सुबह का वक्त था। पुडुचेरी के कराईकल की गलियों में रोज की तरह हलचल शुरू हो रही थी। लोग अपने काम पर निकल रहे थे, दुकानें खुल रही थीं और चाय की दुकानों पर राजनीति की चर्चा भी चल रही थी। इन्हीं गलियों से एक ऐसा आदमी निकला, जिसने दो बार मुख्यमंत्री की कुर्सी तक का सफर तय किया, लेकिन उसकी असली पहचान सत्ता नहीं, बल्कि संघर्ष और बार-बार वापसी की कहानी रही। यह कहानी है सुब्रह्मण्यम रामसामी (Subrahmanyan Ramassamy) की। कई बार उनके नाम का उच्चारण “रामासामी” और “रामास्वामी”—दोनों तरह से किया जाता है, लेकिन उनकी पहचान इन उच्चारणों से कहीं बड़ी थी। वह थी एक जमीनी नेता की।
5 जून 1939 को जन्मे रामासामी का बचपन किसी बड़े घराने में नहीं बीता। वे एक साधारण परिवार से थे, लेकिन उनके भीतर लोगों को समझने की एक अलग ही क्षमता थी। वे अक्सर अपने आसपास के लोगों से बातें करते, उनकी समस्याएं सुनते और यही आदत धीरे-धीरे उन्हें राजनीति की ओर ले गई। उनके लिए राजनीति कोई दूर की चीज नहीं थी, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा थी। यही कारण था कि जब उन्होंने राजनीति में कदम रखा, तो वह सिर्फ पद पाने के लिए नहीं, बल्कि लोगों के बीच अपनी जगह बनाने के लिए था।
युवा होते-होते उनका झुकाव साफ तौर पर राजनीति की तरफ हो गया। उस समय दक्षिण भारत में द्रविड़ आंदोलन पूरे जोर पर था। भाषा, पहचान और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दे आम लोगों के जीवन से जुड़े हुए थे। रामासामी ने इसी माहौल में अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की और DMK से जुड़ गए। मेहनत और सक्रियता के कारण वे जल्दी ही आगे बढ़े और 1969 से 1973 के बीच डीएमके-सीपीआई गठबंधन सरकार में गृह मंत्री के तौर पर जिम्मेदारी संभाली। यह उनके लिए एक बड़ा मौका था, जहां उन्होंने प्रशासन को करीब से समझा और राजनीति के असली मायने सीखे।
पहला बड़ा मोड़: जब पार्टी बदली और रास्ता भी
लेकिन राजनीति हमेशा एक जैसी नहीं रहती। 1973 में उन्होंने एक बड़ा फैसला लिया। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) छोड़कर एम.जी. रामचंद्रन (M.G.Ramachandran) की नई पार्टी अन्नाद्रमुक (AIADMK) में शामिल हो गए। यह कदम आसान नहीं था। नई पार्टी थी, भविष्य अनिश्चित था, लेकिन उन्होंने जोखिम उठाया। यह वही मोड़ था, जिसने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। कई लोगों ने उस समय इस फैसले पर सवाल उठाए, लेकिन रामासामी ने वही किया, जो उन्हें सही लगा, और यही उनकी शैली थी, परिस्थितियों के हिसाब से खुद को ढाल लेना।
1974 का चुनाव आया और एआईएडीएमके-सीपीआई गठबंधन सत्ता में आ गया। रामासामी को मुख्यमंत्री बनाया गया। लेकिन यहां से उनकी कहानी का सबसे अनोखा और यादगार अध्याय शुरू होता है। वे सिर्फ 22 दिन के लिए मुख्यमंत्री रहे, 6 मार्च 1974 से 28 मार्च 1974 तक। सोचिए, जिस कुर्सी तक पहुंचने में लोगों को सालों लग जाते हैं, वह उन्हें मिली भी तो सिर्फ 22 दिनों के लिए। लेकिन यही 22 दिन उनकी पहचान बन गए। यह छोटा सा कार्यकाल उनके जीवन का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया। यह दिखाने के लिए कि राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता।
दूसरी पारी: मौका मिला, लेकिन स्थिरता नहीं
