पंजाब में आम आदमी पार्टी सरकार के दौरान पुलिस द्वारा कई एनकाउंटर किए गए हैं। आंकड़े इस बात की तस्वीर पेश करते हैं। बड़ी बात यह है कि ज्यादातर एनकाउंटर पुलिस कस्टडी के दौरान हुए हैं। पिछले साल नवंबर में पंजाब के डीजीपी गौरव यादव ने कहा था कि अप्रैल 2022 से अब तक राज्य पुलिस द्वारा 324 एनकाउंटर किए गए हैं। इनमें 24 लोगों की मौत हुई है और 515 को गिरफ्तार किया गया है। डीजीपी ने यह भी बताया था कि गिरफ्तार किए गए 515 गैंगस्टरों में से 319 को गोली लगी थी।

यह बयान उस समय आया था जब नेशनल ह्यूमन राइट्स कमिशन (NHRC) ने पंजाब की गृह सचिव को नोटिस भेजा था। आरोप लगाए गए थे कि राज्य में “स्टेट सैंक्शनड एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग” हो रही है।

अब डीजीपी की ओर से आंकड़े पेश कर दिए गए, लेकिन एनकाउंटर की घटनाओं में कमी नहीं दिखी। पिछले तीन महीनों के आंकड़े बताते हैं कि पंजाब पुलिस ने लगभग हर तीसरे दिन एक एनकाउंटर किया। तीन महीनों में कुल 34 एनकाउंटर हुए, जिनमें 5 मौतें हुईं और 45 लोग घायल हुए। इंडियन एक्सप्रेस ने पंजाब सरकार, गृह विभाग और पुलिस को विस्तृत प्रश्न भेजे थे, लेकिन कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला।

एनकाउंटर का पैटर्न

अधिकांश मामलों में पुलिस का तर्क रहा कि गोली आत्मरक्षा में चलाई गई। कई मामलों में आरोपियों को रिकवरी के लिए ले जाया जा रहा था और उसी दौरान मुठभेड़ हुई। 8 मामलों में पुलिस पर भी फायरिंग हुई, लेकिन पुलिसकर्मी बुलेटप्रूफ जैकेट के कारण बच गए। पुलिस का कहना है कि गोली केवल पैरों पर चलाई जा रही है। जिलेवार स्थिति की बात करें तो भटिंडा, फरीदकोट, मुक्तसर, मोगा, होशियारपुर और फाजिल्का में एक-एक मामला सामने आया। पटियाला, बटाला, खन्ना, फिरोजपुर, मोहाली, तरनतारन और जालंधर में दो-दो मामले दर्ज हुए। लुधियाना में पांच मामले सामने आए। अमृतसर में भी कई केस दर्ज किए गए। 2024 में पंजाब पुलिस ने 64 एनकाउंटर किए। इनमें 4 मौतें हुईं और एक पुलिसकर्मी शहीद हुआ। 56 आरोपी और 9 पुलिस अधिकारी घायल हुए।

प्रमुख एनकाउंटर की लिस्ट

11 नवंबर

आरोपी हरकरण सिंह और गुरतेज सिंह एक हत्या में शामिल थे। खन्ना पुलिस के साथ उनका एनकाउंटर हुआ। एसएसपी ज्योति यादव के अनुसार, हरकरण ने पुलिस पर गोली चलाई, जिसमें एक सब-इंस्पेक्टर घायल हुआ। आत्मरक्षा में पुलिस ने जवाबी फायरिंग की और हरकरण के पैर में गोली लगी। गुरतेज सिंह इमारत की पहली मंजिल से कूद गया, जिससे वह घायल हो गया।

12 नवंबर

डेरा बस्सी में गोल्डी ढिल्लों गैंग के सदस्य शरणजीत सिंह और अमन कुमार के साथ मुठभेड़ हुई। एसएसपी हरमंदीप हंस के अनुसार, दोनों ने भागने की कोशिश की। पुलिस ने फायरिंग की और दोनों आरोपियों के पैर में गोली लगी।

