केरल की राजनीति में मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता कभी सीधा नहीं रहा। यहां नेता सिर्फ चुनाव जीत कर मुख्यमंत्री नहीं बनते, उन्हें विचारधारा, संगठन, गुटबाजी, चर्च, समुदायों, छात्र राजनीति और सार्वजनिक बहसों की लंबी सुरंग से गुजरना पड़ता है। वी.डी. सतीशन भी इसी रास्ते से होकर निकले हैं। फर्क बस इतना है कि उन्होंने यह यात्रा बिना ज्यादा शोर, बिना नाटकीय नारों और बिना खुद को “भविष्य का मुख्यमंत्री” घोषित किए पूरी की।
जब तिरुवनंतपुरम में कांग्रेस विधायक दल की बैठक के बाद उनके नाम पर अंतिम मुहर लगी तो केरल की राजनीति को करीब से देखने वाले कई वरिष्ठ पत्रकारों ने एक जैसी बात लिखी – “यह आदमी कभी सबसे ताकतवर नहीं दिखा, लेकिन धीरे-धीरे सबसे भरोसेमंद बन गया।”
वी.डी. सतीशन यानी वडास्सेरी दामोदरन सतीशन का जन्म 31 मई 1964 को एर्नाकुलम जिले के नेट्टूर में हुआ। वह ऐसे परिवार से आते हैं, जहां राजनीति कोई विरासत नहीं थी। शुरुआती पढ़ाई स्थानीय स्कूलों में हुई। बाद में उन्होंने थेवरा के सेक्रेड हार्ट कॉलेज में पढ़ाई की। इसके बाद सामाजिक कार्य और कानून की पढ़ाई की। छात्र जीवन से ही उन्हें बहस, भाषण और सार्वजनिक मुद्दों में दिलचस्पी थी। यही वजह रही कि कॉलेज के दिनों में वह केरल स्टूडेंट्स यूनियन यानी केएसयू से जुड़ गए। बाद में महात्मा गांधी विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष भी बने।
लड़ने से पहले पढ़ने वाले नेता की है छवि
मीडिया में उनके छात्र जीवन का एक किस्सा अक्सर सुनाया जाता है। कहा जाता है कि छात्र राजनीति के दिनों में दूसरे नेता भाषणों और नारों में व्यस्त रहते थे, जबकि सतीशन लाइब्रेरी में बैठकर नोट्स तैयार करते थे। उनके एक पुराने साथी ने ‘मातृभूमि’ से कहा था – “वह लड़ने से पहले पढ़ते थे।” शायद यही आदत बाद में उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।
राजनीति में पूरी तरह आने से पहले उन्होंने करीब एक दशक तक केरल हाईकोर्ट में वकालत की। कानून की पढ़ाई ने उन्हें तथ्यों और दस्तावेजों पर पकड़ दी। यही कारण है कि विधानसभा में उनकी शैली दूसरे नेताओं से अलग दिखती रही। वह भावनात्मक भाषण कम और फाइलों, आंकड़ों और कानूनी संदर्भों के साथ ज्यादा बोलते थे। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने एक बार लिखा था कि सतीशन विधानसभा की तैयारी ऐसे करते हैं, जैसे कोई छात्र परीक्षा की तैयारी कर रहा हो।
शादी हो या अंतिम संस्कार हर जगह रहते हैं मौजूद
सतीशन पहली बार 2001 में उत्तरी परवूर सीट से विधायक बने। तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यही नेता एक दिन केरल कांग्रेस का सबसे बड़ा चेहरा बनेगा। लेकिन उनकी राजनीति का आधार टीवी स्टूडियो नहीं, बल्कि क्षेत्रीय नेटवर्क रहा। परवूर के लोग बताते हैं कि वह उन नेताओं में हैं, जो छोटे सामाजिक कार्यक्रमों में भी पहुंचते हैं। शादी हो, अंतिम संस्कार हो या स्थानीय विवाद – सतीशन की मौजूदगी अक्सर दिख जाती थी।
