वीजा कंपनी VFS Global के कामकाज पर कई सवाल उठे हैं। इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में सामने आया है कि लोगों की डेटा सुरक्षा से लेकर अतिरिक्त शुल्क वसूलने तक कई गंभीर खुलासे हुए हैं।

असल में अक्टूबर 2023 में यूरोपीय यूनियन (EU) का 20 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल भारत यात्रा पर आया था। इस प्रतिनिधिमंडल ने VFS Global के भारत में कामकाज को लेकर कई कमियों को उजागर किया।

सभी देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि जब-जब VFS के सामने किसी समस्या को रखा जाता है, तो कुछ समय के लिए सुधार देखने को मिलता है, लेकिन बाद में फिर वही गड़बड़ियां शुरू हो जाती हैं।

जानकारी के लिए बता दें कि Lighthouse Reports को इसी साल 12 मई को ब्रसेल्स स्थित EU मुख्यालय से ये दस्तावेज हासिल हुए थे। इन रिकॉर्ड्स से पता चला कि स्लोवाकिया जैसे देशों ने VFS Global से परेशान होकर दूसरे सर्विस प्रोवाइडर के पास जाने का फैसला तक ले लिया था।

स्लोवाकिया ने EU प्रतिनिधिमंडल को बताया था कि VFS के साथ लगातार समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। इसी वजह से दूसरी कंपनी के साथ काम करने का फैसला लिया गया।

अलग-अलग देशों ने VFS Global को लेकर जो शिकायतें दर्ज की थीं, वे इस प्रकार थीं।

पहली शिकायत- निर्देशों का सही तरीके से पालन नहीं हो रहा था।

दूसरी शिकायत- दस्तावेज सही क्रम में व्यवस्थित नहीं होते थे।

तीसरी शिकायत- स्कैनिंग से जुड़ी समस्याएं लगातार सामने आ रही थीं।

चौथी शिकायत- IT इंफ्रास्ट्रक्चर और इंटरनेट बैंडविड्थ काफी कमजोर थी।

प्रतिनिधिमंडल ने कुछ तकनीकी गड़बड़ियां भी उजागर कीं।

पहली गड़बड़ी- गलत डेटा एंट्री।

दूसरी गड़बड़ी- बायोमेट्रिक जानकारी गायब होना।

तीसरी गड़बड़ी- गलत चेकलिस्ट देना।

चौथी गड़बड़ी- फीस ट्रांसफर में गलती होना।

लिथुआनिया और पोलैंड जैसे देशों ने तो आरोप लगाया कि VFS स्टाफ अपॉइंटमेंट स्लॉट बेच रहा था। पोलैंड के मुताबिक, उसे लगभग हर दिन ऐसी शिकायतें मिलती थीं। स्वीडन ने बताया कि उसने VFS के साथ इस मुद्दे पर चर्चा की थी। आरोप था कि लोगों को अतिरिक्त भुगतान वाली सेवाएं लेने के लिए मजबूर किया जा रहा था। इसके बाद ही स्वीडन ने वीजा कंपनी को निर्देश दिया था कि अतिरिक्त सेवाओं के लिए ग्राहकों से पहले हस्ताक्षर वाला सहमति पत्र लिया जाए।

पड़ताल में पता चला कि ज्यादातर देशों ने दिल्ली के वीजा आवेदन केंद्र को सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण बताया। वहां सबसे ज्यादा गलतियां सामने आ रही थीं। इसके अलावा मुंबई, गोवा, पुणे, हैदराबाद, जयपुर, अहमदाबाद और बेंगलुरु जैसे शहरों में भी कई शिकायतें सामने आईं।

EU प्रतिनिधिमंडल ने उस समय चार बड़े सुझाव भी दिए थे-

पहला सुझाव- सभी सदस्य देशों और VFS के बीच एक संयुक्त बैठक होनी चाहिए। ऐसा होने से सभी देशों के लिए एक समान प्रक्रिया बन सकती है।

दूसरा सुझाव- भारतीय आवेदकों के लिए Schengen Visa नीति को लेकर एक सार्वजनिक जागरूकता अभियान चलाया जाए।

तीसरा सुझाव- व्यापक स्तर पर औचक निरीक्षण किए जाएं।

चौथा सुझाव- VFS केंद्रों में स्टाफ और प्रबंधन की कमी को दूर किया जाए।

प्रतिनिधिमंडल ने चौथा सुझाव इसलिए दिया था क्योंकि उन्होंने पाया था कि वीजा कंपनी का मिडिल मैनेजमेंट ज्यादा सक्रिय नहीं था और जमीन पर कमजोर दिखाई दे रहा था। EU प्रतिनिधिमंडल ने इस बात पर भी जोर दिया था कि VFS को यह समझाने की जरूरत है कि अगर किसी आवेदन को स्वीकार नहीं किया जाता या किसी से गलत फीस ली जाती है तो रिफंड प्रक्रिया कैसे शुरू की जाए।

VFX के कामकाज को लेकर कुछ सवाल भी इन देशों से पूछे गए थे

पहला सवाल यही था कि VFS Global के साथ सबसे ज्यादा कौन-सी गलतियां सामने आ रही हैं।

इस पर अलग-अलग देशों की अलग राय थी-

चेक गणराज्य ने कहा था कि वीजा आवेदन की तय संख्या कभी पूरी नहीं हो रही। दूतावास को अपेक्षित आवेदनों का केवल 60 से 70 प्रतिशत ही मिल पाता है।

ऑस्ट्रिया ने बताया था कि जो लोग समूह में यात्रा करने की तैयारी कर रहे होते हैं, उनके आवेदन एक साथ दूतावास तक नहीं पहुंचते।

