कोलकाता का कर्जन पार्क। साल 1969 की उमस भरी दोपहर। शहर की राजनीति उस समय पहले ही उथल-पुथल से गुजर रही थी, लेकिन उस दिन जो दृश्य वहां मौजूद लोगों ने देखा, वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में लगभग अनोखा था। पार्क में एक मंच लगा था और उसके ऊपर बैठे व्यक्ति कोई विपक्षी नेता नहीं थे, न ही किसी आंदोलनकारी संगठन के कार्यकर्ता। वे उस समय राज्य की सत्ता के सर्वोच्च पद पर बैठे हुए व्यक्ति थे यानी पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री। और वही मुख्यमंत्री अपनी ही सरकार के खिलाफ भूख हड़ताल पर बैठ गए थे। यह व्यक्ति थे अजय कुमार मुखर्जी (Ajay Kumar Mukherjee)। भारतीय राजनीति में यह घटना इतनी असाधारण मानी जाती है कि आज भी जब राजनीतिक इतिहास के विचित्र प्रसंगों की चर्चा होती है तो अजय कुमार मुखर्जी का यह सत्याग्रह अवश्य याद किया जाता है। लेकिन इस घटना को समझने के लिए हमें उस दौर के बंगाल की राजनीति, समाज और संघर्ष की पृष्ठभूमि को समझना होगा।
तामलुक की राष्ट्रवादी जमीन से उभरे अजय मुखर्जी
अजय कुमार मुखर्जी का जन्म 1901 में बंगाल के तामलुक क्षेत्र में हुआ था, जो आज के पश्चिम बंगाल के पूर्वी मेदिनीपुर जिले का हिस्सा है। उस समय यह इलाका राष्ट्रवादी गतिविधियों का एक सक्रिय केंद्र बन चुका था। बंगाल की राजनीतिक चेतना, जो उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की शुरुआत से ही मजबूत थी, तामलुक जैसे क्षेत्रों में और अधिक तीखी दिखाई देती थी। अजय मुखर्जी का युवावस्था में ही स्वतंत्रता आंदोलन की ओर झुकाव हो गया। उनकी राजनीति उग्र क्रांतिकारी शैली की नहीं थी; वे मूलतः गांधीवादी विचारों से प्रभावित थे। सत्याग्रह, जनसंपर्क और नैतिक राजनीति उनके सार्वजनिक जीवन की पहचान बने। वे विशेष रूप से स्वामी विवेकानंद के विचारों से प्रभावित थे, जिनसे उन्हें राष्ट्रवाद के साथ-साथ नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टि भी मिली।
पश्चिम बंगाल के चौथे मुख्यमंत्री अजय कुमार मुखर्जी के व्यक्तित्व को समझाने वाले कई छोटे-छोटे प्रसंग उस दौर की राजनीति में आज भी याद किए जाते हैं। 1960 के दशक के चुनावी दौर में आरामबाग क्षेत्र में प्रचार के समय उनका तरीका दूसरे नेताओं से बिल्कुल अलग दिखाई देता था। वे बड़े काफिलों और भाषणों के बजाय गांवों में छोटे-छोटे समूहों के बीच बैठकर लोगों से सीधे बातचीत करते थे और कहते थे कि राजनीति में असली ताकत जनता के भरोसे से आती है। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उनका यह जमीन से जुड़ा स्वभाव नहीं बदला।
हेलीकॉप्टर छोड़ नाव से पहुंचे मुख्यमंत्री
एक बार राज्य के कुछ हिस्सों में आई भीषण बाढ़ के दौरान अधिकारियों ने उन्हें हेलीकॉप्टर से हवाई सर्वेक्षण का सुझाव दिया, लेकिन उन्होंने नाव और सड़क के रास्ते प्रभावित इलाकों में जाकर लोगों की स्थिति खुद देखने पर जोर दिया। उनके साथ उस समय स्वतंत्रता संग्राम के साथी और बांग्ला कांग्रेस के नेता सुशील धारा (Sushil Dhara) भी अक्सर राहत कार्यों और राजनीतिक अभियानों में सक्रिय रहते थे। तामलुक और मेदिनीपुर क्षेत्र में स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों से ही दोनों के बीच गहरा विश्वास और साथ काम करने की परंपरा रही थी, और यही साझेदारी बाद में क्षेत्रीय राजनीति में भी दिखाई दी।
