1967 का साल था। तब पुडुचेरी (उस समय पांडिचेरी) एक छोटा सा केंद्र शासित प्रदेश था, जो अभी-अभी फ्रांसीसी शासन की परछाईं से निकलकर अपनी नई पहचान गढ़ने की कोशिश कर रहा था। प्रशासन पूरी तरह जम नहीं पाया था, राजनीति अपने संतुलन की तलाश में थी और जनता उम्मीदों से भरी हुई थी। ऐसे समय में सत्ता का एक ऐसा फैसला हुआ, जिसने सबको चौंका दिया। मुख्यमंत्री की कुर्सी एक ऐसे युवक को सौंपी गई, जिसकी उम्र महज 29 साल सात महीने थी। यह युवक था एम. ओ. हसन फारूक मरीकर (M. O. Hasan Farook Maricar)। उस वक्त लोगों के मन में सवाल थे कि क्या इतनी कम उम्र का नेता इस जिम्मेदारी को निभा पाएगा? लेकिन यही सवाल आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गया।
फारूक की कहानी दरअसल सत्ता से नहीं, संघर्ष से शुरू होती है। 6 सितंबर 1937 को कराईकल में जन्मे फारूक उस पीढ़ी से आते थे, जिसने स्वतंत्रता के बाद भी औपनिवेशिक ढांचे को टूटते हुए देखा। 1953-54 में जब पांडिचेरी अब भी फ्रांस के अधीन था, तब एक छात्र के रूप में उन्होंने उसके मुक्ति आंदोलन में हिस्सा लिया। यानी राजनीति उनके लिए कोई पेशा नहीं, बल्कि एक स्वाभाविक विस्तार – संघर्ष से निकली हुई एक राह था। यही कारण था कि जब वे आगे बढ़े, तो उनकी राजनीति में जमीन का जुड़ाव हमेशा बना रहा।
बहुत कम उम्र में स्पीकर और मुख्यमंत्री का पद संभाला
1964 में वे पहली बार विधानसभा पहुंचे और बहुत कम उम्र में ही स्पीकर बना दिए गए। यह अपने आप में एक संकेत था कि उनमें नेतृत्व की संभावना देखी जा रही है। लेकिन असली परीक्षा 1967 में आई, जब उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया। यह सिर्फ पद नहीं था, बल्कि एक प्रयोग था यानी छोटे प्रदेश में युवा नेतृत्व का प्रयोग। और फारूक ने इसे उसी नजर से लिया।
‘हमारे पास संसाधन सीमित हैं, लेकिन काम सीमित नहीं होना चाहिए’
मुख्यमंत्री बनने के बाद अधिकारियों की पहली बैठक में उन्होंने जो कहा, वही उनकी राजनीति का सार था – “हमारे पास संसाधन सीमित हैं, लेकिन काम सीमित नहीं होना चाहिए।” यह वाक्य उस दौर की जरूरत भी था और उनके व्यक्तित्व का आईना भी। उनके पहले कार्यकाल को अक्सर “छोटे प्रदेश में बड़ा प्रयोग” कहा जाता है। वजह साफ थी – पांडिचेरी जैसे सीमित संसाधनों वाले क्षेत्र में उन्होंने प्रशासन को व्यवस्थित करने, बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और शासन को जनता के करीब लाने की कोशिश की। यह सब बिना किसी बड़े शोर-शराबे के हुआ। यही उनकी शैली थी यानी काम हो, लेकिन उसका शोर न हो।
उनकी कार्यशैली का एक दिलचस्प किस्सा उस समय के पत्रकारों के बीच अक्सर सुनाया जाता था। एक दिन वे बिना किसी सूचना के एक सरकारी दफ्तर पहुंच गए। वहां कई कर्मचारी समय पर नहीं आए थे। माहौल ऐसा था कि सबको लगा कि अब सख्ती होगी। लेकिन फ़ारूक ने कुछ नहीं कहा। वे चुपचाप एक कुर्सी पर बैठ गए और सभी कर्मचारियों के आने का इंतजार करने लगे। जब सब इकट्ठा हो गए तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा — “अगर हम समय पर नहीं आएंगे, तो जनता हम पर भरोसा कैसे करेगी?” यह एक साधारण वाक्य था, लेकिन उसका असर गहरा था। बिना डांट-फटकार के उस दफ्तर की कार्यशैली बदल गई। यही उनका तरीका था — संकेत से सुधार।
तीन बार मुख्यमंत्री बने, सहयोगी दल के साथ अच्छे संबंध निभाए
फारूक की राजनीति का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू था – उनका संतुलन। वे कांग्रेस के नेता थे, लेकिन 1969 से 1974 तक उन्होंने डीएमके के साथ मिलकर सरकार चलाई। यह उस दौर में आसान नहीं था, जब राजनीतिक विचारधाराएं ज्यादा टकराती थीं। लेकिन उनके लिए प्राथमिकता स्पष्ट थी – सत्ता का मतलब काम होना चाहिए, न कि सिर्फ दल। यही कारण था कि वे तीन बार मुख्यमंत्री बने — 1967-68, 1969-74 और 1985-90। हर बार परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन उनका तरीका लगभग वही रहा —शांत, संयमित और व्यावहारिक।