उनके राजनीतिक जीवन का बड़ा हिस्सा इंतजार में बीता। कांग्रेस के भीतर लंबे समय तक ओमन चांडी, रमेश चेन्निथला और दूसरे बड़े नेताओं का दबदबा रहा। सतीशन कई बार मंत्री बनने की दौड़ में पीछे रह गए। पार्टी के बड़े पद भी उन्हें नहीं मिले। ‘द वीक’ ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा कि कांग्रेस में उन्हें अक्सर “अंडरडॉग” माना जाता था। लेकिन दिलचस्प यह है कि उन्होंने कभी सार्वजनिक विद्रोह नहीं किया।
वी.डी. सतीशन की राजनीति में असली मोड़ सिर्फ विपक्ष का नेता बनना नहीं था, बल्कि एर्नाकुलम और परवूर इलाके में पर्यावरण और तटीय मुद्दों को लेकर उनका संघर्ष था। वल्लारपडम कंटेनर टर्मिनल परियोजना, अवैध रेत खनन और तटीय इलाकों में पर्यावरणीय नुकसान के खिलाफ उन्होंने शुरुआती दौर में खुलकर आवाज उठाई। दिलचस्प यह रहा कि उस समय उनकी अपनी पार्टी की सरकार के कुछ फैसले भी सवालों के घेरे में थे। कांग्रेस के भीतर इससे असहजता पैदा हुई और कई प्रभावशाली कारोबारी समूह भी उनके खिलाफ हो गए, लेकिन सतीशन पीछे नहीं हटे। केरल मीडिया में अक्सर इस दौर को उनकी राजनीति का निर्णायक मोड़ माना जाता है, क्योंकि यहीं से उनकी छवि ऐसे नेता की बनी, जो जरूरत पड़ने पर ‘सिस्टम’ से भी टकरा सकता है।
केरल कांग्रेस की राजनीति में जहां छोटे-छोटे मतभेद भी प्रेस कांफ्रेंस तक पहुंच जाते हैं, वहां सतीशन चुपचाप काम करते रहे। उनके करीबी बताते हैं कि वह अक्सर कहते थे – “राजनीति में सबसे लंबी दौड़ धैर्य की होती है।”
2021 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए निराशाजनक रहा। यूडीएफ हार गया। लेकिन उसी हार ने सतीशन की राजनीति बदल दी। उन्हें विपक्ष का नेता बनाया गया। उस समय इसे समझौता फैसला माना गया था, लेकिन अगले पांच वर्षों में उन्होंने खुद को पिनराई विजयन सरकार के सबसे आक्रामक आलोचक के रूप में स्थापित कर दिया।
सोना तस्करी मामला हो, एआई कैमरा विवाद हो, वित्तीय संकट हो या प्रशासनिक फैसले सतीशन लगातार सरकार पर हमलावर रहे। मलयालम न्यूज चैनलों पर उनके प्रेस कांफ्रेंस नियमित राजनीतिक घटनाएं बन गए थे।
विधानसभा का एक दृश्य आज भी केरल की राजनीति में याद किया जाता है। बहस के दौरान मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने पुराने राजनीतिक संघर्षों का जिक्र करते हुए सख्त लहजे में बात की। जवाब में सतीशन ने कहा – “हम पुराने पिनराई विजयन से भी नहीं डरे थे, आज के विजयन से भी नहीं डरेंगे।” यह बयान अगले दिन लगभग हर अखबार की सुर्खी बना।
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सतीशन की एक और खासियत रही – वह सोशल मीडिया के दौर में भी “डेटा आधारित नेता” बने रहे। उनके भाषणों में अक्सर सरकारी दस्तावेज, आर्थिक आंकड़े और रिपोर्टें होती थीं। केरल के राजनीतिक पत्रकारों का कहना है कि वह देर रात तक तैयारी करने वाले नेताओं में हैं। कई बार भाषण से ठीक पहले भी अपने नोट्स में बदलाव करते रहते हैं।
उनकी छवि सिर्फ राजनीतिक हमलावर की नहीं है। वह पढ़ने-लिखने वाले नेता माने जाते हैं। उन्हें किताबों और प्रकृति से लगाव है। ट्रेकिंग का भी शौक रखते हैं। उनके करीबी कहते हैं कि चुनावी यात्राओं में भी उनके बैग में किताबें जरूर रहती हैं।