जब 1942 में भारत छोड़ा आंदोलन (Quit India Movement) शुरू हुआ, तब बंगाल में भी आंदोलन का जोर बढ़ गया। अंग्रेजी शासन के खिलाफ जगह-जगह समानांतर प्रशासन स्थापित करने की कोशिशें होने लगीं। इन्हीं प्रयासों के बीच तामलुक में एक असाधारण प्रयोग सामने आया – ताम्रलिप्त राष्ट्रीय सरकार (Tamralipta National Government)। यह ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ स्थानीय स्वशासन की एक तरह की प्रयोगशाला थी। इस समानांतर सरकार में कई स्थानीय राष्ट्रवादी नेताओं ने भूमिका निभाई और अजय कुमार मुखर्जी भी इसके प्रमुख चेहरों में शामिल थे। इस अनुभव ने उन्हें प्रशासन, जनसंगठन और राजनीतिक संघर्ष के बीच संतुलन बनाने की समझ दी।
आजादी के बाद अजय मुखर्जी स्वाभाविक रूप से कांग्रेस राजनीति में सक्रिय हो गए। उस समय देश भर में कांग्रेस ही प्रमुख राजनीतिक शक्ति थी और बंगाल भी इससे अलग नहीं था। लेकिन समय बीतने के साथ-साथ बंगाल में कांग्रेस की राजनीति को लेकर असंतोष बढ़ने लगा। अजय मुखर्जी जैसे नेताओं को महसूस होने लगा कि कांग्रेस का संगठन धीरे-धीरे जनता से दूर होता जा रहा है और स्थानीय मुद्दों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा। 1960 के दशक में यह असहमति खुलकर सामने आई। अंततः उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर एक नई राजनीतिक पार्टी बनाई — बंगला कांग्रेस। यह सिर्फ एक संगठनात्मक परिवर्तन नहीं था; यह बंगाल की राजनीति में उभर रही नई धारा का संकेत था। इसी दौर में राज्य में वामपंथी दल भी तेजी से मजबूत हो रहे थे। मजदूर आंदोलनों, छात्र संगठनों और किसान संघर्षों के माध्यम से उन्होंने समाज के बड़े हिस्से में अपनी पकड़ बना ली थी।
बंगाल में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार
1967 का विधानसभा चुनाव बंगाल की राजनीति के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। कांग्रेस लंबे समय से सत्ता में थी, लेकिन जनता के बीच असंतोष बढ़ रहा था। कई विपक्षी दलों ने मिलकर कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने के लिए एक गठबंधन बनाया, जिसे संयुक्त मोर्चा कहा गया। इस गठबंधन में वामपंथी दलों के साथ-साथ अजय मुखर्जी की बांग्ला कांग्रेस भी शामिल थी। चुनाव के परिणामों ने इतिहास रच दिया। कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और पहली बार बंगाल में गैर-कांग्रेसी सरकार बनने का रास्ता साफ हुआ। 2 मार्च 1967 को अजय कुमार मुखर्जी पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने। यह क्षण ऐतिहासिक था, क्योंकि इसने बंगाल की राजनीति में सत्ता परिवर्तन की नई परंपरा की शुरुआत की।
लेकिन यह जीत जितनी बड़ी थी, उतनी ही अस्थिर भी थी। गठबंधन की सरकार में विभिन्न दलों के बीच विचारों के टकराव और राजनीतिक मतभेद जल्दी ही सामने आने लगे। कृषि नीति, खाद्यान्न वितरण और प्रशासनिक फैसलों जैसे कई मुद्दों पर अजय मुखर्जी की राय उनके वामपंथी सहयोगियों से टकराने लगी। उस समय सरकार के भीतर कई महत्वपूर्ण विभाग वामपंथी नेताओं के पास थे, जिनमें सबसे प्रभावशाली चेहरों में से एक थे ज्योति बसु (Jyoti Basu)। स्थिति धीरे-धीरे ऐसी बन गई कि मुख्यमंत्री अजय मुखर्जी तो थे, लेकिन सत्ता का वास्तविक संतुलन उनके हाथों में नहीं रह गया था। यह तनाव समय के साथ और बढ़ता गया।
