पुडुचेरी (पुराना नाम पांडिचेरी) की गलियों में आज भी एक नाम पुराने लोगों की स्मृतियों में गूंजता है “पप्पा गौबर्ट।” यह वही शख्स थे, जो कभी फ्रांसीसी हुकूमत के सबसे भरोसेमंद चेहरों में गिने जाते थे, लेकिन समय ने करवट ली तो वही व्यक्ति भारत में विलय की लड़ाई का अहम चेहरा बन गया। यह कहानी है पुडुचेरी के पहले मुख्यमंत्री एडौर्ड गौबर्ट (Édouard Goubert) की। एक ऐसे नेता की, जिनकी राजनीतिक यात्रा किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं लगती।
29 जुलाई 1894 को पुडुचेरी में जन्मे गौबर्ट का जीवन शुरू से ही दो संस्कृतियों के बीच बसा हुआ था। उनके पिता फ्रांसीसी थे और मां फ्रैंको-इंडियन। शुरुआती शिक्षा उन्होंने फ्रेंच इंडोचाइना में ली और बाद में फ्रांस जाकर कानून की पढ़ाई की। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे औपनिवेशिक प्रशासन में शामिल हो गए और पुडुचेरी कोर्ट में क्लर्क के रूप में काम करने लगे। यहीं से उनकी राजनीति और सत्ता के गलियारों में एंट्री हुई।
1951 का चुनाव उनके जीवन का पहला बड़ा मोड़ था। उन्होंने फ्रांसीसी संसद यानी असेंबली नेशनल के लिए चुनाव लड़ा और 99.3 प्रतिशत वोट हासिल कर जीत दर्ज की। इतनी भारी जीत ने उन्हें फ्रांस के लिए एक मजबूत और विश्वसनीय प्रतिनिधि बना दिया। उस दौर में वे पूरी तरह से फ्रांसीसी हितों के पक्षधर थे और पुडुचेरी को फ्रांस के अधीन बनाए रखने के समर्थक।
लेकिन इतिहास हमेशा सीधी रेखा में नहीं चलता। 1940 और 50 के दशक में जब भारत आजादी की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा था, तब पुडुचेरी समेत फ्रांस के कब्जे वाले इलाकों में भी हलचल तेज हो रही थी। 1947 में गौबर्ट ने लैंबर्ट सरावेन के साथ मिलकर फ्रेंच इंडिया सोशलिस्ट पार्टी बनाई। उस समय उनका रुख स्पष्ट था—फ्रांसीसी शासन को बनाए रखना, लेकिन कुछ स्वायत्तता के साथ।
यहीं से शुरू होता है उनके जीवन का सबसे दिलचस्प किस्सा। गौबर्ट ने एक “तीसरा रास्ता” खोजने की कोशिश की। उनका विचार था कि पुडुचेरी न पूरी तरह फ्रांस के अधीन रहे और न ही भारत में पूरी तरह विलय हो, बल्कि उसे एक स्वायत्त दर्जा मिल जाए। यह एक तरह से राजनीतिक संतुलन बनाने की कोशिश थी। लेकिन यह दांव सफल नहीं हुआ। न फ्रांस तैयार हुआ, न भारत।
उधर जमीन पर हालात बदल रहे थे। जनता का मूड बदल रहा था। लोग भारत के साथ जुड़ना चाहते थे। आंदोलन तेज हो रहे थे। गौबर्ट, जो कभी फ्रांसीसी सत्ता के मजबूत स्तंभ थे, अब जनता के बदलते रुख को नजरअंदाज नहीं कर सके। 1954 आते-आते उन्होंने अपनी राजनीतिक दिशा बदल दी।
पुडुचेरी को भारत में विलय कराने में अहम भूमिका निभाई
यह बदलाव केवल रणनीतिक नहीं था, बल्कि निर्णायक था। मार्च 1954 में गौबर्ट खुद पुडुचेरी पहुंचे और भारत में विलय की मांग को लेकर हो रहे आंदोलनों में शामिल हो गए। यह वही व्यक्ति था, जो कुछ साल पहले तक फ्रांस के पक्ष में खड़ा था। इस फैसले ने फ्रांसीसी प्रशासन को झटका दिया।
