कोलकाता की गलियों में एक ऐसा आदमी था, जो सिगरेट के धुएं के बीच पाब्लो नेरूदा पढ़ता, टैगोर की कविता पर मुस्कुराता और अगले ही पल सरकारी फाइलों के ढेर में खो जाता। वह आदमी था बुद्धदेव भट्टाचार्य। यह वही कामरेड था, जिसकी उंगलियों के बीच फंसा धुआं कभी पार्टी लाइन और नीति निर्धारण की गंध बनता था, तो कभी चाय की चुस्की और फिल्मी संवादों में गायब हो जाता था। लोग कहते हैं, राइटर्स बिल्डिंग में जब वे मुख्यमंत्री के कार्यालय में कदम रखते, सबसे पहला काम यह नहीं होता कि फाइलें खोली जाएं, बल्कि वे अपने ऑफिस के स्मोक अलार्म को बंद करवा देते थे। उनका मानना था कि सिगरेट और मार्क्सवाद के बीच गहरा रिश्ता है और नीति निर्धारण तब स्पष्ट और शांत होता है, जब धुआं फाइलों और लाल झंडों के बीच उठता हो।
वास्तव में बुद्धदेव कोई साधारण नेता नहीं थे। वे कवि, विचारक, फिल्म प्रेमी और कभी-कभी ‘पॉलिटिकल जेम्स बॉन्ड’ के एक ऐसा मिश्रण थे जिनका हर कदम लाल दुर्ग की गलियारों में एक कहानी बनाता था, और उनकी हर कहानी में सत्ता, सत्ता विरोध और व्यक्तिगत सादगी का अनोखा मेल था। यही जादू था कि कोई भी व्यक्ति, चाहे चैन स्मोकर हो या सिनेमा देखने वाला, उनके ऑफिस में कदम रखते ही यह महसूस करता कि यह कामरेड केवल मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि वामपंथी घटनाओं और समय का साक्षी है।
और फिर, जब आप सोचते कि यही उनका पूरा व्यक्तित्व है, तो सिंगूर और नंदीग्राम की कहानियां आपको यह याद दिला देती हैं कि यही वही कामरेड था जिसने अपने राजनीतिक जीवन के सबसे बड़े प्रयोग —‘डू इट नाउ’— के लिए अपने ही विचारों और पहचान के हिस्से छोड़ दिए। एक ऐसा नेता, जो अपने सपनों के बंगाल को फिर से जीवंत करना चाहता था, और इसके लिए खुद को दो कमरों के फ्लैट में कैद कर लिया था—जहां सीलन भरी दीवारें, खुले तार और सिगरेट का धुआं उसके सबसे भरोसेमंद साथी थे, और जिसकी सोच में क्रांति और पार्टी लाइन की गूंज हमेशा मौजूद रहती थी।
आप शायद सोच रहे हैं कि बंगाल की राजनीति सिर्फ लाल झंडों, नारों और आंदोलनों का खेल है, तो बुद्धदेव भट्टाचार्य की कहानी इस धारणा को पूरी तरह पलट देती है। चैन स्मोकर, सिनेमा प्रेमी, कवि और विचारक—ये सब उनका व्यक्तित्व थे।
1 मार्च 1944 को जन्मे बुद्धदेव किसी राजनीतिक घराने के नहीं, बल्कि विद्वानों की कोख से आए। उनके दादा संस्कृत के प्रकांड पंडित थे, जबकि चाचा सुकांत भट्टाचार्य बंगाल के क्रांतिकारी कवि। प्रेसीडेंसी कॉलेज के मेधावी छात्र, बुद्धदेव ने राजनीति में आने से पहले स्कूल मास्टर के रूप में भी समय बिताया। उनकी सादगी की मिसाल यह थी कि मुख्यमंत्री बनने के बावजूद उन्होंने सरकारी बंगला ठुकरा दिया और पाम एवेन्यू स्थित अपने दो कमरों वाले फ्लैट में ही रहे। कमजोर दीवारों, बिजली के खुले तारों के बीच उनका जीवन उतना ही पारदर्शी और साधारण था, जितना उनका व्यक्तित्व। पत्नी मीरा भट्टाचार्य के साथ उनका रिश्ता इतना सहज था कि घर का खर्च अक्सर पत्नी की आय से चलता था।
उनकी संतान, सुचेतन भट्टाचार्य, जो बाद में लिंग परिवर्तन के कारण चर्चा में रहे, के प्रति उनका व्यवहार हमेशा संवेदनशील और आधुनिक पिता का रहा। निजी जीवन में कट्टर नास्तिक होते हुए भी वे मानवीय संवेदनाओं को सर्वोपरि रखते थे।
शेख हसीना भिजवाती थीं ढाका की ताजी ‘इलिश’ मछली