1967 के अंत तक राजनीतिक संकट गंभीर रूप ले चुका था। इसी दौरान वरिष्ठ नेता प्रफुल्ल चंद्र घोष (Prafulla Chandra Ghosh) राज्यपाल के पास पहुंचे और दावा किया कि अजय मुखर्जी की सरकार विधानसभा में बहुमत खो चुकी है। उस समय पश्चिम बंगाल के राज्यपाल थे धर्मवीर (Dharma Vira)। उन्होंने मुख्यमंत्री से विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए कहा। लेकिन विशेष सत्र बुलाने में देरी हुई और अंततः घटनाओं ने अचानक मोड़ ले लिया। सरकार को बर्खास्त कर दिया गया और पी. सी. घोष यानी प्रफुल्ल चंद्र घोष को मुख्यमंत्री बना दिया गया। इस फैसले ने बंगाल की राजनीति में तूफान खड़ा कर दिया।
सरकार की बर्खास्तगी के बाद राज्य भर में तीव्र राजनीतिक प्रतिक्रिया हुई। अजय मुखर्जी के समर्थकों और संयुक्त मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने इसे लोकतंत्र की हत्या बताया। कोलकाता और अन्य शहरों में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन शुरू हो गए। बसों और ट्रामों को आग के हवाले किया गया, पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुए और पूरा राज्य राजनीतिक उथल-पुथल में डूब गया। जब विधानसभा का सत्र शुरू हुआ तो वहां भी अभूतपूर्व दृश्य देखने को मिला। विधानसभा के स्पीकर बिजय कुमार बनर्जी (Bijoy Kumar Banerjee) ने घोषणा कर दी कि अजय मुखर्जी की सरकार को असंवैधानिक तरीके से हटाया गया है और उन्होंने सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया। हालात इतने बिगड़ गए कि अंततः राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा। यह सब 1968 में हुआ।
1969 में फिर से चुनाव हुए, लेकिन इस बार भी स्पष्ट बहुमत किसी को नहीं मिला। वाम दल सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरे, मगर मुख्यमंत्री पद को लेकर सहमति नहीं बन पा रही थी। लंबी बातचीत और समझौते के बाद एक बार फिर अजय कुमार मुखर्जी को मुख्यमंत्री बनाया गया। लेकिन परिस्थितियां लगभग वही थीं। वे मुख्यमंत्री थे, पर सत्ता का वास्तविक संतुलन गठबंधन के भीतर बंटा हुआ था।
जब बंगाल में शुरू हुआ ‘घेराव’ का दौर
इसी समय बंगाल की राजनीति में एक नया शब्द तेजी से लोकप्रिय हुआ। वह था घेराव। औद्योगिक क्षेत्रों, खासकर कोलकाता और उसके आसपास के कारखानों में मजदूरों ने अपने वेतन, काम की शर्तों और श्रम अधिकारों को लेकर प्रबंधन के खिलाफ घेराव की रणनीति अपनानी शुरू कर दी। फैक्ट्री प्रबंधकों को घंटों या कभी-कभी दिनों तक कार्यालयों में घेर कर रखा जाता था ताकि वे मजदूरों की मांगें मानने को मजबूर हों। यह आंदोलन इतना व्यापक हो गया कि सरकार बनने के शुरुआती छह महीनों के भीतर ही लगभग 1200 से अधिक घेराव की घटनाएं दर्ज की गईं। उद्योग जगत परेशान था और प्रशासन कई बार खुद को असहाय महसूस कर रहा था।
इन परिस्थितियों ने अजय मुखर्जी को गहरे संकट में डाल दिया। उन्हें लगने लगा कि मुख्यमंत्री होने के बावजूद वे हालात को नियंत्रित करने या नीति लागू कराने में सक्षम नहीं हैं। सरकार के भीतर विचारधारात्मक मतभेद, प्रशासनिक असमंजस और सड़क पर उबलती राजनीति, इन सबने उन्हें बेहद निराश कर दिया। और तभी उन्होंने वह कदम उठाया जिसने उन्हें भारतीय राजनीति में एक अलग पहचान दे दी।
