सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा था कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) सिर्फ एक निर्णय देने वाली संस्था नहीं है, बल्कि एक विशेष संरक्षक है, जिसकी जिम्मेदारी पर्यावरण की रक्षा करना और पर्यावरणीय न्याय सुनिश्चित करना है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि इस संस्थान का उद्देश्य जनता के हितों की रक्षा करना और पर्यावरण के शोषण को रोकना है।

लेकिन हाल के वर्षों में यही जिम्मेदारियां कमजोर पड़ती हुई नजर आ रही हैं। जनसत्ता की सहयोगी इंडियन एक्सप्रेस ने 2020 से अब तक NGT में आए करीब एक लाख मामलों की समीक्षा की। इस पड़ताल में एक अलग पैटर्न सामने आया। हर पांच में से चार मामलों में NGT का फैसला प्रोजेक्ट डेवलपर के पक्ष में गया। ये सभी मामले पर्यावरण और वन मंजूरी से जुड़े थे।

2020 से 2025 के बीच सामाजिक कार्यकर्ताओं और जागरूक नागरिकों ने 329 अपीलें दायर कीं, जिनमें सरकार द्वारा दी गई पर्यावरण मंजूरी को चुनौती दी गई थी। इन 329 मामलों में से केवल 65 में ही NGT ने अपीलकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाया।

इसके उलट, जब प्रोजेक्ट डेवलपर्स ने अपील दायर की, तो 160 में से 126 मामलों में उन्हें राहत मिली। हालांकि, ऐसा हमेशा से नहीं था। यदि 2016 से 2019 के आंकड़ों को देखें तो NGT का रवैया अपेक्षाकृत संतुलित नजर आता है। उस दौरान दोनों पक्षों के पक्ष में फैसलों का प्रतिशत लगभग 18 से 31 प्रतिशत के बीच था। लेकिन पिछले 24 महीनों में “प्रो-प्रोजेक्ट ट्रेंड” अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।

2024 से 2025 के बीच केवल 7 प्रतिशत मामलों में ही प्रोजेक्ट की मंजूरी को चुनौती देने वाले सफल हुए, जबकि 88 प्रतिशत मामलों में उद्योगों को राहत मिली। जानकारी के लिए बता दें कि NGT एक्ट 2010 के तहत यह ट्रिब्यूनल एक प्राथमिक अपीलीय प्राधिकरण के रूप में कार्य करता है। इसे पर्यावरण से जुड़े सिविल मामलों की सुनवाई और निर्णय देने का अधिकार है। देश में इसकी पांच बेंच हैं- दिल्ली, भोपाल, पुणे, कोलकाता और चेन्नई। यहां जल प्रदूषण, तटीय क्षेत्र विनियमन और वन संरक्षण से जुड़े मामले सुने जाते हैं।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने NGT को पर्यावरण का “रक्षक” माना है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि हाल के वर्षों में यह भूमिका कमजोर होती दिख रही है। मुंबई स्थित कंजर्वेशन एक्शन ट्रस्ट के संस्थापक देव गोयनका का कहना है कि कई अपीलें समय-सीमा के कारण खारिज हो जाती हैं और मेरिट के आधार पर उनकी सुनवाई नहीं हो पाती। उनके मुताबिक बड़ी कंपनियों के पास मजबूत कानूनी विभाग होते हैं, जो समय-सीमा का ध्यान रखते हैं। लेकिन गरीब और पिछड़े वर्ग के लोग 90 दिनों की अपील की समय-सीमा चूक जाते हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की जांच में भी सामने आया कि 264 नागरिकों की असफल अपीलों में से ज्यादातर समय-सीमा समाप्त होने के कारण खारिज कर दी गईं। बाकी मामलों में “मेरिट नहीं होने” का कारण बताया गया। जब इस बदलाव के कारणों को लेकर पर्यावरण मंत्रालय के एक अधिकारी से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि आंकड़ों में बहुत गहराई तक जाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि किसी भी मामले का नतीजा उसकी गुणवत्ता पर निर्भर करता है।

वहीं पर्यावरण वकील रित्विक दत्ता का कहना है कि NGT के फैसलों को हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है, लेकिन ऐसा कम ही होता है। इसका कारण यह है कि उच्च अदालतों में ऐसे मामले लंबे समय तक लंबित रहते हैं।

पिछले कुछ दिनों से एनजीटी अपने कुछ फैसलों की वजह से सुर्खियों में है। हाल ही में उसने ऑलिव रिडले कछुओं की बढ़ती मौतों पर चिंता जताई थी। पूरी खबर के लिए यहां क्लिक करें