पुडुचेरी की राजनीति का अपना अलग मिजाज है। यहां सरकारें बनती भी जल्दी हैं और गिरती भी उतनी ही तेजी से। छोटे से इस केंद्र शासित प्रदेश में राजनीतिक समीकरण हर कुछ साल में बदलते रहते हैं। लेकिन इन बदलते दौरों के बीच एक ऐसा नेता भी रहा, जो हर दौर में अपनी जगह बनाए रहा – एम. डी. आर. रामचंद्रन। उसकी पहचान सिर्फ एक मुख्यमंत्री की नहीं थी, बल्कि उस जननेता की थी, जो पार्टी बदलने के बाद भी जनता के दिलों में बना रहा।

यह कहानी उस दौर से शुरू होती है, जब पुडुचेरी की राजनीति पर द्रविड़ दलों का असर तेजी से बढ़ रहा था। साठ के दशक के आखिर में, जब उन्होंने पहली बार चुनावी मैदान में कदम रखा, तब राजनीति में उनकी पहचान एक साधारण कार्यकर्ता की थी। लेकिन 1969 में जब उन्होंने नेट्टापक्कम (Nettapakkam) सीट से चुनाव लड़ा, तो उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री वेंकटासुब्बा रेड्डी को हराकर अपनी ताकत का पहला बड़ा संकेत दे दिया था।

यह जीत सिर्फ एक सीट जीतना नहीं थी, बल्कि पुडुचेरी की राजनीति में अपने आगमन का ऐलान थी। इसके बाद धीरे-धीरे उन्होंने अपने इलाके मन्नाडीपेट (Mannadipet) में ऐसी पकड़ बना ली कि वह जगह उनकी राजनीतिक ताकत का केंद्र बन गई। लोग उन्हें सिर्फ नेता नहीं, अपने बीच का आदमी मानने लगे थे। यही वजह थी कि जब वह चुनाव लड़ते, तो पार्टी का झंडा नहीं, उनका नाम ज्यादा चलता था।

उनकी राजनीति की शुरुआत डीएमके से हुई। उस समय यह पार्टी सिर्फ तमिलनाडु ही नहीं, बल्कि पुडुचेरी में भी एक मजबूत ताकत बन रही थी। रामचंद्रन ने इसी मंच से अपनी पहचान बनाई। मेहनत, सादगी और लोगों के बीच लगातार मौजूदगी, इन तीन चीजों ने उन्हें जल्दी ही आगे बढ़ा दिया। वह विधायक बने, फिर मंत्री बने और धीरे-धीरे पार्टी के भरोसेमंद चेहरों में शामिल हो गए। लेकिन उनकी कहानी सीधी रेखा में चलने वाली नहीं थी।

कई दल बदले, लेकिन लोगों के दिलों से बाहर नहीं हुए

वक्त बदला, राजनीति बदली और उन्होंने भी अपने कदम बदल लिए। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम से निकलकर वह अन्नाद्रमुक (AIADMK) में पहुंचे और बाद में कांग्रेस के साथ भी जुड़ गए। आमतौर पर पार्टी बदलने को राजनीति में कमजोरी माना जाता है, लेकिन उनके मामले में यह अलग था। उन्होंने हर बार नई पार्टी में जगह बनाई, लेकिन अपनी पुरानी पहचान नहीं खोई। मन्नाडीपेट के लोगों के लिए वह वही रहे – एक ऐसे नेता, जो उनके बीच रहता है और उनके काम आता है।

यही वजह थी कि उन्होंने सात बार विधानसभा का चुनाव जीता। अलग-अलग दौर में, अलग-अलग पार्टियों से और अलग-अलग सीटों से चुनाव लड़ने के बावजूद जनता का भरोसा उनके साथ बना रहा। यह भरोसा यूं ही नहीं बना था। उन्होंने अपने मंत्री रहते हुए पब्लिक वर्क्स और बिजली जैसे विभाग संभाले। सड़कें, पुल और बिजली जैसी बुनियादी जरूरतों पर उनका फोकस रहा। लोगों को दिखने वाला काम ही उनकी असली पहचान बना।