1969 में दक्षिण कोलकाता के कर्जन पार्क में अजय मुखर्जी ने अपनी ही सरकार के खिलाफ भूख हड़ताल शुरू कर दी। यह 72 घंटे का सत्याग्रह था। उनका कहना था कि सरकार के भीतर चल रही अव्यवस्था और प्रशासनिक विफलता के खिलाफ वे नैतिक प्रतिरोध दर्ज कर रहे हैं। यह दृश्य भारतीय लोकतंत्र के लिए बेहद असामान्य था। एक मुख्यमंत्री अपनी ही सरकार के खिलाफ सार्वजनिक सत्याग्रह कर रहा था। इस घटना ने पूरे देश का ध्यान बंगाल की राजनीति की ओर खींच लिया। अंततः राजनीतिक संकट इतना गहरा गया कि राज्य में एक बार फिर राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा।
अजय मुखर्जी के राजनीतिक जीवन का एक रोचक प्रसंग भविष्य के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी (Pranab Mukherjee) से भी जुड़ा हुआ है। 1971 में अजय मुखर्जी अपने कुछ सहयोगियों के साथ कांग्रेस के उस धड़े में शामिल हो गए जिसे उस समय दक्षिणपंथी कांग्रेस कहा जाता था। उसी दौर में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें केंद्र सरकार में मंत्री बनने का प्रस्ताव दिया। लेकिन अजय मुखर्जी ने विनम्रता से यह प्रस्ताव वापस कर दिया। कहा जाता है कि उन्होंने ही इंदिरा गांधी को सुझाव दिया कि इस पद के लिए प्रणब मुखर्जी को अवसर दिया जाना चाहिए। आगे चलकर प्रणब मुखर्जी भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक बने और अंततः देश के राष्ट्रपति पद तक पहुंचे।
अजय कुमार मुखर्जी का राजनीतिक जीवन स्थिर शासन की कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है जब बंगाल की राजनीति नए रास्ते खोज रही थी और हर रास्ते पर संघर्ष मौजूद था। वे तीन बार पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने, लेकिन हर बार उनका कार्यकाल अपेक्षाकृत छोटा रहा। फिर भी उन्होंने बंगाल की राजनीति में एक अलग पहचान बनाई—एक ऐसे नेता की पहचान जो सत्ता से ज्यादा राजनीतिक नैतिकता को महत्व देता था। उनके योगदान को देखते हुए 1977 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण (Padma Vibhushan) से सम्मानित किया।
यह सीरीज पश्चिम बंगाल के सभी मुख्यमंत्रियों की कहानी प्रस्तुत करती है। पढ़ें अगली कड़ी में सिद्धार्थ शंकर राय की राजनीतिक यात्रा।
27 मई 1986 को कोलकाता में उनका निधन हो गया। लेकिन इतिहास में उनका नाम सिर्फ इसलिए याद नहीं किया जाता कि वे पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री थे। उनकी सबसे बड़ी पहचान उस अद्भुत घटना से जुड़ी है जिसने उन्हें भारतीय राजनीति के इतिहास में अलग स्थान दिलाया। एक ऐसा मुख्यमंत्री, जिसने सत्ता में रहते हुए भी अपनी ही सरकार के खिलाफ भूख हड़ताल करने का साहस दिखाया। यही प्रसंग उन्हें भारतीय लोकतंत्र की सबसे अनोखी राजनीतिक कहानियों में शामिल कर देता है।
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सेन्हाटी के एक साधारण गांव से निकलकर “आरामबाग के गांधी” कहलाने तक और फिर मुख्यमंत्री बनने तक का प्रफुल्ल चंद्र सेन का सफर बेहद दिलचस्प रहा। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी, गांधीवादी जीवनशैली और कठिन प्रशासनिक फैसलों ने उन्हें बंगाल की राजनीति में एक अलग पहचान दी। सन 1920 में कलकत्ता में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में उन्होंने महात्मा गांधी का भाषण सुना। गांधी के शब्दों का उन पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि उन्होंने विदेश जाकर करियर बनाने का विचार तुरंत त्याग दिया और खुद को देश की आजादी की लड़ाई में झोंक दिया। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
