असम की राजनीति में वह वक्त किसी सधे हुए खेल का नहीं, बल्कि बिखरते हुए भरोसे का था। सत्ता के गलियारों में चेहरे बदल रहे थे, लेकिन असली लड़ाई कुर्सी के पीछे चल रही थी। इसी उठापटक के बीच एक नाम उभरा जोगेन्द्र नाथ हजारिका। उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया, मगर ऐसा नहीं कि वे सबसे ताकतवर थे, बल्कि इसलिए कि वे सबसे कम विवादित थे। यह वही पल था, जब सियासत ने एक ऐसा चेहरा चुना, जिसे सब स्वीकार कर सकें, और फिर वही सियासत उसे अकेला छोड़ दे। 93 दिनों यानी तीन महीने से थोड़ा ज्यादा की उनकी हुकूमत इसी विडंबना की कहानी है, जहां शुरुआत समझौते से होती है और अंत बेबसी में दर्ज होता है।
लेकिन इस कहानी की गहराई को समझने के लिए उस व्यक्ति की यात्रा को जानना जरूरी है, जो अचानक इस सियासी तूफान के केंद्र में आ खड़ा हुआ। जोगेन्द्र नाथ हजारिका का जन्म 9 सितंबर 1924 को असम के तेंगाखाट मऊजा, तत्कालीन लखीमपुर जिले (अब डिब्रूगढ़) में हुआ था। वे सोनवाल कछारी समुदाय से आते थे – एक ऐसा सामाजिक आधार, जिसकी जड़ें असम की मिट्टी में गहरी थीं। शुरुआती शिक्षा अपने इलाके में लेने के बाद उन्होंने 1949 में स्नातक किया और फिर कलकत्ता विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई पूरी की। यह वह दौर था, जब देश आजादी के बाद अपने राजनीतिक ढांचे को गढ़ रहा था और हजारिका भी उसी नई राजनीतिक चेतना के साथ आगे बढ़ रहे थे।
सांसद, विधायक, स्पीकर और मुख्यमंत्री का दायित्व निभाया
राजनीति में उनकी पकड़ धीरे-धीरे मजबूत होती गई। 1951, 1957, 1962 और 1967—लगातार चार बार वे असम के डिब्रूगढ़ संसदीय क्षेत्र से लोकसभा के लिए चुने गए। यह सिर्फ चुनावी जीत का सिलसिला नहीं था, बल्कि उस भरोसे का प्रमाण था, जो जनता ने उन पर बार-बार जताया। बाद के वर्षों में वे 1978 से 1985 तक असम विधानसभा के सदस्य रहे और 1978-79 में विधानसभा के स्पीकर भी बने। सदन को चलाने का यह अनुभव उन्हें सियासत की बारीक समझ देता रहा, लेकिन शायद यही अनुभव उन्हें उस कठिन दौर में भी पूरी तरह संभाल नहीं सका, जब हर समीकरण उनके खिलाफ खड़ा था।
सितंबर 1979 में जब उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तब असम केवल राजनीतिक अस्थिरता से नहीं, बल्कि सामाजिक उथल-पुथल से भी गुजर रहा था। जनता पार्टी के भीतर गुटबाज़ी अपने चरम पर थी। हर गुट अपनी ताकत के हिसाब से हिस्सेदारी चाहता था, लेकिन किसी एक नेता पर भरोसा करने को तैयार नहीं था। ऐसे में हजारिका का चयन एक मजबूरी बनकर सामने आया। वे न सबसे लोकप्रिय थे, न सबसे प्रभावशाली, लेकिन वे एक ऐसे चेहरे थे, जिन पर अस्थायी सहमति बन सकती थी।
सत्ता की असली डोर कई हाथों में बंटी हुई थी
सियासत में “समझौते का चेहरा” बनना जितना आसान लगता है, उतना होता नहीं। क्योंकि जहां समर्थन अधूरा हो, वहां असंतोष हमेशा पूरी ताकत से मौजूद रहता है। हजारिका के साथ भी यही हुआ। मुख्यमंत्री बनने के बाद जल्द ही यह साफ हो गया कि सत्ता की असली डोर कई हाथों में बंटी हुई है। उन्हें हर फैसले के लिए अलग-अलग गुटों को साथ रखना पड़ता था, किसी विधायक को मनाना, किसी गुट को संतुष्ट करना और किसी समीकरण को बिगड़ने से बचाना।
इस स्थिति में उनकी भूमिका एक निर्णायक नेता की बजाय एक समन्वयक की बन गई। शासन के फैसले राजनीति के दबाव में आने लगे और हर कदम पर सहमति की जरूरत पड़ने लगी। नतीजा यह हुआ कि फैसलों की गति धीमी हो गई और अनिश्चितता बढ़ती चली गई। सरकार चलाने से ज्यादा जरूरी हो गया उसे गिरने से बचाना।