एस्टोनिया ने बताया था कि कई बार जरूरी दस्तावेज गायब हो जाते हैं, बायोमेट्रिक जानकारी नहीं दिखती और फोटो भी ठीक तरीके से स्कैन नहीं होते।

लिथुआनिया ने कहा था कि कई बार गलत चेकलिस्ट दी जाती है, ऑफलाइन वीजा अपॉइंटमेंट में गड़बड़ी होती है और फीस ट्रांसफर भी गलत तरीके से होता है।

स्वीडन ने बताया था कि स्टाफ यात्रा की तारीखों का टिकट से मिलान नहीं करता। नाम, जन्म स्थान और पासपोर्ट जैसी बुनियादी जानकारी भी कई बार गलत दर्ज की जाती है।

माल्टा ने कहा था कि प्रक्रियाओं में एकरूपता की कमी है। डेटा एंट्री गलत होती है और चेकलिस्ट की ठीक से जांच नहीं की जाती।

जब यूरोपीय यूनियन के देशों से पूछा गया कि उनकी शिकायतों पर VFS कंपनी की क्या प्रतिक्रिया रही तो लगभग सभी देशों ने एक जैसा जवाब दिया। सभी ने कहा कि कुछ समय के लिए सुधार जरूर होता था, लेकिन फिर हालात पहले जैसे हो जाते थे।

इस बारे में चेक गणराज्य ने कहा कि बार-बार चर्चा होती थी, कुछ समय के लिए असर भी दिखता था, लेकिन बाद में VFS का कामकाज फिर खराब हो जाता था।

ऑस्ट्रिया ने जवाब दिया कि उन्होंने कई बार इस बारे में बात की थी। कुछ समय तक स्थिति सुधरती भी थी, लेकिन फिर गुणवत्ता दोबारा गिरने लगती थी।

एस्टोनिया ने कहा कि नियमित फीडबैक दिया जाता था, लेकिन कुछ समय बाद वही समस्याएं फिर वापस आ जाती थीं।

लिथुआनिया के मुताबिक, कई सामान्य गलतियों को लेकर VFS से चर्चा हुई थी, लेकिन केवल अस्थायी सुधार दिखाई देता था। कुछ समय बाद वही गलतियां फिर शुरू हो जाती थीं।

पोलैंड ने कहा कि समस्याओं पर चर्चा जरूर होती थी, लेकिन वे अब भी जारी थीं।

EU देशों से यह भी पूछा गया था कि क्या VFS Global भ्रष्टाचार की चपेट में है। ज्यादातर देशों ने कहा कि शिकायतें जरूर मिलती थीं, लेकिन पुख्ता सबूत नहीं मिल पाते थे।

लिथुआनिया का आरोप था कि उसे कुछ गुमनाम पत्र और शिकायतें मिली थीं जिनमें कहा गया था कि VFS के ऑनलाइन अपॉइंटमेंट स्लॉट बेचे जा रहे हैं।

लिथुआनिया के मुताबिक, इस बारे में कंपनी से बात की गई थी। कंपनी ने अपने स्तर पर जांच भी शुरू की, कुछ कर्मचारियों को बदला भी गया, लेकिन स्थिति में कोई बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिला।

पोलैंड ने आरोप लगाया था कि उसे लगभग हर रोज ऐसी शिकायतें मिलती थीं जिनमें अपॉइंटमेंट स्लॉट बेचने की बात होती थी।

पोलैंड के अनुसार, कई बार यह साबित नहीं हो पाता था कि इस पूरी प्रक्रिया में VFS के कर्मचारी शामिल हैं या नहीं। कुछ मामलों में लोगों ने खुद को VFS कर्मचारी बताकर धोखाधड़ी भी की।

स्वीडन ने शिकायत की थी कि कई आवेदकों ने दावा किया कि VFS द्वारा अतिरिक्त भुगतान वाली सेवाएं लेने के लिए मजबूर किया जा रहा था। बड़ी बात यह रही कि आवेदकों को उन सेवाओं को मना करने का विकल्प भी नहीं दिया जा रहा था।

स्वीडन के मुताबिक, इन शिकायतों के बाद ही VFS कंपनी को निर्देश दिया गया था कि अतिरिक्त सेवाओं के लिए हस्ताक्षर वाला सहमति पत्र लिया जाए।

अब VFS Global को लेकर इतनी सारी शिकायतें जरूर सामने आई हैं, लेकिन इसके बावजूद कई देश अभी भी इसके साथ काम कर रहे हैं इस बारे में स्विट्जरलैंड ने कहा है कि उसके पास VFS के साथ काम करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। वह अपने स्तर पर इतने ज्यादा आवेदन स्वीकार नहीं कर सकता और भारत में प्रतिस्पर्धी कंपनियों की भी कमी है।

EU दस्तावेजों से यह भी पता चलता है कि कोविड के बाद Schengen Visa सिस्टम पर भारी दबाव बढ़ गया था। 2023 की Local Schengen Cooperation Group रिपोर्ट भी इस बात की पुष्टि करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, उस साल सात बैठकें हुई थीं और सभी बैठकों में कोविड के बाद बढ़ते दबाव पर चर्चा हुई थी।

रिपोर्ट में कहा गया था कि कोविड प्रतिबंध हटने के बाद वीजा आवेदनों में भारी बढ़ोतरी देखने को मिली। इससे सदस्य देशों की वीजा प्रोसेसिंग क्षमता पर दबाव बढ़ गया। इसी दौरान फर्जी या जबरन तैयार किए गए दस्तावेजों के साथ पहली बार आवेदन करने वालों की संख्या भी बढ़ गई थी।

इस पड़ताल के पहले और दूसरे भाग यहां पढ़ें-

पहला भाग, दूसरा भाग