शपथ का वह दिन असम की राजनीति के इतिहास में एक साधारण दिन नहीं था। सत्ता बदली थी, चेहरे बदले थे, लेकिन असली बदलाव उस व्यक्ति के भीतर था, जिसने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। जैसे ही गोलाप बोरबोरा ने शपथ ली, यह साफ होने लगा कि यह सिर्फ सरकार बदलने की घटना नहीं है, यह राजनीति के तौर-तरीकों, उसके चाल-चलन और उसके चरित्र में बदलाव की शुरुआत है। उस दौर में, जब सत्ता का मतलब बढ़ती दूरी, बढ़ता तामझाम और बढ़ती औपचारिकता होता जा रहा था, बोरबोरा ने उसी क्षण से एक अलग रास्ता चुन लिया।

आपातकाल के बाद का वह समय देश भर में राजनीतिक उथल-पुथल का था। लंबे समय तक सत्ता में रही कांग्रेस पहली बार गंभीर चुनौती का सामना कर रही थी। असम भी इससे अछूता नहीं था। 1978 के चुनाव में जब जनता पार्टी ने जीत दर्ज की और गोलाप बोरबोरा मुख्यमंत्री बने, तो यह केवल एक राजनीतिक घटना नहीं थी, यह उस मानसिकता पर चोट थी, जो सत्ता को स्थायी मान बैठी थी। लेकिन इस बदलाव की असली कहानी चुनाव जीतने में नहीं, बल्कि उसके बाद शुरू होती है।

न कोई तामझाम, न कोई दूरी; बस वही पुराना अंदाज

मुख्यमंत्री बनने के बाद आमतौर पर नेताओं के आसपास एक नई दुनिया बन जाती है—सुरक्षा का घेरा, प्रोटोकॉल की दीवारें, और आम लोगों से एक दूरी। लेकिन गोलाप बोरबोरा के साथ ऐसा नहीं हुआ। शपथ लेने के बाद भी उनके जीवन में कोई नाटकीय बदलाव नहीं आया। वे वैसे ही रहे—साधारण कपड़ों में, सहज व्यवहार के साथ और बिना किसी दिखावे के। यह सादगी कोई दिखावटी राजनीतिक शैली नहीं थी, बल्कि उनके व्यक्तित्व का स्वाभाविक हिस्सा थी, जो सत्ता में आने के बाद भी जस का तस बनी रही।

कहते हैं कि सत्ता इंसान को बदल देती है। लेकिन बोरबोरा उन विरले लोगों में थे, जिन्होंने इस कहावत को गलत साबित कर दिया। एक बार एक अधिकारी ने उन्हें सलाह दी कि वे सरकारी संसाधनों का उपयोग अपने निजी आराम के लिए कर सकते हैं—आखिर वे मुख्यमंत्री हैं। यह एक सामान्य बात थी, जिसे उस समय के अधिकतर नेता सहजता से स्वीकार कर लेते। लेकिन बोरबोरा ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। उनका जवाब सीधा था—सरकारी संसाधन जनता के हैं, किसी व्यक्ति के नहीं। यह केवल एक वाक्य नहीं था, बल्कि उनकी पूरी राजनीति का सार था।

कुर्सी नहीं, जिम्मेदारी निभाने का भाव

उनके लिए मुख्यमंत्री होना कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी थी। यही कारण था कि उन्होंने कभी अपने और आम लोगों के बीच दूरी बनने नहीं दी। वे लोगों के बीच जाते, उनकी समस्याएं सुनते और बिना किसी औपचारिकता के उनसे संवाद करते। यह संवाद केवल औपचारिक मुलाकात नहीं होता था, बल्कि एक ऐसा संबंध होता था, जिसमें भरोसा और अपनापन दोनों शामिल होते थे। यही वजह थी कि लोग उन्हें सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि अपने बीच का एक व्यक्ति मानते थे।

उनकी स्पष्टवादिता भी उतनी ही चर्चित थी। सत्ता में रहते हुए अपनी ही सरकार की आलोचना करना आसान नहीं होता, लेकिन बोरबोरा ने यह जोखिम उठाया। अगर उन्हें किसी नीति में खामी नजर आती, तो वे खुलकर उसके खिलाफ बोलते। उनके लिए सही और गलत का पैमाना सत्ता की सुविधा नहीं, बल्कि सिद्धांत थे। यह गुण उन्हें बाकी नेताओं से अलग करता था और यही वह बिंदु था, जहां से उनकी राजनीति का ‘चाल-चलन’ अलग दिखने लगता था।