परिवार को उन्होंने हमेशा राजनीति से दूर रखा। उनकी पत्नी आर. लक्ष्मीप्रिया हैं और उनकी एक बेटी उन्निमाया। केरल की राजनीति में जहां परिवारवाद अक्सर खुलकर दिखाई देता है, वहां सतीशन ने निजी जीवन को प्रचार से दूर रखा। 2026 का चुनाव उनके लिए सबसे बड़ी परीक्षा था। उन्होंने चुनाव से पहले दावा किया था कि यूडीएफ 100 सीटों के करीब पहुंचेगा। कई लोगों ने इसे अतिशयोक्ति माना। लेकिन जब नतीजे आए, तो कांग्रेस नीत गठबंधन सत्ता में लौट आया।
मुख्यमंत्री पद की दौड़ आसान नहीं थी। दिल्ली में कई दौर की बैठकें हुईं। केसी वेणुगोपाल, रमेश चेन्निथला और दूसरे नेताओं के नाम भी चर्चा में थे। कांग्रेस के भीतर गुटबाजी आज भी खत्म नहीं हुई है। लेकिन आखिरकार पार्टी नेतृत्व ने सतीशन पर भरोसा जताया। उनके मुख्यमंत्री बनने के पीछे सिर्फ राजनीतिक गणित नहीं, बल्कि उनकी सार्वजनिक छवि भी थी। वह ऐसे नेता के रूप में उभरे, जो भ्रष्टाचार के आरोपों से दूर रहे, पढ़े-लिखे दिखे और लगातार सक्रिय रहे।
मंच पर कम लेकिन निजी बातचीत में मजाक करना पसंद
मलयालम मीडिया में उनके बारे में एक दिलचस्प बात और कही जाती है। वह मंच पर बहुत नियंत्रित दिखते हैं, लेकिन निजी बातचीत में काफी हास्यप्रिय हैं। ‘24 न्यूज’ के एक पत्रकार ने लिखा था कि विधानसभा की तनावपूर्ण बहसों के बाद भी वह पत्रकारों के बीच हल्के मजाक करते दिखाई देते थे।
अब उनके सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। केरल भारी कर्ज, बेरोजगारी, युवाओं के पलायन और आर्थिक दबाव से जूझ रहा है। खाड़ी देशों पर निर्भर अर्थव्यवस्था भी बदल रही है। कांग्रेस के भीतर संतुलन बनाए रखना भी आसान नहीं होगा। लेकिन फिलहाल उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही है कि उन्होंने खुद को “स्थायी दावेदार” नहीं, बल्कि “लगातार मेहनत करने वाले नेता” के रूप में स्थापित किया। राजनीति में ऐसे नेता कम बचे हैं, जो वर्षों तक दूसरी पंक्ति में रहकर भी तैयारी करते रहें।
वी.डी. सतीशन की कहानी किसी फिल्मी उछाल की कहानी नहीं है। यह धीरे-धीरे आगे बढ़ने वाले उस नेता की कहानी है, जिसने कभी सबसे ऊंची आवाज नहीं लगाई, लेकिन आखिर में वही सबसे आगे खड़ा दिखा।
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केरल में वीडी सतीशन के नेतृत्व में यूडीएफ की सरकार सोमवार को शपथ लेगी। यूडीएफ को विधानसभा चुनाव में 140 में से 102 सीटों पर शानदार जीत मिली थी। सतीशन के नए मंत्रिमंडल में 14 नए मंत्रियों को शामिल किया गया है। कांग्रेस के महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल का दबदबा मंत्रिमंडल में बना हुआ है। वेणुगोपाल भी केरल में मुख्यमंत्री बनने की दौड़ में शामिल थे। सतीशन के पास वित्त मंत्रालय रहेगा जबकि उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रमेश चेन्निथला के पास गृह और सतर्कता जैसे अहम विभाग रहेंगे। माना जा रहा है कि कांग्रेस को मिलने वाले अहम विभागों में से वेणुगोपाल खेमे के नेताओं को अधिकतर विभाग मिलने की संभावना है।
