जल्दी मिल रही थी, लेकिन यात्रा किसी दूसरे देश की करवाई जा रही थी। अहमदाबाद, चंडीगढ़ और जालंधर जैसे शहरों में 50% तक ‘नो-शो’ के मामले सामने आए। यानी लोग अपॉइंटमेंट लेकर भी नहीं पहुंच रहे थे। ऐसे कई आवेदन भी मिले जिनमें लक्जमबर्ग को मुख्य गंतव्य दिखाया गया था जबकि असल यात्रा किसी दूसरे यूरोपीय देश की थी।
मुंबई में स्वीडिश मिशन की स्थिति
साल 2023 में स्वीडिश मिशन ने मुंबई स्थित VFS ऑफिस की जांच की। इस पर 19 पन्नों की रिपोर्ट तैयार की गई और दो बड़ी चिंताएं सामने रखी गईं। पहली चिंता यह थी कि VFS ऑफिस के उसी फ्लोर पर Vasco नाम की दूसरी कंपनी भी काम कर रही थी।
ऑडिटर्स ने लिखा कि VFS को कहा गया है कि वह खुद को वैस्को कंपनी से पूरी तरह अलग करे और आवेदकों को स्पष्ट बताए कि वैस्को एक स्वतंत्र कंपनी है, उसका VFS से कोई संबंध नहीं है। यह अलग बात है कि बाद में वहां से वैस्को कंपनी का दफ्तर ही हट गया था।
रिपोर्ट में दूसरी चिंता प्राइवेसी को लेकर जताई गई। रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई ऑफिस में आवेदन काउंटर आपस में जुड़े हुए थे और उनके बीच छोटे डिवाइडर लगाए गए थे। इससे लोग एक-दूसरे के दस्तावेज तो नहीं देख पा रहे थे, लेकिन VFS कर्मचारियों से हो रही बातचीत निजी नहीं रह पा रही थी। हालांकि 2025 तक मुंबई ऑफिस की दोबारा जांच की गई तो 15 में से 14 नियमों का पालन होता पाया गया। उस समय सिर्फ एक कमी सामने आई। यह कमी Value Added Services यानी VAS को लेकर थी।
2025 की 24 पन्नों की रिपोर्ट में कहा गया था कि VFS को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसकी VAS सेवाएं पूरी तरह वैकल्पिक हैं। कंपनी को यह भी साफ करना चाहिए कि ये सेवाएं अनिवार्य नहीं हैं। वेबसाइट पर भी इसकी जानकारी अपडेट होनी चाहिए।
रिपोर्ट में जिन सेवाओं का जिक्र किया गया, उनमें प्राइम टाइम, प्रीमियम लाउंज, अतिरिक्त समय में पासपोर्ट कलेक्शन, हब सिटी पासपोर्ट कलेक्शन, कॉल-बैक सेवा, कूरियर शुल्क और एसएमएस सेवा शामिल थीं। ऑडिटर्स ने कंपनी से पूछा था कि क्या आवेदकों को साफ तौर पर बताया जा रहा है कि ये सेवाएं वैकल्पिक हैं।
इसके जवाब में कहा गया कि जानकारी दी जरूर जाती है, लेकिन उसे स्पष्ट तरीके से प्रदर्शित नहीं किया जा रहा। मिशन ने सुझाव दिया कि प्रीमियम लाउंज के बाहर इस बारे में डिस्क्लेमर लगाया जाए।
स्विट्जरलैंड: 2020 के पासपोर्ट और फीस रिफंड में गड़बड़ी
2023 में स्विस मिशन ने नई दिल्ली स्थित VFS ऑफिस की जांच की। इसमें 33 ऑपरेशनल क्षेत्रों की विस्तृत जांच हुई। छह मामलों में VFS नियमों का पालन करते नहीं दिखा।
सबसे बड़ी कमियों में यह शामिल था कि कंपनी की वेबसाइट और आवेदन काउंटरों पर ‘Schengen and Personal Data’ से जुड़ी जानकारी उपलब्ध नहीं थी। दूसरी कमी यह थी कि VFS ने फोटोकॉपी और कूरियर जैसी अतिरिक्त सेवाओं की वार्षिक सूची जमा नहीं की थी। तीसरी कमी यह थी कि यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि इन सेवाओं के शुल्क स्थानीय दरों के अनुरूप हैं या नहीं।
एक हैरान करने वाला मामला यह भी सामने आया कि कुछ ऐसे पासपोर्ट जिन्हें 2020 में वापस भेज दिया गया था, वे अब भी VFS ऑफिस में पड़े थे।
ऑडिटर्स ने यह भी पाया कि VFS के सिस्टम में एक महीने से ज्यादा पुराना आवेदक डेटा अब भी उपलब्ध था जबकि Schengen Visa नियम स्पष्ट कहते हैं कि डेटा ट्रांसमिशन के सात दिन बाद उसे डिलीट कर देना चाहिए। हालांकि रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि बाद में हंगरी की IT टीम की मदद ली गई और उसके बाद कंपनी ने इस समस्या को ठीक कर दिया।