गोलाप बोरबोरा का यह स्वभाव अचानक नहीं बना था। इसके पीछे उनके लंबे संघर्ष और अनुभव की कहानी थी। वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े रहे, जेल गए और बाद में समाजवादी विचारधारा के मजबूत समर्थक बने। राम मनोहर लोहिया के विचारों ने उनके सोचने के तरीके को गहराई से प्रभावित किया। यही कारण था कि उनकी राजनीति में सत्ता से ज्यादा समाज का महत्व था। वे खुद को हमेशा एक कार्यकर्ता मानते रहे, भले ही वे मुख्यमंत्री क्यों न बन गए हों।

विकास की परिभाषा, जमीन से जुड़ी

उनका यह नजरिया उनके फैसलों में भी साफ झलकता था। वे मानते थे कि विकास का असली मतलब केवल बड़े प्रोजेक्ट्स या घोषणाएं नहीं है, बल्कि आम लोगों के जीवन में वास्तविक बदलाव लाना है। उन्होंने असम की भूमि समस्या को गंभीरता से लिया और इसके समाधान के लिए ठोस कदम उठाने की बात कही। उनका मानना था कि जब तक किसानों की समस्याएं हल नहीं होंगी, तब तक राज्य का विकास अधूरा रहेगा।

उनकी सोच केवल प्रशासनिक फैसलों तक सीमित नहीं थी। वे यह भी समझते थे कि समाज में असंतोष कैसे पैदा होता है और उसे कैसे रोका जा सकता है। बेरोजगारी, स्थानीय युवाओं के अधिकार और बाहरी प्रभाव जैसे मुद्दों पर उन्होंने खुलकर अपनी राय रखी। उनका मानना था कि अगर इन समस्याओं को समय रहते नहीं सुलझाया गया, तो ये बड़े आंदोलनों का रूप ले सकती हैं।

मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण का मुद्दा भी उनके कार्यकाल में सामने आया। 1978 के मंगलदई उपचुनाव से पहले इस प्रक्रिया ने एक बड़े सवाल को जन्म दिया—अवैध प्रवासियों का। यह मुद्दा आगे चलकर असम की राजनीति का केंद्र बन गया। बोरबोरा ने उस समय ही इस समस्या की गंभीरता को समझ लिया था और इसे हल करने की जरूरत पर जोर दिया था।

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गोलाप बोरबोरा का जीवन यह दिखाता है कि राजनीति केवल सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं है, बल्कि समाज को दिशा देने का जरिया भी हो सकती है। उन्होंने यह साबित किया कि एक नेता बिना तामझाम के भी प्रभावी हो सकता है, बिना बड़े-बड़े दावों के भी लोगों के दिलों में जगह बना सकता है।

उनकी कहानी हमें यह भी सिखाती है कि सच्चा बदलाव केवल नीतियों से नहीं आता, बल्कि उस व्यक्ति के व्यवहार और सोच से आता है, जो उन नीतियों को लागू करता है। बोरबोरा ने अपने जीवन से यह दिखाया कि अगर इरादा साफ हो, तो सीमित समय में भी गहरा असर छोड़ा जा सकता है।

उनका कार्यकाल भले ही छोटा रहा, लेकिन उसका प्रभाव इतना व्यापक था कि आज भी उन्हें याद किया जाता है। 19 मार्च 2006 को जब उनका निधन हुआ, तो यह केवल एक नेता का अंत नहीं था, बल्कि एक ऐसी राजनीति का अंत था, जो धीरे-धीरे दुर्लभ होती जा रही है। आज जब राजनीति में दिखावा, प्रचार और संसाधनों की होड़ बढ़ती जा रही है, गोलाप बोरबोरा की कहानी एक अलग ही रास्ता दिखाती है। वह रास्ता, जहां सत्ता साधन है, साध्य नहीं; जहां नेता और जनता के बीच कोई दीवार नहीं होती; और जहां ईमानदारी कोई नारा नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका होती है।

शायद यही कारण है कि उनका नाम आज भी सिर्फ इतिहास की किताबों में नहीं, बल्कि लोगों की यादों में जिंदा है। और यही वह जगह है, जहां कोई भी नेता सच में अमर होता है।

यह सीरीज असम के सभी मुख्यमंत्रियों की कहानी प्रस्तुत करती है। पढ़ें अगली कड़ी में जोगेन्द्र नाथ हजारिका की राजनीतिक यात्रा।