कोलकाता की एक भीड़भाड़ वाली सड़क… उमस से भरी हवा… नारों का शोर… और अचानक भीड़ को चीरती हुई एक लाठी। पहला वार सिर पर पड़ा, फिर दूसरा। सफेद सूती साड़ी पर लाल खून फैलता गया। लोग सन्न रह गए। लेकिन उस दिन गिरकर भी जो खड़ी हुई, उसने सिर्फ एक हमला नहीं झेला, उसने अपनी पूरी राजनीति की दिशा तय कर ली। उसी पल एक नेता नहीं, एक “स्ट्रीट फाइटर” पैदा हुई, जो आगे चलकर मुख्यमंत्री बनी — ममता बनर्जी।

ममता बनर्जी की कहानी सत्ता के गलियारों में जन्मी कहानी नहीं है। यह कहानी सड़कों पर पली है, संघर्ष में ढली है और टकराव में तपकर निकली है। उनके जीवन को अगर एक लाइन में समझना हो तो यह एक ऐसी नेता की कहानी है, जो हर लड़ाई खुद लड़ती है, चाहे वह राजनीतिक हो, व्यक्तिगत हो या प्रतीकात्मक।

उनकी शुरुआत बेहद साधारण थी। बचपन में ही पिता का साया उठ गया और घर की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। आर्थिक हालात इतने कमजोर थे कि उन्हें पढ़ाई के साथ-साथ छोटे-मोटे काम भी करने पड़े। यह वह दौर था, जब जिंदगी ने उन्हें जल्दी सिखा दिया कि सहारा किसी और से नहीं, खुद से लेना पड़ता है। यही वजह है कि आगे चलकर उनकी राजनीति में “खुद मैदान में उतरना” एक स्थायी प्रवृत्ति बन गई।

कॉलेज के दिनों में ही उन्होंने यह साफ कर दिया था कि वह भीड़ का हिस्सा बनने के लिए नहीं, भीड़ को दिशा देने के लिए बनी हैं। छात्र राजनीति में सक्रिय रहते हुए उन्होंने आक्रामक अंदाज अपनाया। यह आक्रामकता दिखावे की नहीं थी, बल्कि उनके स्वभाव का हिस्सा थी। यही कारण है कि बहुत जल्दी उन्होंने कांग्रेस की युवा इकाई में अपनी जगह बना ली। 1970 के दशक में ही संगठन में जिम्मेदारी मिलना यह बताता है कि वह सिर्फ सक्रिय नहीं, प्रभावशाली भी थीं।

लेकिन असली पहचान बनी 1984 में, जब उन्होंने जादवपुर से चुनाव लड़कर एक बड़े वामपंथी नेता को हरा दिया। यह सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं थी, बल्कि एक संदेश था कि बिना संसाधनों, बिना राजनीतिक विरासत और बिना किसी बड़े सहारे के भी सत्ता को चुनौती दी जा सकती है। उस जीत ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित कर दिया।

1990 का हाजरा क्रॉसिंग वाला हमला बना निर्णायक

फिर भी, ममता बनर्जी की असली राजनीति संसद के भीतर नहीं, सड़कों पर दिखती रही। 1990 का हाजरा क्रॉसिंग वाला हमला उनकी जिंदगी का निर्णायक मोड़ बना। किसी भी नेता के लिए यह घटना पीछे हटने का कारण बन सकती थी, लेकिन ममता ने इसे अपनी ताकत बना लिया। महीनों तक सिर पर पट्टी बांधकर सार्वजनिक कार्यक्रमों में जाना सिर्फ सहानुभूति पाने का तरीका नहीं था, बल्कि एक संदेश था कि वह डरने वाली नहीं हैं।

उस घटना के बाद उन्होंने एक बात समझ ली कि राजनीति में वही दिखता है, जो सामने खड़ा होता है। और उन्होंने यही किया। हर संघर्ष में खुद मौजूद रहीं।

1993 में राइटर्स बिल्डिंग का वाकया उनकी जिद और टकराव की राजनीति का दूसरा बड़ा उदाहरण बना। एक पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए वह सीधे सचिवालय में घुस गईं। जब तत्कालीन मुख्यमंत्री से मिलने नहीं दिया गया, तो वहीं धरने पर बैठ गईं। पुलिस ने उन्हें घसीटा, गिरफ्तार किया, लेकिन जाते-जाते उन्होंने एक कसम खाई—कि वह इस इमारत में तभी लौटेंगी, जब सत्ता बदल देंगी। यह कोई सामान्य राजनीतिक बयान नहीं था, यह एक लक्ष्य था। और 18 साल बाद उन्होंने इसे सच कर दिखाया।

