31 मार्च – यह तारीख पुडुचेरी के इतिहास में सिर्फ एक दिन नहीं, बल्कि एक मोड़ है। 1954 में इसी दिन वी. वेंकटासुब्बा रेड्डियार ने ‘सरकार के खिलाफ सरकार’ का ऐलान किया था, जिसने फ्रांसीसी हुकूमत की जड़ों को हिला दिया और पुडुचेरी की तस्वीर बदलने की शुरुआत कर दी। पुडुचेरी की राजनीति का एक दिलचस्प सच यह है कि यहां “मुख्यमंत्री” बनने से पहले कई नेताओं को “विद्रोही” बनना पड़ा। यह वह भूभाग था, जो 1947 में भारत की आजादी के बाद भी पूरी तरह आजाद नहीं हुआ था। फ्रांसीसी झंडा यहां अब भी लहरा रहा था और आजादी, यहां के लोगों के लिए एक अधूरी कहानी थी। ऐसे समय में एक नेता ने न सिर्फ इस हकीकत को चुनौती दी, बल्कि उसी टकराव की आग से निकलकर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक भी पहुंचा। यह कहानी है वी. वेंकटासुब्बा रेड्डियार की – पुडुचेरी के दूसरे मुख्यमंत्री, लेकिन उससे कहीं ज्यादा एक ऐसे आंदोलनकारी चेहरे की, जिसकी पहचान सत्ता से पहले बनी।

औपनिवेशिक हुकूमत के खिलाफ पहली खुली चुनौती

मडुक्करई (पुडुचेरी) के एक समृद्ध किसान परिवार में जन्मे रेड्डियार के पास वह सब कुछ था, जो उन्हें आराम की जिंदगी दे सकता था। उनके पिता वैथिलिंगम रेड्डियार फ्रांसीसी शासन के दौरान नेट्टापक्कम कम्यून के मेयर रह चुके थे। यानी सत्ता और प्रशासन उनके लिए अनजान नहीं था, लेकिन रेड्डियार ने इस विरासत को सहज स्वीकार करने के बजाय उसे चुनौती में बदल दिया। उनके लिए राजनीति सुविधा का विस्तार नहीं, बल्कि टकराव का रास्ता थी। यह वह दौर था, जब पुडुचेरी में राजनीति का मतलब चुनाव जीतना नहीं, बल्कि औपनिवेशिक शासन से सीधा मुकाबला करना था।

1946 में जब रेड्डियार नेट्टापक्कम के मेयर बने, तब भारत की आजादी की आहट तेज हो चुकी थी, लेकिन पुडुचेरी अब भी फ्रांस के कब्जे में था। इसी दौरान उन्होंने एक ऐसा कदम उठाया, जो उस समय सीधी बगावत माना जाता था। पुडुचेरी के तत्कालीन मेयर के. मुथु पिल्लई के साथ मिलकर उन्होंने खुलकर मांग की कि फ्रांसीसी शासन यहां से हटे और यह क्षेत्र भारतीय संघ में शामिल हो। यह कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं था, बल्कि उस सत्ता के सामने खुली चुनौती थी, जो खुद को अब भी वैध मानती थी और विरोध को कुचलने की पूरी ताकत रखती थी।

रेड्डियार की खासियत सिर्फ यह नहीं थी कि वे विरोध करते थे, बल्कि यह थी कि वे लोगों को अपने साथ खड़ा कर लेते थे। गांव-गांव जाकर उन्होंने एक ऐसा माहौल बनाया, जिसमें आज़ादी सिर्फ एक विचार नहीं, बल्कि सामूहिक मांग बन गई। यही वजह है कि स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ता उन्हें “पुडुचेरी मुक्ति आंदोलन का जनक” मानते रहे। वे उन नेताओं में थे, जो सिर्फ मंचों पर नहीं, बल्कि सड़कों और बस्तियों में भी उतने ही सक्रिय थे। उस समय पुडुचेरी की गलियों में जो संघर्ष चल रहा था, वह न तो पूरी तरह अहिंसक आंदोलन था और न ही पूर्णतः क्रांतिकारी उभार—वह एक ऐसा दबाव था, जो धीरे-धीरे औपनिवेशिक शासन की जड़ों को हिला रहा था।

31 मार्च 1954: जब ‘सरकार के खिलाफ सरकार’ का ऐलान हुआ

अगर रेड्डियार की कहानी का चरम बिंदु चुनना हो, तो वह 31 मार्च 1954 बुधवार का दिन है। उस दिन उन्होंने और उनके साथ 11 अन्य नेताओं ने फ्रांसीसी शासन के खिलाफ एक “समानांतर सरकार” की घोषणा कर दी। यह कदम दरअसल एक राजनीतिक प्रयोग नहीं, बल्कि खुली बगावत थी—एक ऐसा ऐलान, जिसने यह साफ कर दिया कि असली सत्ता अब वही है, जिसे जनता का समर्थन हासिल है। इस घोषणा ने फ्रांसीसी प्रशासन को पहली बार रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया। अब पहल उनके हाथ में नहीं, बल्कि उन नेताओं के हाथ में थी, जो अब तक विरोध की राजनीति कर रहे थे।