बुद्धदेव केवल बंगाल तक सीमित नहीं थे। ढाका में उनके रिश्ते बेहद आत्मीय थे। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना उनके लिए ढाका से ताजी ‘इलिश’ मछली भिजवाती थीं। यह वही कामरेड था, जिसकी दूरदृष्टि और पार्टी‑संगठन में समझ, पश्चिम बंगाल की शांति के लिए हमेशा क्रांति‑सदृश सोच रखती थी। बुद्धदेव का मानना था कि बांग्लादेश में एक धर्मनिरपेक्ष सरकार का होना अनिवार्य है। वे अक्सर कहते थे, “हसीना का ढाका में होना कोलकाता की नींद को सुकून देता है।” इस प्रकार उनकी दूरदृष्टि सिर्फ बंगाल तक नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी राजनीतिक स्थिरता और पार्टी लाइन के लिए काम करती थी।
अपनी ही सरकार के कैबिनेट को ‘चोरों की परिषद’ कहा
ज्योति बसु के नेतृत्व में वामपंथ के लंबे शासन और लाल झंडों के किले में बुद्धदेव को उनका ‘परछाई’ माना जाता था। लेकिन 1993 में एक मोड़ आया जिसने सबको चौंका दिया। अपनी ही सरकार के भ्रष्टाचार और कामकाज से आहत होकर बुद्धदेव ने कैबिनेट को “चोरों की परिषद” कह दिया और मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। यह सत्ता के भीतर रहते हुए सत्ता और संगठन के खिलाफ उठाई गई आवाज थी। इस दौरान उन्होंने ‘दुसमय’ नामक नाटक भी लिखा, जो उनके भीतर के राजनीतिक द्वंद्व, साथी नेताओं और पार्टी संघर्ष को दर्शाता है। बाद में ज्योति बसु ने उन्हें मनाकर वापस लाया और 2000 में बंगाल की कमान उन्हें सौंप दी।
टाटा की नैनो कार के लिए सिंगूर में जमीन देना बना ‘वाटरलू’
मुख्यमंत्री बनने के बाद बुद्धदेव ने घोषणा की—”डू इट नाउ”। उनका कहना था, “मैं पूंजीवाद से समझौता करता हुआ कम्युनिस्ट हूं, क्योंकि मुझे बंगाल में नौकरियां चाहिए।” उन्होंने टाटा की नैनो कार के लिए सिंगूर में जमीन दी, लेकिन यह फैसला उनके लिए राजनीतिक ‘वाटरलू’ साबित हुआ। सिंगूर और नंदीग्राम में हुए खून-खराबे और जनता तथा पार्टी कार्यकर्ताओं के आंदोलनों ने उन्हें जनविरोधी बना दिया। अपर्णा सेन और महाश्वेता देवी जैसे बुद्धिजीवी कभी उनके साथ चाय पीते थे, लेकिन अब सड़क पर उनके खिलाफ खड़े हो गए। जिस ‘नंदन’ सांस्कृतिक केंद्र को उन्होंने सजाया था, वही पार्टी और संगठन के खिलाफ आवाज उठाने का केंद्र बन गया।
भट्टाचार्य ने एक नए और फिर से जीवंत हुए पश्चिम बंगाल का सपना देखा था। उस सपने को पूरा करने के लिए, उन्होंने अपनी पहचान के कुछ ऐसे हिस्सों को भी छोड़ दिया था, जो उनकी पहचान का अभिन्न अंग थे। इस कोशिश में कुछ तो ऐसा था, जो किसी नायक और साथी नेता जैसा था। दुनिया भर में कम्युनिस्ट सरकारों के पतन ने निस्संदेह उन्हें अपनी सोच को नए सिरे से गढ़ने और अपनी कुछ पुरानी और पक्की सोच को छोड़ने में मदद की थी। लेकिन वे अपने अतीत और अपनी पार्टी संरचना तथा संगठन के साथ चल रही इस लड़ाई को जीत नहीं पाए। CPM के काम करने के तरीके में जो हिंसा, आंदोलन और लाल झंडों की नीति रची-बसी थी, वही आखिरकार भट्टाचार्य के पतन का कारण बनी।
वामपंथ के अभेद्य दुर्ग में अपने अफसर से चुनाव हार गये
2011 का चुनाव पश्चिम बंगाल के इतिहास का वह पन्ना था जिसने 34 साल के वामपंथी किले और लाल झंडों के साथियों के शासन को ढहा दिया। बुद्धदेव जादवपुर सीट से चुनाव लड़ रहे थे, जिसे वामपंथ का अभेद्य दुर्ग माना जाता था। उनके सामने कोई बड़ा राजनेता नहीं, बल्कि मनीष गुप्ता थे—वही मनीष गुप्ता जो कभी वरिष्ठ कामरेड ज्योति बसु के कार्यकाल में मुख्य सचिव रह चुके थे। यानी एक मुख्यमंत्री अपने ही पूर्व मुख्य सचिव और पार्टी संगठन के साथी से चुनाव हार गया। हार के बाद बुद्धदेव ने कोई सफाई नहीं दी, बस चुपचाप अपनी पुरानी कार पकड़ी और उसी दो कमरों के फ्लैट में लौट गए, जहां से उन्होंने अपने संगठन और क्रांति की राह पर सफर शुरू किया था।