15 नवंबर

फरीदकोट पुलिस ने प्रभ दसुवाल गैंग के अर्शदीप सिंह को गिरफ्तार किया। पुलिस को सूचना मिली थी कि वह किसी बड़ी वारदात को अंजाम देने वाला है। नाकाबंदी के दौरान उसने पुलिस टीम पर हमला किया। जवाबी फायरिंग में वह घायल हुआ और बाद में गिरफ्तार कर लिया गया।

4 दिसंबर

शूटर दलेर सिंह का एनकाउंटर पुलिस कस्टडी के दौरान हुआ। पुलिस कमिश्नर गुरप्रीत सिंह भुल्लर के अनुसार, उसे रिकवरी के लिए ले जाया जा रहा था। उसने अचानक हथियार निकालकर फायरिंग की। जवाबी कार्रवाई में उसके पैर में गोली लगी।

6 दिसंबर

श्री मुक्तसर साहिब पुलिस ने किडनैपिंग और नाबालिग हत्या मामले में मुकेश कुमार को गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार, उसने भागने की कोशिश की और पुलिस पर गोली भी चलाई। उसके बाद मुठभेड़ हुई और उसे गोली लगी।

15 दिसंबर

अमृतसर ग्रामीण पुलिस ने वंशप्रीत सिंह और भूपेंद्र सिंह को गिरफ्तार किया। पुलिस का दावा था कि दोनों लंबे समय से एक्सटॉर्शन और लूट के मामलों में शामिल थे। मुठभेड़ के दौरान फायरिंग हुई।

27 दिसंबर

राजगढ़ गांव में आरोपी इंद्रजीत सिंह और गुरवीर सिंह ने सरपंच पर गोली चलाई थी। एसएसपी ज्योति यादव के अनुसार, गिरफ्तारी के दौरान इंद्रजीत ने पुलिस पर फायरिंग की। जवाबी कार्रवाई में उसके पैर में गोली लगी।

6 जनवरी

तरनतारन जिले में गैंगस्टर प्रभ दासुवाल और अफरीदी का करीबी हरनौर पुलिस मुठभेड़ में मारा गया था। डीआईजी बॉर्डर रेंज के अनुसार, पुलिस को सूचना मिली थी कि नूर बाइक से आ रहा है। ऐसे में पुलिस ने उसका पीछा किया और आरोपी ने गोली चलाई, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई हुई। उसी मुठभेड़ में उसकी मौत हुई।

7 जनवरी

अमृतसर में गुरपीत सिंह लाल वेपन रिकवरी के दौरान भागने की कोशिश में घायल हुआ। पुलिस के अनुसार, उसने गोली चलाई और जवाबी फायरिंग में जख्मी हुआ। इसके अलावा 17, 18, 19, 20, 22, 23, 24 और 29 जनवरी को भी कई एनकाउंटर हुए। लगभग सभी मामलों में एक समान पैटर्न देखने को मिला- या तो आरोपी ने भागने की कोशिश की या दावा किया गया कि पहले गोली आरोपी ने चलाई।

एडवोकेट निखिल सराफ ने इन कथित फर्जी एनकाउंटर मामलों को गंभीरता से उठाया है। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार हर ऐसे एनकाउंटर में एफआईआर दर्ज होनी चाहिए जहां आरोपी गंभीर रूप से घायल होता है। यदि किसी की मौत होती है तो मजिस्ट्रेट जांच अनिवार्य है। वरिष्ठ अधिवक्ता सरबजीत सिंह भी 1990 के दशक से ऐसे मामलों की समीक्षा कर रहे हैं। उनका कहना है कि चाहे एनकाउंटर स्पष्ट लगे, जांच होना आवश्यक है और न्यायपालिका को स्वत: ऐसे मामलों का संज्ञान लेना चाहिए।