इसी क्रम में 21 जुलाई 1993 की घटना ने उनकी राजनीति को और गहरा बना दिया। पुलिस फायरिंग में 13 लोगों की मौत हुई। यह दिन उनके लिए सिर्फ एक विरोध का दिन नहीं रहा, बल्कि ‘शहीद दिवस’ बन गया, एक ऐसा प्रतीक, जो हर साल उनकी राजनीति को भावनात्मक आधार देता रहा।

कांग्रेस से अलग होकर 1997 में बनाई अपनी पार्टी

ममता बनर्जी की राजनीति का अगला बड़ा अध्याय तब शुरू हुआ, जब उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई। 1997 में तृणमूल कांग्रेस का गठन करना आसान फैसला नहीं था। यह एक बड़ा जोखिम था लेकिन ममता जोखिम लेने से कभी पीछे नहीं हटतीं। यही पार्टी आगे चलकर पश्चिम बंगाल की सबसे ताकतवर राजनीतिक शक्ति बनी।

उनकी राजनीति का एक दिलचस्प पहलू यह भी रहा कि उन्होंने समय-समय पर अलग-अलग गठबंधनों के साथ काम किया। कभी एनडीए का हिस्सा बनीं, कभी यूपीए के साथ आईं, और जब लगा कि उनके सिद्धांतों के खिलाफ जा रहा है, तो बिना हिचक गठबंधन छोड़ दिया। 2012 में उन्होंने यूपीए से अलग होकर यह साफ कर दिया कि उनके लिए सत्ता से ज्यादा अहम अपनी शर्तें हैं।

लेकिन अगर किसी एक घटना ने उन्हें “सत्ता बदलने वाली नेता” बनाया, तो वह था सिंगूर आंदोलन। 2006 में जब टाटा मोटर्स का नैनो प्रोजेक्ट पश्चिम बंगाल में आ रहा था, तब ममता ने इसे किसानों की जमीन छीनने का मामला बनाकर बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया। 26 दिन का अनशन, लगातार विरोध — उन्होंने इसे ‘डेविड बनाम गोलियत’ की लड़ाई बना दिया। अंत में टाटा को प्रोजेक्ट गुजरात ले जाना पड़ा। यह उनकी बड़ी राजनीतिक जीत थी, लेकिन इसके साथ ही उन्हें ‘एंटी-इंडस्ट्री’ का टैग भी मिला। यानी हर जीत अपने साथ एक नई चुनौती लेकर आई।

2011 में उन्होंने 34 साल पुराने वाम शासन को उखाड़ फेंका। यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि एक युग का अंत था। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। लेकिन यहां भी उनकी शैली नहीं बदली — वह आज भी उसी तरह काम करती हैं, जैसे विपक्ष में थीं।

चुनाव आयोग से टकराव, सुप्रीम कोर्ट में खुद बहस

उनकी राजनीति का एक सबसे खास पहलू है—हर लड़ाई को व्यक्तिगत बना देना। चाहे वह चुनाव आयोग से विवाद हो, या ईडी की जांच, या कोई प्रशासनिक संकट—वह खुद सामने आ जाती हैं। 2026 में जब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में खुद याचिकाकर्ता और वकील के रूप में पेश होकर चुनाव आयोग को चुनौती दी, तो यह सिर्फ कानूनी मामला नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक संदेश था कि वह अपनी लड़ाई खुद लड़ती हैं।

इसी तरह, जब ईडी ने उनके करीबी लोगों पर छापा मारा, तो वह खुद मौके पर पहुंच गईं। एक फाइल हाथ में लेकर बाहर निकलना और एजेंसी पर आरोप लगाना — यह सब उनकी उसी शैली का हिस्सा है, जिसमें वह हर घटना को एक दृश्य में बदल देती हैं।

उनकी सादगी भी उनकी राजनीति का हिस्सा है। सफेद सूती साड़ी, हवाई चप्पल, साधारण घर — यह सब उन्हें बाकी नेताओं से अलग करता है। यह कोई बनावटी छवि नहीं है, बल्कि उनका जीवन है। सत्ता में आने के बाद भी उन्होंने इसे नहीं बदला।

ममता बनर्जी का एक और पक्ष है — उनकी रचनात्मकता। वह कविताएं लिखती हैं, पेंटिंग करती हैं, संगीत में रुचि रखती हैं। यह सब उनके भीतर के उस हिस्से को दिखाता है, जो राजनीति की कठोरता से अलग है। लेकिन यह भी सच है कि वह इन सबको भी अपनी सार्वजनिक छवि का हिस्सा बना देती हैं।

