जब देश की राजनीति दिल्ली में आकार ले रही थी, तब बंगाल अपनी अलग बेचैनी से गुजर रहा था। विभाजन का घाव ताजा था, शरणार्थियों की भीड़ शहरों का संतुलन बिगाड़ रही थी और सत्ता को ऐसे नेतृत्व की तलाश थी जो भावनाओं और प्रशासन — दोनों की नाड़ी पहचान सके। ऐसे ही समय में एक डॉक्टर, जो मरीज की नब्ज पढ़ने का अभ्यास रखता था, राजनीति की नब्ज भी समझने लगा। उसका दिल्ली से संवाद था, पंडित नेहरू का विश्वास था और बंगाल की जनता से सीधा रिश्ता। रसगुल्ले की मिठास से लेकर सत्ता की सख्ती तक — यह कहानी है डॉ. बिधान चंद्र राय के उस सफर की, जब वे पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री बने और राज्य की दिशा तय करने लगे।
पांच साल में केवल एक किताब खरीद सके
1 जुलाई 1882 को पटना के बांकीपुर (खजांची रोड) में जन्मे बिधान चंद्र राय का बचपन सादगी और अभाव में बीता। पिता प्रकाशचंद्र राय डिप्टी मजिस्ट्रेट थे, लेकिन दानशील इतने कि धन संचय नहीं कर सके। मां ब्रह्मसमाज से प्रभावित थीं। घर में धार्मिकता, अनुशासन और सेवा का वातावरण था — यही संस्कार उनके व्यक्तित्व की जड़ बने। पांच भाई-बहनों में सबसे छोटे बिधान पढ़ाई में तेज थे। पटना से गणित में स्नातक करने के बाद उनका लक्ष्य स्पष्ट था — डॉक्टर बनना। वे कलकत्ता मेडिकल कॉलेज पहुंचे और यहीं से संघर्ष का असली दौर शुरू हुआ। आर्थिक तंगी इतनी थी कि पांच वर्षों में वे केवल पांच रुपये की एक पुस्तक खरीद सके। छात्रवृत्ति, छोटे-मोटे काम और अस्पताल में नर्सिंग जैसे कार्य कर उन्होंने पढ़ाई जारी रखी।
उन्होंने एलएमपी और फिर एमडी की परीक्षा कम समय में उत्तीर्ण की। वे सिर्फ परीक्षा पास नहीं करते थे, रिकॉर्ड बनाते थे। उच्च अध्ययन के लिए 1909 में इंग्लैंड गए। उस समय भारतीय छात्रों के लिए वहां प्रवेश आसान नहीं था। “बंगाल” से आने के कारण उनका आवेदन कई बार अस्वीकार हुआ, लेकिन वे डटे रहे। अंततः सेंट बार्थोलोम्यू अस्पताल में प्रवेश मिला। दो वर्ष तीन महीने के भीतर उन्होंने एमआरसीपी और एफआरसीएस जैसी कठिन परीक्षाएं उत्तीर्ण कर लीं—यह उपलब्धि उस दौर में बहुत कम भारतीयों को मिली थी। यह केवल डिग्रियों की कहानी नहीं, आत्मविश्वास की जीत थी—गरीबी में पला युवक दुनिया के प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों में अपनी जगह बना चुका था।
1911 में इंग्लैंड से कलकत्ता लौटे और अध्यापन किया
1911 में भारत लौटकर उन्होंने कलकत्ता मेडिकल कॉलेज, कैंपबेल मेडिकल स्कूल और कारमाइकेल मेडिकल कॉलेज में अध्यापन किया। वे कुशल शिक्षक थे। बाद में निजी प्रैक्टिस शुरू की और शीघ्र ही देश के अग्रणी डॉक्टरों में गिने जाने लगे। महात्मा गांधी के उपवास के समय वे उनके चिकित्सक रहे। मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू भी उन पर भरोसा करते थे।
नेहरू को रसगुल्ले पसंद थे। जब भी वे कोलकाता आते, डॉ. राय उनके लिए रसगुल्ले भिजवाते। यह छोटी-सी बात थी, पर गहरा संदेश देती थी—राजनीति में विश्वास और आत्मीयता भाषणों से नहीं, रिश्तों से बनते हैं। एक डॉक्टर जानता है कि इलाज में संवेदना जरूरी है; वही संवेदना उनकी राजनीतिक ताकत बनी। वे दिल्ली और कोलकाता के बीच भरोसेमंद सेतु बने।
1923 में उन्होंने बंगाल विधान परिषद का चुनाव जीतकर राजनीति में प्रवेश किया। वे स्वराज पार्टी से जुड़े और देशबंधु चित्तरंजन दास के करीबी सहयोगी बने। 1928 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में स्वागत समिति के महामंत्री रहे। वे उग्र भाषणों की बजाय ठोस काम में विश्वास करते थे और मध्यम मार्ग के समर्थक थे। सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान 1930 और 1932 में जेल भी गए।