29 जून 1954 को उनकी संसदीय प्रतिरक्षा समाप्त कर दी गई। यह उनके खिलाफ एक कड़ा कदम था, लेकिन गौबर्ट अब पीछे हटने वालों में नहीं थे। इसके कुछ ही महीनों बाद, 1 नवंबर 1954 को फ्रांस और भारत के बीच समझौता हुआ और पुडुचेरी समेत फ्रांसीसी क्षेत्रों का भारत में विलय हो गया। इस तरह एक युग का अंत हुआ।
गौबर्ट का यह फैसला ही फ्रांस की भारत में मौजूदगी के “अंत की शुरुआत” साबित हुआ। यही कारण है कि उनके इस राजनीतिक यू-टर्न को इतिहास में बेहद अहम माना जाता है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। भारत में विलय के बाद भी गौबर्ट राजनीति में सक्रिय रहे। 1963 में जब पुडुचेरी को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा मिला, तो वे इसके पहले मुख्यमंत्री बने। उनका कार्यकाल भले ही लंबा नहीं रहा—1 जुलाई 1963 से 11 सितंबर 1964 तक—लेकिन उन्होंने प्रशासनिक ढांचे को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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गौबर्ट को “पप्पा गौबर्ट” नाम यूं ही नहीं मिला था। स्थानीय लोग उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखते थे, जो भले ही सत्ता के खेल में माहिर था, लेकिन जनता से उसका सीधा जुड़ाव भी था। उनके व्यक्तित्व में एक तरह का करिश्मा था—वह फ्रेंच संस्कृति से प्रभावित थे, लेकिन भारतीय राजनीति की नब्ज भी समझते थे।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि उन्होंने समय के साथ खुद को बदला। राजनीति में यह गुण कम ही नेताओं में देखने को मिलता है। जहां कई नेता अपनी पुरानी सोच से चिपके रहते हैं, वहीं गौबर्ट ने हालात को समझते हुए अपनी दिशा बदली। यही कारण है कि उनका एक फैसला इतिहास की धारा को मोड़ गया।
हालांकि आलोचक यह भी कहते हैं कि उनका यह बदलाव पूरी तरह आदर्शवादी नहीं था, बल्कि राजनीतिक मजबूरी भी थी। लेकिन चाहे जो भी वजह रही हो, नतीजा यह रहा कि पुडुचेरी का भारत में विलय संभव हुआ और एक नई शुरुआत हुई।
आज जब हम पुडुचेरी की खूबसूरत सड़कों, फ्रेंच आर्किटेक्चर और भारतीय लोकतंत्र के अनोखे मेल को देखते हैं, तो कहीं न कहीं उसमें गौबर्ट की उस ऐतिहासिक भूमिका की झलक मिलती है। कई बार ऐसा महसूस होता है कि इतिहास केवल युद्धों और समझौतों से नहीं बनता, बल्कि व्यक्तियों के फैसलों से भी आकार लेता है। और कभी-कभी एक व्यक्ति का एक निर्णय पूरी सत्ता व्यवस्था को बदल देता है।
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पुडुचेरी में पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने छह सीटें जीती थीं। हालांकि यह केंद्र शासित प्रदेश है, इसलिए यहां के चुनाव परिणामों का राष्ट्रीय राजनीति पर असर अपेक्षाकृत सीमित माना जाता है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
यह सीरीज पुडुचेरी के सभी मुख्यमंत्रियों की कहानी प्रस्तुत करती है। पढ़ें अगली कड़ी में वी. वेंकटसुभा रेड्डीआर की राजनीतिक यात्रा।