इस बगावती कदम का असर ज्यादा देर तक छिपा नहीं रह सका। आंदोलन तेज हुआ, जनदबाव बढ़ा और अंततः 13 अक्टूबर 1954 को पुडुचेरी का भारत में “दे-फैक्टो” विलय हो गया। हालांकि कानूनी रूप से यह प्रक्रिया 1962 में पूरी हुई, लेकिन 1954 का यह मोड़ ही निर्णायक साबित हुआ। यह सिर्फ एक प्रशासनिक बदलाव नहीं था, बल्कि उस मानसिकता की हार थी, जो यह मानकर चल रही थी कि छोटे-छोटे उपनिवेश अपनी किस्मत खुद तय नहीं कर सकते। रेड्डियार और उनके साथियों ने यह साबित किया कि सीमित संसाधनों और छोटे भूगोल के बावजूद, अगर नेतृत्व में साहस हो, तो इतिहास की दिशा बदली जा सकती है।

आंदोलन से सत्ता तक: एक अलग तरह का सफर

आजादी के बाद अक्सर देखा गया कि आंदोलनकारी नेता धीरे-धीरे हाशिए पर चले जाते हैं, लेकिन रेड्डियार का सफर अलग रहा। 1 जुलाई 1963 को वे पुडुचेरी सरकार में लोक निर्माण मंत्री बने – एक ऐसा विभाग, जो विकास की बुनियाद तैयार करता है। यह वही समय था, जब एक नए केंद्र शासित प्रदेश के रूप में पुडुचेरी अपनी प्रशासनिक पहचान गढ़ रहा था। इसके बाद वे पुडुचेरी के दूसरे मुख्यमंत्री बने। दिलचस्प यह है कि सत्ता में आने के बाद भी उनकी छवि एक पारंपरिक “कुर्सी वाले नेता” की नहीं बनी। वे उसी आंदोलनकारी ऊर्जा के साथ देखे जाते रहे, जिसने उन्हें राजनीति में पहचान दिलाई थी।

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रेड्डियार की राजनीति का सबसे खास पहलू यही था कि उन्होंने सत्ता पाने के लिए संघर्ष नहीं किया, बल्कि संघर्ष के कारण सत्ता उनके पास आई। आज के दौर में, जब राजनीति अक्सर चुनावी गणित, गठबंधनों और रणनीतियों के इर्द-गिर्द घूमती है, उनकी कहानी एक अलग तरह की राजनीति की याद दिलाती है—जहां लक्ष्य स्पष्ट था और रास्ता जोखिम भरा, लेकिन निर्णायक। उनके लिए राजनीति किसी पद का नाम नहीं, बल्कि एक उद्देश्य था।

उनकी कहानी यहीं खत्म नहीं होती। उनकी राजनीतिक विरासत आगे भी जारी रही। उनके पुत्र वी. वैथिलिंगम बाद में पुडुचेरी के मुख्यमंत्री बने और राष्ट्रीय राजनीति में भी सक्रिय हुए। इस तरह रेड्डियार उन चुनिंदा नेताओं में शामिल हैं, जिनके परिवार ने अलग-अलग दौर में एक ही प्रदेश की राजनीति को दिशा दी।

लेकिन इस पूरे किस्से का सार शायद एक ही बात में सिमटता है —रेड्डियार की पहचान सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि वे मुख्यमंत्री थे, बल्कि इस बात से होती है कि उन्होंने उस दौर में खड़े होकर चुनौती दी, जब चुप रहना ज्यादा सुरक्षित विकल्प था। उनकी कहानी याद दिलाती है कि कभी-कभी इतिहास में सबसे बड़ा पद वह नहीं होता, जो आपको मिलता है, बल्कि वह होता है, जिसके लिए आप जोखिम उठाते हैं।

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पुडुचेरी (पुराना नाम पांडिचेरी) की गलियों में आज भी एक नाम पुराने लोगों की स्मृतियों में गूंजता है “पप्पा गौबर्ट।” यह वही शख्स थे, जो कभी फ्रांसीसी हुकूमत के सबसे भरोसेमंद चेहरों में गिने जाते थे, लेकिन समय ने करवट ली तो वही व्यक्ति भारत में विलय की लड़ाई का अहम चेहरा बन गया। यह कहानी है पुडुचेरी के पहले मुख्यमंत्री एडौर्ड गौबर्ट (Édouard Goubert) की। एक ऐसे नेता की, जिनकी राजनीतिक यात्रा किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं लगती। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक

यह सीरीज पुडुचेरी के सभी मुख्यमंत्रियों की कहानी प्रस्तुत करती है। पढ़ें अगली कड़ी में एम. ओ. एच. फारूक की राजनीतिक यात्रा।