पश्चिम बंगाल की राजनीति का इतिहास केवल सरकारों के बदलने की कहानी नहीं है, बल्कि उन नेताओं की भी कहानी है जिन्होंने अपने दौर में राज्य की दिशा तय की। मुख्यमंत्री के इस सीरीज में हम राज्य के सभी मुख्यमंत्रियों के जीवन, उनके संघर्ष, फैसलों और राजनीतिक विरासत को करीब से समझने की कोशिश कर रहे हैं। आज की कड़ी में बात पश्चिम बंगाल के तीसरे मुख्यमंत्री प्रफुल्ल चंद्र सेन की। सेन्हाटी के एक साधारण गांव से निकलकर “आरामबाग के गांधी” कहलाने तक और फिर मुख्यमंत्री बनने तक का उनका सफर बेहद दिलचस्प रहा। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी, गांधीवादी जीवनशैली और कठिन प्रशासनिक फैसलों ने उन्हें बंगाल की राजनीति में एक अलग पहचान दी।
10 अप्रैल 1897 को अविभाजित बंगाल के खुलना जिले के सेन्हाटी गांव में जन्मे प्रफुल्ल चंद्र सेन का शुरुआती जीवन साधारण परिवेश में बीता। आगे चलकर वे पश्चिम बंगाल के तीसरे मुख्यमंत्री बने और 1962 से 1967 तक राज्य का नेतृत्व किया। लेकिन उनकी पहचान केवल एक मुख्यमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि गांधीवादी सादगी और सार्वजनिक जीवन की नैतिकता के कारण भी बनी।
सेन का जन्म जिस समय हुआ, वह भारत में स्वतंत्रता आंदोलन के उभार का दौर था। उनका परिवार अविभाजित बंगाल के उस हिस्से में रहता था, जो आज बांग्लादेश में आता है। पिता की नौकरी में लगातार तबादलों के कारण उनका बचपन बिहार के विभिन्न स्थानों में बीता। उन्होंने बिहार के देवघर स्थित आर. मित्रा संस्थान से मैट्रिक की परीक्षा पास की।
इसके बाद वे कलकत्ता पहुंचे और स्कॉटिश चर्च कॉलेज में विज्ञान की पढ़ाई कर स्नातक की उपाधि प्राप्त की। पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका इरादा एक लेखा फर्म में काम करते हुए इंग्लैंड जाकर ऑडिटिंग के क्षेत्र में करियर बनाने का था। लेकिन इतिहास ने उनके लिए बिल्कुल अलग रास्ता तय कर रखा था।
सन 1920 में कलकत्ता में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में उन्होंने महात्मा गांधी का भाषण सुना। गांधी के शब्दों का उन पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि उन्होंने विदेश जाकर करियर बनाने का विचार तुरंत त्याग दिया और खुद को देश की आजादी की लड़ाई में झोंक दिया। उन्होंने गांधी के असहयोग आंदोलन का समर्थन किया और ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष की राह पकड़ ली।
कुछ ही समय बाद 1923 में उन्होंने हुगली जिले के दूरस्थ इलाके आरामबाग को अपना कार्यक्षेत्र बना लिया। उस समय यह इलाका बेहद पिछड़ा था और मलेरिया जैसी बीमारियों से प्रभावित था। सेन ने इसे अपने सामाजिक और राजनीतिक प्रयोगों की भूमि बना लिया। उन्होंने स्वदेशी, सत्याग्रह और आत्मनिर्भर ग्राम व्यवस्था के गांधीवादी विचारों को यहां व्यवहार में उतारने की कोशिश की।
जिस प्रधानाध्यापक से मिली प्रेरणा, बाद में उसी को चुनाव में हराया
लोगों के बीच लगातार काम करते-करते सेन की पहचान इतनी मजबूत हो गई कि उन्हें “आरामबाग का गांधी” कहा जाने लगा। उनके इस काम को स्थानीय शिक्षाविद और आरामबाग हाई स्कूल के प्रधानाध्यापक नागेंद्रनाथ चटर्जी से भी प्रेरणा मिली। दिलचस्प बात यह थी कि बाद में सेन ने चुनाव में चटर्जी को हराया, लेकिन दोनों के बीच सम्मान का रिश्ता कभी खत्म नहीं हुआ। कहा जाता है कि राष्ट्रीय स्तर के नेता बनने के बाद भी सेन हर मुलाकात में उन्हें प्रणाम करते थे।