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एक बहुत ही मशहूर प्रसंग में, मार्क्स ने लिखा था कि इंसान अपना इतिहास खुद बनाते हैं, लेकिन वे इसे ठीक वैसे नहीं बनाते, जैसा वे चाहते हैं। अतीत का साया उन पर हमेशा मंडराता रहता है। भट्टाचार्य ने इतिहास रचने की कोशिश की थी, लेकिन उनके और उनकी पार्टी तथा वामपंथी संगठन के अतीत के उस भारी और बोझिल साये ने उन्हें एक ऐसे पैगंबर में बदल दिया, जिसका अंत पहले से ही तय था।
सिगार, साहित्य और और ‘नंदन’ का अधूरा सपना
सत्ता से हटने के बाद भी उनकी सादगी नहीं बदली। उन्होंने 2022 में ‘पद्म भूषण’ लेने से इनकार कर दिया, यह कहते हुए कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं दी गई। उनकी अंतिम सांसों तक उनके पास सिर्फ किताबें, सिगरेट का धुआं और ‘नंदन’ का अधूरा सपना था। 8 अगस्त 2024 को उनका निधन हुआ। अक्सर राजनेताओं की मौत के बाद बड़े-बड़े राजकीय सम्मान, धार्मिक कर्मकांड और फूलों से लदी गाड़ियां दिखती हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी के वरिष्ठ कामरेड बुद्धदेव भट्टाचार्य का किस्सा सबसे जुदा है। न कोई पंडित बुलाया गया, न कोई मंत्र पढ़ा गया और न ही उनका अंतिम संस्कार हुआ। क्यों? क्योंकि उन्होंने जीते-जी लिख दिया था कि मरने के बाद उनका शरीर और आंखें संगठन और समाज के काम आनी चाहिए। एक कट्टर कर्मकांडी ब्राह्मण परिवार में जन्मे बुद्धदेव का यह ‘महादान’ भारतीय राजनीति में सादगी और सिद्धांतों की सबसे बड़ी मिसाल बन गया।
बुद्धदेव भट्टाचार्य का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जहां सुबह की शुरुआत ही संस्कृत के श्लोकों और पूजा-पाठ से होती थी। उनके दादा संस्कृत के बहुत बड़े विद्वान और नामी पंडित थे। लेकिन नियति देखिए, उसी वंश का यह बेटा बड़ा होकर पक्का ‘नास्तिक’ बना। उन्होंने धर्म की रस्मों के बजाय मार्क्सवाद की किताबों, पार्टी लाइन और आम जनता की सेवा को अपना ‘धर्म’ माना।
उनकी पत्नी मीरा भट्टाचार्य और संतान सुचेतन के साथ उनका जीवन इतना सादा था कि विश्वास करना मुश्किल होता है। वे कोलकाता के ‘पाम एवेन्यू’ स्थित एक छोटे से, दो कमरों के सरकारी फ्लैट में रहते थे। मुख्यमंत्री रहते हुए भी उनके घर का दरवाजा पार्टी सहयोगियों और आम लोगों के लिए खुला रहता था। वे अक्सर रात में खुद उठकर अपनी बिल्डिंग के बाहर घूमने वाले लावारिस कुत्तों और साथियों को खाना खिलाते थे।
बुद्धदेव भट्टाचार्य की कहानी सिर्फ सत्ता की नहीं, बल्कि वामपंथी विचारधारा, संगठन और विकास के बीच जंग की है। यह सवाल छोड़ जाती है – क्या विकास के लिए विचारधारा और क्रांति की बलि जरूरी है? और अगर हां, तो उस बलि की कीमत हमेशा ‘नायक’ और पार्टी के साथी नेताओं को ही क्यों चुकानी पड़ती है?
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भारतीय राजनीति में कुछ कहानियां कुर्सियों से नहीं, फैसलों से बनती हैं। यह कहानी उन्हीं में से एक है। यह उस नेता की कहानी है, जिसने सत्ता के सबसे ऊंचे शिखर पर बैठने का अवसर केवल इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि उसके लिए पद से बड़ा उसकी पार्टी का अनुशासन था। विडंबना यह रही कि इसी निर्णय ने उसे राजनीति की नैतिक ऊंचाइयों पर स्थापित कर दिया। यह कहानी है ज्योति बसु की, एक ऐसा नाम, जो भारतीय राजनीति में सिद्धांत, अनुशासन और एक “ऐतिहासिक भूल” के कारण हमेशा याद किया जाएगा। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर क्लिक करें।
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