केंद्रीय मंत्री, हज समिति के सदस्य और सऊदी अरब में राजदूत रहे
समय के साथ उनकी राजनीति पांडिचेरी की सीमाओं से बाहर निकली और दिल्ली तक पहुंची। 1991, 1996 और 1999 में वे लोकसभा के लिए चुने गए। 1991 में जब पीवी नरसिंहा राव की सरकार बनी, तो फारूक को नागरिक उड्डयन और पर्यटन राज्य मंत्री बनाया गया। यह उनके लिए एक नया चरण था, जहां उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर काम करने का मौका मिला। इस दौरान उन्होंने जो काम किया, उसका असर सीधे पांडिचेरी पर पड़ा। वहां पुडुचेरी एयरपोर्ट की स्थापना और पुडुचेरी विश्वविद्यालय को मजबूत करने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।
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यह छोटे प्रदेश को देश के बड़े नक्शे से जोड़ने की दिशा में एक बड़ा कदम था। उनकी सक्रियता सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रही। 1975 से 2000 तक वे मुंबई में केंद्रीय हज समिति के सदस्य रहे। यह उनकी सामाजिक भागीदारी का एक और पहलू था। वे उन नेताओं में थे, जो सत्ता के बाहर भी समाज से जुड़े रहते थे। 2004 में उन्हें सऊदी अरब में भारत का राजदूत बनाया गया। यह एक अलग तरह की जिम्मेदारी थी, लेकिन उन्होंने इसे भी उसी सहजता से निभाया।
झारखंड और केरल के राज्यपाल का दायित्व भी संभाला
इसके बाद वे 2010 में झारखंड के राज्यपाल बने। झारखंड में उनका कार्यकाल एक खास वजह से याद किया जाता है। उस समय राज्य में राष्ट्रपति शासन था और बड़े पैमाने पर शिक्षकों की नियुक्ति होनी थी। आमतौर पर ऐसी प्रक्रियाएं विवादों में घिर जाती हैं, लेकिन फारूक के कार्यकाल में लगभग 2000 शिक्षकों की नियुक्ति साफ-सुथरे और पारदर्शी तरीके से हुई। इसका श्रेय उन्हें ही दिया गया। यह उनकी प्रशासनिक ईमानदारी का उदाहरण बन गया। 2011 में उन्हें केरल का राज्यपाल बनाया गया। लेकिन यह उनकी जिंदगी का आखिरी अध्याय साबित हुआ।
26 जनवरी 2012को जब पूरा देश गणतंत्र दिवस मना रहा था, तब चेन्नई के एक अस्पताल में उन्होंने आखिरी सांस ली। वे लंबे समय से बीमार थे। उनकी अनुपस्थिति में तिरुवनंतपुरम में ध्वजारोहण का कार्यक्रम मुख्यमंत्री ओमन चांडी (Oommen Chandy) ने किया। यह दृश्य अपने आप में एक प्रतीक था—एक ऐसा नेता, जिसने जीवन भर जिम्मेदारियां निभाईं, लेकिन आखिरी दिन खुद उस मंच तक नहीं पहुंच सका। उनका अंतिम संस्कार पुडुचेरी की जामा मस्जिद में पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया गया।
पीछे छूट गया एक लंबा राजनीतिक सफर तीन बार मुख्यमंत्री, तीन बार सांसद, केंद्रीय मंत्री, राजदूत और राज्यपाल। लेकिन इन सबके बीच जो सबसे ज्यादा याद किया जाता है, वह है उनकी सादगी। वे बिना तामझाम के लोगों के बीच जाते थे, पुराने साथियों को याद रखते थे और सबसे अहम — वे सुनते ज्यादा थे, बोलते कम। एम. ओ. एच. फारूक की कहानी हमें यह समझाती है कि राजनीति सिर्फ बड़े भाषणों और तीखे टकराव का नाम नहीं है। कभी-कभी यह छोटे-छोटे फैसलों, शांत स्वभाव और ईमानदार नीयत से भी बनती है। और यह भी कि सबसे बड़े प्रयोग हमेशा बड़े राज्यों में नहीं होते। कभी-कभी एक छोटे से प्रदेश में बैठा एक युवा मुख्यमंत्री भी इतिहास लिख जाता है, बिना शोर किए, धीरे-धीरे, लेकिन गहराई से।
यह सीरीज पुडुचेरी के सभी मुख्यमंत्रियों की कहानी प्रस्तुत करती है। पढ़ें अगली कड़ी में सुब्रमण्यन रामासामी की राजनीतिक यात्रा।
