उत्तराखंड में सत्ता में आने के बाद भाजपा की धामी सरकार वर्ष 2018 में जबरन धर्मांतरण के खिलाफ एक कानून लेकर आई थी। लेकिन यह कानून कितना कारगर साबित हुआ है, इसे लेकर अब कुछ अहम तथ्य सामने आए हैं। इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में पाया गया है कि इस कानून के तहत जिन पांच मामलों में अदालत में पूरा ट्रायल चला, उन सभी मामलों में आरोपियों को बरी कर दिया गया।
पिछले महीने तक उत्तराखंड पुलिस ने इस कानून के तहत 62 मामले दर्ज किए थे। इंडियन एक्सप्रेस ने इनमें से 51 मामलों की जांच की। इनमें पांच मामलों में पूरा ट्रायल हो चुका है और सभी में आरोपी बरी हुए हैं। इसके अलावा, ऐसे कई मामले भी सामने आए हैं, जिन्हें बीच में ही खारिज कर दिया गया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि या तो शिकायतकर्ताओं ने अपने बयान बदल दिए या फिर सबूतों का अभाव सामने आया।
बाकी बचे 39 मामलों में से अधिकतर में आरोपी जमानत पर हैं। तीन मामलों में जमानत खारिज की गई है। पांच मामलों में अभी सुनवाई शुरू होना बाकी है, जबकि दो मामलों में आरोपी पहले ही हाईकोर्ट का रुख कर चुके हैं।
क्या था उत्तराखंड का धर्मांतरण कानून?
भाजपा सरकार वर्ष 2018 में UFRA (उत्तराखंड फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट) लेकर आई थी। वर्ष 2022 में इसमें सजा को बढ़ाया गया। इसके बाद 2025 में न्यूनतम सजा को 10 साल तक कर दिया गया और गंभीर मामलों में 20 साल तक की सजा का प्रावधान किया गया। हालांकि, 2025 में किए गए संशोधनों को अभी तक पूरी तरह लागू नहीं किया गया है, क्योंकि सरकार ने कुछ जरूरी प्रक्रियाएं पूरी करने के निर्देश दिए हैं।
जब से उत्तराखंड में यह कानून लागू हुआ है, तब से इसके तहत दर्ज मामलों की संख्या लगातार बढ़ती गई है। वर्ष 2020 में इस कानून के तहत सबसे ज्यादा 20 मामले दर्ज किए गए थे। इसके बाद सितंबर 2025 तक 18 मामले दर्ज किए गए। इंडियन एक्सप्रेस ने इस मुद्दे पर उत्तराखंड पुलिस से प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।
जिन पांच मामलों में पूरा ट्रायल चला और आरोपी बरी हुए, उनमें एक बड़ा कारण यह सामने आया कि शिकायतें थर्ड पार्टी द्वारा दर्ज कराई गई थीं, न कि खुद कथित पीड़ित या उसके परिवार द्वारा। जबकि उत्तराखंड का कानून साफ तौर पर कहता है कि शिकायत केवल पीड़ित, उसके माता-पिता या भाई-बहन ही दर्ज करा सकते हैं। अगर वे ऐसा नहीं कर पाते, तो पीड़ित परिवार से रक्त संबंध रखने वाला कोई व्यक्ति शिकायत दर्ज करा सकता है।
अब उन पांच मामलों पर नजर डालते हैं, जिनमें धर्मांतरण कानून के तहत केस दर्ज हुआ, लेकिन अंत में आरोपी बरी हो गए।
केस नंबर 1
पहला मामला फरवरी 2021 का है। सैनिक समाज पार्टी के कार्यकर्ता सीताराम राणा कुट्टी ने एक शिकायत दर्ज कराई थी। राणा कुट्टी ने आरोप लगाया था कि विनोद कुमार नाम के व्यक्ति ने ईसाई धर्म की प्रशंसा की और हिंदू धर्म का अपमान किया। आरोप यह भी था कि उसने फेसबुक वीडियो के जरिए जाति व्यवस्था के खिलाफ बयान दिए। हालांकि, क्रॉस-एग्जामिनेशन के दौरान जांच अधिकारी ने अदालत को बताया कि जांच में कोई ठोस सबूत नहीं मिला। कोर्ट में पेश किए गए डिजिटल सबूतों को भी खारिज कर दिया गया। अदालत ने साफ कहा कि हर व्यक्ति को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने की आजादी है, जब तक वह किसी दूसरे व्यक्ति के नागरिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं करता।
केस नंबर 2