स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में सेन पूरी तरह आंदोलन में सक्रिय हो गए। वे कांग्रेस के प्रबल समर्थक थे और गांधी के ग्राम स्वराज तथा आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विचारों से गहराई से प्रभावित थे। ब्रिटिश शासन के खिलाफ गतिविधियों के कारण उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा।
1930 से 1942 के बीच उन्होंने विभिन्न जेलों में कुल मिलाकर दस साल से अधिक समय बिताया। उस दौर में उनका जीवन बेहद सादा था। सेरामपुर में कांग्रेस का कार्यालय ही उनका घर था, आय लगभग न के बराबर थी और उनकी संपत्ति के नाम पर केवल एक हाथ से बुनी धोती और एक कुर्ता था।
1940 के दशक में जब ब्रिटिश सरकार ने सीमित लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू की, तब सेन को 1944 में आरामबाग से बंगाल विधानसभा के लिए चुना गया। वे विपक्ष के उपनेता बने और धीरे-धीरे प्रांतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण नेता के रूप में उभरने लगे।
भारत की स्वतंत्रता के बाद उनकी राजनीतिक भूमिका और मजबूत हो गई। 1948 में पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बिधान चंद्र रॉय ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया और उन्हें खाद्य मंत्री बनाया। यह जिम्मेदारी उन्होंने लगभग दो दशकों तक निभाई। वे रॉय के उपमुख्यमंत्री भी रहे और लंबे समय तक उन्हें उनका संभावित उत्तराधिकारी माना जाता रहा।
1961 में डॉ. रॉय के निधन के बाद सेन पश्चिम बंगाल के तीसरे मुख्यमंत्री बने। सत्ता संभालने के कुछ ही वर्षों बाद उन्हें एक गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ा। देश में पड़े भीषण सूखे के कारण राज्य में खाद्यान्न संकट उत्पन्न हो गया। इस स्थिति से निपटने के लिए उन्होंने दिल्ली में खाद्य मंत्रियों की बैठक में एक कठिन प्रस्ताव रखा—शहरी क्षेत्रों में राशनिंग लागू की जाए। यह निर्णय राजनीतिक रूप से अलोकप्रिय था, लेकिन सेन का मानना था कि संकट से निपटने का यही रास्ता है। कुछ ही महीनों में उन्होंने राज्य में अनाज की राशनिंग लागू कर दी। समय के साथ इसमें बदलाव हुए, लेकिन यह व्यवस्था आज भी पश्चिम बंगाल में किसी न किसी रूप में मौजूद है।
खाद्यान्न भंडार बढ़ाने के लिए उन्होंने चावल मिलों पर भारी कर लगाया। इससे व्यापारी वर्ग नाराज हो गया। आवश्यक वस्तुओं की कमी और बढ़ती महंगाई के कारण कांग्रेस सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। कई जगह हिंसा हुई और पुलिस की सख्त कार्रवाई ने हालात को और तनावपूर्ण बना दिया। धीरे-धीरे उनकी सरकार राजनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ने लगी।
और इसका असर 1967 के विधानसभा चुनाव में साफ दिखाई दिया। कांग्रेस को मार्क्सवादी दलों से हार का सामना करना पड़ा और स्वयं सेन भी आरामबाग से अपनी सीट हार गए। उन्हें हराने वाले नेता थे गांधीवादी विचारों से जुड़े अजय मुखर्जी, जो बाद में राज्य के चौथे मुख्यमंत्री बने। उस चुनाव में छात्र नेता नारायण चंद्र घोष की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।
हार के बाद भी सेन पूरी तरह राजनीति से दूर नहीं हुए। वे फिर से विधानसभा के लिए चुने गए, लेकिन कभी किसी बड़े पद पर नहीं लौटे। 1980 के दशक में उन्होंने दलविहीन लोकतंत्र की अवधारणा का समर्थन किया, हालांकि यह विचार व्यावहारिक रूप से सफल नहीं हो पाया।