इसी भरोसे और अनुभव के दम पर वह पहली बार 1980 में मुख्यमंत्री बने। यह उनके राजनीतिक सफर का सबसे बड़ा पड़ाव था। लेकिन यह कुर्सी जितनी बड़ी थी, उतनी ही मुश्किल भी। पुडुचेरी की राजनीति में गठबंधन हमेशा से एक चुनौती रहा है। अंदरूनी खींचतान और बाहरी दबाव के बीच सरकार चलाना आसान नहीं था। उनका पहला कार्यकाल ज्यादा लंबा नहीं चला। सरकार गिर गई, लेकिन उनकी पहचान नहीं गिरी।

दो बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन हर बार अधूरी रह गई सरकार

कुछ साल बाद 1990 में उन्हें फिर से मौका मिला। वह दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। एक बार फिर उम्मीद जगी कि अब शायद स्थिरता आएगी। लेकिन इस बार भी हालात कुछ खास अलग नहीं रहे। सरकार फिर ज्यादा दिन नहीं चल सकी। यहीं उनकी राजनीति का सबसे दिलचस्प विरोधाभास भी दिखता है, दो बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन दोनों बार कार्यकाल अधूरा रह गया।

लेकिन शायद उनकी कहानी का असली मतलब यही है कि राजनीति सिर्फ कुर्सी से नहीं मापी जाती। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने राजनीति में अपनी भूमिका बदलते हुए निभाई। 2001 से 2006 के बीच वह पुडुचेरी विधानसभा के स्पीकर बने। यह एक अलग तरह की जिम्मेदारी थी, जहां सत्ता चलाने के बजाय व्यवस्था को संभालना होता है। एक ही नेता का मुख्यमंत्री और स्पीकर दोनों बनना अपने आप में दुर्लभ है, और यही उनकी राजनीतिक यात्रा को खास बनाता है।

उनका पूरा सफर करीब पांच दशकों तक फैला हुआ था। 1969 से शुरू हुई यह यात्रा 2000 के दशक तक जारी रही। उन्होंने हर दौर देखा – द्रविड़ राजनीति का उभार, गठबंधन की मजबूरियां और बदलते राजनीतिक समीकरण। हर बार उन्होंने खुद को उस दौर के हिसाब से ढाला, लेकिन अपनी जड़ों से जुड़े रहे।

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उनकी जिंदगी का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव तब आया, जब उन्होंने 2000 के आसपास कांग्रेस का दामन थामा। यहां भी वह सिर्फ एक साधारण नेता बनकर नहीं रहे, बल्कि पुडुचेरी प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष जैसे अहम पद पर भी रहे। यह बताता है कि बदलती राजनीति में भी उनका कद कम नहीं हुआ था।

उनकी जिंदगी का आखिरी दौर भी शांत नहीं था। वह राजनीति और संगठन से जुड़े रहे। 2024 में जब उनका निधन हुआ, तो पुडुचेरी में राजकीय शोक घोषित किया गया और पूरे सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। यह सम्मान सिर्फ एक पूर्व मुख्यमंत्री के लिए नहीं था, बल्कि उस नेता के लिए था, जिसने दशकों तक राजनीति में अपनी छाप छोड़ी।

एमडीआर रामचंद्रन की कहानी को अगर एक लाइन में समझना हो, तो यह कहा जा सकता है कि यह एक ऐसे नेता की कहानी है, जिसने सत्ता के हर रंग को देखा, लेकिन अपनी पहचान नहीं खोई। उन्होंने पार्टी बदली, पद बदले, जिम्मेदारियां बदलीं – लेकिन जनता का भरोसा नहीं बदला।

आज जब हम राजनीति में स्थिरता और लंबे कार्यकाल को सफलता का पैमाना मानते हैं, तब रामचंद्रन की कहानी एक अलग नजरिया देती है। वह बताते हैं कि कभी-कभी अधूरी सरकारें भी पूरी कहानियां छोड़ जाती हैं। पुडुचेरी की राजनीति को समझने वाले लोग अक्सर कहते हैं कि उसका जिक्र हो और उनका नाम न आए, ऐसा होना मुश्किल है।

यह सीरीज पुडुचेरी के सभी मुख्यमंत्रियों की कहानी प्रस्तुत करती है। पढ़ें अगली कड़ी में वी. वैथिलिंगम की राजनीतिक यात्रा।