उनका 93 दिनों का कार्यकाल किसी एक बड़ी घटना से नहीं टूटा, बल्कि यह धीरे-धीरे खत्म होते विश्वास की कहानी है। शुरुआत में जो समर्थन उन्हें मिला था, वह समय के साथ शर्तों में बदल गया। हर गुट अपनी हिस्सेदारी चाहता था और जब वह पूरी नहीं होती, तो असंतोष खुलकर सामने आने लगता। सरकार का हर दिन एक नई परीक्षा बन गया।
इसी दौरान असम का सामाजिक और राजनीतिक माहौल भी तेजी से बदल रहा था। क्षेत्रीय अस्मिता और पहचान के सवालों ने जनता को आंदोलित कर दिया था। असम आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी और लोगों में एक मजबूत नेतृत्व की मांग बढ़ रही थी। लेकिन हजारिका के पास वह राजनीतिक ताकत नहीं थी, जो इन चुनौतियों का सीधा सामना कर सके। वे हर मोर्चे पर संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन यह संतुलन बार-बार टूटता रहा।
गुटबाजी, महत्वाकांक्षाएं और असंतोष से गिरी सरकार
अक्सर यह सवाल उठता है कि उनकी सरकार के पीछे कौन-सी ताकतें काम कर रही थीं। लेकिन उस दौर की सच्चाई किसी एक साजिश से कहीं ज्यादा जटिल थी। केंद्र और राज्य के बीच तनाव, जनता पार्टी के भीतर गहरी गुटबाजी, स्थानीय नेताओं की अलग-अलग महत्वाकांक्षाएं और जनता के बीच बढ़ता असंतोष – ये सभी कारक एक साथ सक्रिय थे। यह किसी एक व्यक्ति की चाल नहीं, बल्कि कई ताकतों के टकराव का परिणाम था।
हजारिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती कोई नई नीति लागू करना नहीं, बल्कि मौजूदा व्यवस्था को संभालकर रखना था। उनका पूरा कार्यकाल इसी कोशिश में बीता कि प्रशासन पूरी तरह चरमराए नहीं, कानून-व्यवस्था नियंत्रण में रहे और राजनीतिक संकट विस्फोटक रूप न ले ले। लेकिन जब राजनीतिक आधार ही कमजोर हो, तो स्थिरता बनाए रखना आसान नहीं होता।
आखिरकार वही हुआ, जिसकी आशंका शुरू से बनी हुई थी। समर्थन धीरे-धीरे खिसकता गया और 11 दिसंबर 1979 को उनकी सरकार गिर गई। 9 सितंबर से 11 दिसंबर तक चला यह 93 दिनों का कार्यकाल समाप्त हो गया, लेकिन अपने पीछे एक गहरी सियासी सीख छोड़ गया।
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क्या जोगेन्द्र नाथ हजारिका असफल मुख्यमंत्री थे? इस सवाल का जवाब सीधे-सीधे नहीं दिया जा सकता। क्योंकि असफलता को केवल परिणाम से नहीं, बल्कि परिस्थितियों से भी समझना पड़ता है। वे ऐसे समय में मुख्यमंत्री बने, जब असम की राजनीति एक संक्रमण काल से गुजर रही थी। पुराने समीकरण टूट रहे थे और नए गठजोड़ अभी पूरी तरह बन नहीं पाए थे।
कई मायनों में उनका कार्यकाल एक “केयरटेकर” सरकार जैसा नजर आता है, लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं है। वे केवल समय काटने नहीं आए थे, बल्कि हर दिन एक नई चुनौती से जूझ रहे थे। फर्क सिर्फ इतना था कि उनके पास उन चुनौतियों से निपटने के लिए जरूरी राजनीतिक ताकत नहीं थी।
जोगेन्द्र नाथ हजारिका की कहानी यह बताती है कि सियासत में केवल कुर्सी तक पहुंच जाना ही सब कुछ नहीं होता। असली चुनौती उस कुर्सी को संभालने की होती है, और इसके लिए जरूरी होता है मजबूत समर्थन, स्पष्ट रणनीति और भरोसे का स्थिर संतुलन। जब यह संतुलन बिगड़ता है, तो सबसे सुरक्षित विकल्प भी सबसे कमजोर कड़ी बन जाता है।
असम की राजनीति का यह छोटा-सा अध्याय एक बड़ी सच्चाई को उजागर करता है कि सत्ता केवल पद नहीं, बल्कि परिस्थितियों का खेल है। और जब परिस्थितियां आपके खिलाफ हों, तो 93 दिन भी एक लंबी जंग की तरह महसूस होते हैं। जोगेन्द्र नाथ हजारिका की यह कहानी उसी जंग की दास्तान है, जहां हार किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे दौर की थी।
यह सीरीज असम के सभी मुख्यमंत्रियों की कहानी प्रस्तुत करती है। पढ़ें अगली कड़ी में सैयदा अनवरा तैमूर की राजनीतिक यात्रा।