इस छोटे से कार्यकाल ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया। यह सिर्फ एक पद नहीं था, बल्कि उस दौर की अस्थिर राजनीति का आईना भी था। सरकारें बनती थीं और जल्दी गिर भी जाती थीं। ऐसे माहौल में टिके रहना आसान नहीं था। लेकिन रामासामी ने हार नहीं मानी। 1977 में उन्हें फिर मौका मिला और वे दोबारा मुख्यमंत्री बने। इस बार उनका कार्यकाल 2 जुलाई 1977 से 12 नवंबर 1978 तक चला। उन्होंने पूरी कोशिश की कि सरकार स्थिर रहे, लेकिन परिस्थितियां फिर उनके पक्ष में नहीं रहीं। राजनीति ने एक बार फिर करवट ली और उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी।
असल ताकत: जब बिना पार्टी के भी जीत गए
अब उनके सामने सबसे बड़ा सवाल था आगे क्या? यहीं से उनकी असली ताकत सामने आई। वे सत्ता से बाहर जरूर हुए, लेकिन लोगों से दूर नहीं हुए। वे फिर कराईकल की गलियों में लौटे, गांवों में गए, लोगों से मिले और उनकी समस्याओं को समझते रहे। यही उनका असली आधार था। 1985 में उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा। कोई बड़ी पार्टी उनके साथ नहीं थी, लेकिन उन्होंने जीत हासिल की। यह जीत खास थी, क्योंकि यह उनकी अपनी पहचान की जीत थी। लोगों ने पार्टी से ज्यादा व्यक्ति पर भरोसा किया। उन्होंने फिर साबित किया कि असली ताकत जनता के साथ जुड़ाव में होती है। 1990 में भी उन्होंने इसी भरोसे को कायम रखा और जीत हासिल की। बाद में 1992 में वे कांग्रेस में शामिल हो गए, लेकिन उनकी मूल पहचान वही रही यानी जमीनी नेता की।
रामासामी उन नेताओं में नहीं थे, जो बड़े-बड़े भाषण देते हों या भीड़ को आकर्षित करते हों। वे शांत स्वभाव के थे। वे ज्यादा बोलते नहीं थे, लेकिन ध्यान से सुनते थे। यही वजह थी कि कराईकल में उनकी पकड़ लंबे समय तक बनी रही। लोग उन्हें अपने जैसा मानते थे, कोई दूर का नेता नहीं।
उनकी जिंदगी उतार-चढ़ाव से भरी रही। कभी वे सत्ता के शीर्ष पर थे, तो कभी बिल्कुल बाहर। कभी उनके पास पार्टी का समर्थन था, तो कभी वे अकेले चुनाव लड़ रहे थे। लेकिन हर बार उन्होंने खुद को संभाला और आगे बढ़े। यही उनकी सबसे बड़ी खासियत थी, हार के बाद भी हार न मानना।
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15 मई 2017 को उन्होंने अंतिम सांस ली। वे अपना 78वां जन्मदिन पूरा करने से कुछ ही दिन पहले इस दुनिया को छोड़ गए। उनकी उम्र लगभग 77 साल 11 महीने थी। उनके जाने के बाद भले ही कोई बड़ा राजनीतिक शोर नहीं हुआ, लेकिन जिन लोगों ने उन्हें करीब से जाना, उनके लिए यह एक युग का अंत था।
आज जब उनकी कहानी को देखते हैं, तो यह सिर्फ एक नेता की कहानी नहीं लगती। यह एक ऐसे इंसान की कहानी लगती है, जिसने हर परिस्थिति में खुद को ढाला, हर बार गिरकर उठना सीखा और कभी लोगों से अपना रिश्ता नहीं तोड़ा।
रामासामी हमें एक सीधी और गहरी बात सिखाते हैं, जिंदगी में सब कुछ हमेशा हमारे हिसाब से नहीं होता। कभी हमें बहुत कुछ मिलता है, कभी अचानक सब कुछ छिन जाता है। लेकिन असली मायने इस बात के हैं कि हम हर बार खड़े होने की हिम्मत रखते हैं या नहीं।
उनकी 22 दिन की कुर्सी भले ही छोटी थी, लेकिन उससे मिली सीख बहुत बड़ी थी। इस कहानी में रामासामी हमें यही बताते हैं कि राजनीति हो या जिंदगी, सबसे जरूरी चीज कुर्सी नहीं, बल्कि वह हिम्मत है, जो हमें हर बार गिरकर फिर उठने की ताकत देती है।
यह सीरीज पुडुचेरी के सभी मुख्यमंत्रियों की कहानी प्रस्तुत करती है। पढ़ें अगली कड़ी में एमडीआर रामचंद्रन की राजनीतिक यात्रा।