दूसरा मामला पास्टर रविंद्र सिंह बिष्ट और उनकी पत्नी से जुड़ा था। उनके खिलाफ थर्ड पार्टी द्वारा केस दर्ज कराया गया था। यह शिकायत अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद के सदस्यों ने की थी। आरोप था कि बिष्ट ने ईसाई धर्म को बढ़ावा दिया और लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए प्रोत्साहित किया। यह भी दावा किया गया कि उन्होंने अनुसूचित जनजाति समुदाय के गरीब लोगों पर धर्मांतरण का दबाव बनाया। हालांकि, 17 सितंबर 2025 को ट्रायल कोर्ट ने बिष्ट को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा कि कब और कैसे किसी व्यक्ति का धर्म परिवर्तन कराया गया। इस मामले में बिष्ट को सात दिन जेल में भी रहना पड़ा था। इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में उन्होंने कहा कि गिरफ्तारी के बाद अपने पुराने घर में रहना मुश्किल हो गया और उन्हें गांव से 15 किलोमीटर दूर जाकर रहना पड़ा, लेकिन अंत में उन्हें कानूनी लड़ाई में जीत मिली।
केस नंबर 3
तीसरा मामला जुलाई 2023 में अल्मोड़ा का है। यहां एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी के लापता होने पर जबरन धर्मांतरण, बलात्कार और अपहरण के आरोप लगाए थे। शुरुआत में मिसिंग की शिकायत दर्ज की गई थी, जिसके बाद क्रिमिनल इंटिमिडेशन और UFRA के तहत केस दर्ज हुआ। बाद में जब महिला मिल गई, तो मोहम्मद चांद पर जबरन धर्मांतरण कराने के आरोप लगाए गए। हालांकि, क्रॉस-एग्जामिनेशन के दौरान महिला अपने बयान से पलट गई। उसने कहा कि वह चांद के साथ अपनी मर्जी से गई थी और किसी भी तरह का यौन शोषण नहीं हुआ था। उसने मेडिकल जांच कराने से भी इनकार कर दिया। अदालत ने यह भी माना कि महिला घर छोड़ते समय अपने कपड़े साथ लेकर गई थी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वह पहले से जाने की तैयारी में थी। इसी आधार पर मार्च 2025 में ट्रायल कोर्ट ने चांद को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
केस नंबर 4
चौथा मामला शादी के बाद अपहरण से जुड़ा था। इसमें शिकायतकर्ता ने अदालत में कहा कि उसने कभी पुलिस से यह नहीं कहा था कि उसकी बहन का अपहरण हुआ या उसका जबरन धर्मांतरण कराया गया। शिकायतकर्ता की बहन ने भी कोर्ट में बयान दिया कि उसका कोई धर्मांतरण नहीं हुआ था और उसने हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह किया था। उसने यह भी कहा कि इसके विपरीत कोई बयान उसने पुलिस को नहीं दिया था। इस आधार पर अदालत ने आरोपी को बरी कर दिया।
केस नंबर 5
पांचवां मामला नवंबर 2022 में नैनीताल के रामनगर में दर्ज किया गया था। इसमें एक नाबालिग के पिता ने आरोप लगाया था कि उसकी बेटी पर जबरन धर्मांतरण का दबाव डाला गया। हालांकि, नाबालिग ने अपने बयान में आरोपों का समर्थन किया, लेकिन वह घटना की तारीख और समय नहीं बता सकी। गवाहों के तौर पर उसके पिता और मकान मालकिन भी आरोपों की पुष्टि नहीं कर सके। अदालत ने कहा कि ऐसे बयान सुनी-सुनाई बातों की श्रेणी में आते हैं। इसी आधार पर आरोपी को बरी कर दिया गया। बाद में धामी सरकार ने इस फैसले को चुनौती दी, लेकिन अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
अदालत में क्यों नहीं टिक रहे मामले?
इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में यह भी सामने आया कि जिन 24 मामलों में अभी ट्रायल चल रहा है और जिनमें UFRA के साथ बलात्कार या अपहरण की धाराएं जोड़ी गई हैं, उनमें से 16 मामलों की स्थिति स्पष्ट है। इनमें से 10 मामलों में अदालतों ने यह टिप्पणी की कि संबंधित जोड़े आपसी सहमति से रिश्ते में थे। एक मामले में अदालत ने यह भी कहा कि दोनों केवल दोस्त थे। इन 16 में से 11 मामलों में कथित पीड़ितों ने अपने शुरुआती बयान बदल दिए या अदालत ने जांच और बयानों में अनियमितताएं दर्ज कीं।
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