जोखिम लेने और हर घटना का केंद्र खुद बनने की जिद

उनकी सबसे बड़ी ताकत है—लोगों से सीधा जुड़ाव। वह सिर्फ मंच से भाषण नहीं देतीं, बल्कि लोगों के बीच जाती हैं, उनसे बात करती हैं, उनके बीच समय बिताती हैं। यही वजह है कि उन्हें ‘दीदी’ कहा जाता है—एक ऐसा संबोधन, जो सिर्फ राजनीतिक नहीं, भावनात्मक भी है। लेकिन उनकी यही शैली उनके लिए जोखिम भी बन जाती है। जब हर चीज का केंद्र आप खुद होते हैं, तो हर गलती का निशाना भी आप ही बनते हैं। आरजी कर मेडिकल कॉलेज जैसे मामलों में यह साफ दिखा, जब जनता का गुस्सा सीधे उनके ऊपर आ गया। यानी उनकी ताकत ही उनकी कमजोरी भी बन जाती है।

ममता बनर्जी की जिंदगी का एक अहम पहलू यह भी है कि उन्होंने शादी नहीं की। उन्होंने खुद को पूरी तरह सार्वजनिक जीवन के लिए समर्पित कर दिया। यह फैसला उन्हें एक अलग तरह की स्वतंत्रता देता है, लेकिन इसके साथ ही यह उनकी प्रतिबद्धता को भी दिखाता है।

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उनकी दिनचर्या भी उनकी ऊर्जा को दर्शाती है। रोजाना कई किलोमीटर पैदल चलना, लोगों से मिलना, लगातार सक्रिय रहना—यह सब उनकी कार्यशैली का हिस्सा है। उम्र बढ़ने के बावजूद उनकी गति धीमी नहीं हुई है।

अगर उनकी पूरी कहानी को समेटा जाए, तो यह साफ दिखता है कि ममता बनर्जी सिर्फ एक मुख्यमंत्री नहीं हैं। वह एक ऐसी राजनीतिक शैली की प्रतिनिधि हैं, जिसमें रणनीति से ज्यादा साहस है, संरचना से ज्यादा टकराव है और दूरी से ज्यादा मौजूदगी है।

उनकी राजनीति का मूल मंत्र बहुत सरल है—“मैं यहां हूं, और मैं लड़ रही हूं।” यही वजह है कि वह हर दौर में प्रासंगिक बनी रहती हैं। वामपंथ के खिलाफ, कांग्रेस के खिलाफ, भाजपा के खिलाफ—हर मोर्चे पर उन्होंने खुद को खड़ा रखा है।

आखिर में, ममता बनर्जी की कहानी हमें यह बताती है कि राजनीति सिर्फ नीतियों और पदों की कहानी नहीं होती। यह व्यक्तित्व, साहस और उपस्थिति की भी कहानी होती है। और इस कहानी में ममता बनर्जी एक ऐसा चरित्र हैं, जो हर बार गिरकर उठता है, हर बार टकराता है और हर बार खुद को फिर से स्थापित करता है। वह नेता कम, एक सतत संघर्ष की कहानी ज्यादा हैं। और शायद यही उनकी सबसे बड़ी पहचान है।

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कोलकाता की गलियों में एक ऐसा आदमी था, जो सिगरेट के धुएं के बीच पाब्लो नेरूदा पढ़ता, टैगोर की कविता पर मुस्कुराता और अगले ही पल सरकारी फाइलों के ढेर में खो जाता। वह आदमी था बुद्धदेव भट्टाचार्य। यह वही कामरेड था, जिसकी उंगलियों के बीच फंसा धुआं कभी पार्टी लाइन और नीति निर्धारण की गंध बनता था, तो कभी चाय की चुस्की और फिल्मी संवादों में गायब हो जाता था। लोग कहते हैं, राइटर्स बिल्डिंग में जब वे मुख्यमंत्री के कार्यालय में कदम रखते, सबसे पहला काम यह नहीं होता कि फाइलें खोली जाएं, बल्कि वे अपने ऑफिस के स्मोक अलार्म को बंद करवा देते थे। उनका मानना था कि सिगरेट और मार्क्सवाद के बीच गहरा रिश्ता है और नीति निर्धारण तब स्पष्ट और शांत होता है, जब धुआं फाइलों और लाल झंडों के बीच उठता हो। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर क्लिक करें।