उनका राजनीतिक जीवन एक और दिलचस्प मोड़ से भी जुड़ा रहा। 1969 में कांग्रेस पार्टी में विभाजन हुआ। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाले गुट को कांग्रेस (आई) कहा गया, जबकि दूसरे गुट को कांग्रेस (ओ) के नाम से जाना गया। सेन कांग्रेस (ओ) के साथ रहे। हालांकि बाद में यह गुट लगभग समाप्त हो गया, फिर भी सेन ने जीवन के अंतिम वर्षों तक सार्वजनिक जीवन में सक्रियता बनाए रखी।
उनका निजी जीवन भी उतना ही प्रेरणादायक था। वे आजीवन अविवाहित रहे और अत्यंत सादगीपूर्ण जीवन जीते रहे। गांधीवादी विचारों के अनुरूप उन्होंने ग्रामीण उद्योगों को बढ़ावा देने का अभियान चलाया। खास तौर पर खादी के प्रचार-प्रसार में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जीवन के अंतिम वर्षों तक वे केवल खादी के कपड़े पहनते थे। यहां तक कि मृत्यु से एक सप्ताह पहले भी उन्होंने एक नई दुकान के उद्घाटन के अवसर पर स्वयं खादी बेचकर उसकी शुरुआत की।
उनका वैचारिक जीवन भी कई मायनों में दिलचस्प था। वे मार्क्सवादी विचारधारा के प्रबल आलोचक थे, जबकि उनके अपने भाई मनिंद्रनाथ सेनगुप्ता कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़े थे। दोनों भाइयों की राजनीतिक राह अलग थी, लेकिन दोनों का लक्ष्य गरीबों और वंचितों के जीवन को बेहतर बनाना ही था।
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प्रफुल्ल चंद्र सेन का निधन 25 सितंबर 1990 को कलकत्ता में हुआ। उनके जीवन को याद करते हुए ब्रिटेन के अखबार ‘द इंडेपेंडेंट’ ने लिखा कि वे बंगाल के एक जोशीले स्वतंत्रता सेनानी थे, जो बाद में मुख्यमंत्री बने और जिन्होंने निस्वार्थ तथा सिद्धांतवादी राजनीति की ऐसी मिसाल पेश की, जिसे आज के समय में लगभग भुला दिया गया है।
सेन्हाटी के एक साधारण गांव से निकलकर “आरामबाग के गांधी” और फिर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बनने तक का उनका सफर भारतीय राजनीति के उस दौर की याद दिलाता है, जब सत्ता से ज्यादा मूल्य और सिद्धांत मायने रखते थे। शायद यही वजह है कि उनका जीवन आज भी यह सिखाता है कि राजनीति का असली अर्थ सत्ता नहीं, बल्कि समाज के प्रति निस्वार्थ समर्पण है।
यह सीरीज पश्चिम बंगाल के सभी मुख्यमंत्रियों की कहानी प्रस्तुत करती है। पढ़ें अगली कड़ी में राज्य के चौथे सीएम अजय कुमार मुखर्जी की राजनीतिक यात्रा।
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जब देश की राजनीति दिल्ली में आकार ले रही थी, तब बंगाल अपनी अलग बेचैनी से गुजर रहा था। विभाजन का घाव ताजा था, शरणार्थियों की भीड़ शहरों का संतुलन बिगाड़ रही थी और सत्ता को ऐसे नेतृत्व की तलाश थी जो भावनाओं और प्रशासन — दोनों की नाड़ी पहचान सके। ऐसे ही समय में एक डॉक्टर, जो मरीज की नब्ज पढ़ने का अभ्यास रखता था, राजनीति की नब्ज भी समझने लगा। उसका दिल्ली से संवाद था, पंडित नेहरू का विश्वास था और बंगाल की जनता से सीधा रिश्ता। रसगुल्ले की मिठास से लेकर सत्ता की सख्ती तक — यह कहानी है डॉ. बिधान चंद्र राय के उस सफर की, जब वे पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री बने और राज्य की दिशा तय करने लगे। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