वे दो बार कलकत्ता के मेयर चुने गए। सड़कों, जल व्यवस्था, अस्पतालों और शिक्षा में सुधार के प्रयासों से उनकी प्रशासनिक क्षमता स्पष्ट हुई। मुफ्त शिक्षा और चिकित्सा सेवाओं पर उन्होंने विशेष जोर दिया। 1939 से 1945 तक वे ऑल इंडिया मेडिकल काउंसिल के अध्यक्ष रहे। चित्तरंजन सेवा सदन, यादवपुर टीबी अस्पताल और चिकित्सा शिक्षा के विस्तार में उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा। यही अनुभव आगे चलकर मुख्यमंत्री के रूप में काम आया।
मुख्यमंत्री बनने से पहले साफ तौर पर कहा मंत्रियों का नाम खुद तय करूंगा
15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ और डॉ. प्रफुल्ल चंद्र घोष पश्चिम बंगाल के पहले मुख्यमंत्री बने। 14 जनवरी 1948 को उनके पद छोड़ने के बाद कांग्रेस विधायक दल को नया नेता चुनना था। राज्य दंगों, शरणार्थी समस्या और आर्थिक संकट से जूझ रहा था। सबकी नजर डॉ. बिधान चंद्र राय पर गई। वे अनुभवी, ईमानदार और प्रशासनिक दृष्टि से सक्षम थे, पर उन्होंने तुरंत सहमति नहीं दी। उन्होंने स्पष्ट कहा—“मैं तभी दायित्व स्वीकार करूंगा जब मंत्रिमंडल योग्यता के आधार पर चुनने की स्वतंत्रता होगी।” शर्त मान ली गई और 23 जनवरी 1948 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
मुख्यमंत्री बनने के बाद उनका डॉक्टर वाला स्वभाव साफ दिखा। उन्होंने पहले बीमारी पहचानी — समस्या केवल दंगों या शरणार्थियों की नहीं, असली चुनौती आर्थिक कमजोरी थी। उन्होंने शिक्षा और उद्योग को साथ लेकर चलने की नीति अपनाई। दामोदर घाटी निगम को गति दी, दुर्गापुर इस्पात नगरी के विकास में भूमिका निभाई, खड़गपुर में आईआईटी की स्थापना में सहयोग दिया। जादवपुर विश्वविद्यालय और रवींद्र भारती विश्वविद्यालय के गठन में सक्रिय रहे। वे मानते थे कि जब तक जनता स्वस्थ और शिक्षित नहीं होगी, स्वतंत्रता अधूरी रहेगी।
वे गांधीजी के निकट थे, पर अंध समर्थक नहीं। असहमति होने पर खुलकर चर्चा करते थे। नेहरू के मित्र थे, पर राज्यहित में स्वतंत्र निर्णय लेते थे। वे स्वयं को केवल बंगाली नहीं मानते थे; कहते थे कि वे बिहार, बंगाल और असम—तीनों के हैं। उनके लिए पहचान जन्म से नहीं, गुण से होती थी।
1961 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया — यह उनके चिकित्सा, शिक्षा और प्रशासनिक योगदान की स्वीकृति थी। 1 जुलाई 1962 को, अपने 80वें जन्मदिन की सुबह, उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन के बाद 1 जुलाई “डॉक्टर्स डे” के रूप में मनाया जाने लगा।
डॉ. बिधान चंद्र राय की कहानी सत्ता की चमक भर नहीं है। यह उस व्यक्ति की कहानी है जिसने पांच रुपये की एक किताब से शुरुआत की, इंग्लैंड में दो सर्वोच्च डिग्रियां हासिल कीं, गांधी और नेहरू का विश्वास जीता और विभाजन से टूटे बंगाल की नाड़ी पहचानकर उसका उपचार किया। उन्होंने दिखाया कि राजनीति यदि सेवा की भावना से की जाए तो वह भी उपचार बन सकती है।
वे केवल मुख्यमंत्री नहीं थे; वे मूलतः डॉक्टर थे — जो पहले सुनता है, फिर समझता है और अंत में इलाज करता है। शायद इसी कारण वे आज भी सिर्फ पूर्व मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि “बंगाल के डॉक्टर” के रूप में याद किए जाते हैं, और हर वर्ष 1 जुलाई को देश उन्हें स्मरण करता है।
यह सीरीज पश्चिम बंगाल के सभी मुख्यमंत्रियों की कहानी प्रस्तुत करती है। पढ़ें अगली कड़ी में प्रफुल्ल चन्द्र सेन की राजनीतिक यात्रा।
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जब देश आजादी की पहली सुबह का जश्न मना रहा था, उसी समय विभाजन की त्रासदी ने बंगाल की धरती को लहूलुहान कर दिया था। शरणार्थियों की भीड़, प्रशासनिक अव्यवस्था और आर्थिक अस्थिरता — तीनों मिलकर नवगठित पश्चिम बंगाल को एक कठिन परीक्षा के दौर में खड़ा कर रहे थे। दिल्ली में सत्ता का नया ढांचा बन रहा था, और कोलकाता की गलियों में भविष्य की दिशा तय हो रही थी। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
