जब असम की राजनीति की किताब खोली जाए, तो सरत चंद्र सिंघा (Sarat Chandra Singha) का नाम वैसे ही चमकता है जैसे अंधेरे में कोई किरण। उनका जीवन और नेतृत्व केवल पद और सत्ता तक सीमित नहीं था, बल्कि जनता के दिलों में सीधे उतरने और उनके जीवन को बदलने की कहानी थी। उनका सबसे बड़ा किस्सा वह था जब विभाजन के समय गोलपारा जिले को अलग हिस्सों में जोड़ने की चर्चा उठी। कई लोग दबाव डाल रहे थे कि यह हिस्सा किसी अन्य राज्य में चले जाए, लेकिन सिन्हा ने सूझबूझ और दूरदर्शिता दिखाते हुए असम की भौगोलिक और सांस्कृतिक अखंडता बचाई। यह घटना उनके राजनीतिक जीवन का टर्निंग प्वाइंट बन गई और उन्हें सिर्फ मुख्यमंत्री ही नहीं, बल्कि जनता के नेता के रूप में अमर बना दिया।
सरत चंद्र सिंघा की पहचान हमेशा उनके सरल जीवन और जनता से जुड़ाव से रही। लोग उन्हें प्यार से “बेयरफुट मुख्यमंत्री” कहते थे। हां, बिल्कुल वही नाम जो उनकी सादगी और आम लोगों के बीच सहज रहने के अंदाज को दर्शाता था। खादी पहनना, सार्वजनिक कार्यक्रमों में जूते न पहनना और सीधे जनता के बीच बैठना उनके लिए आदत थी। यह कोई दिखावा नहीं था, बल्कि उनका तरीका था यह दिखाने का कि सत्ता और सम्मान का असली मतलब केवल पद नहीं, बल्कि सेवा है।
जब एक रिफाइनरी ने पूरे इलाके की तस्वीर बदल दी
उनकी दूरदर्शिता का एक और उदाहरण था बोंगाईगांव रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड की स्थापना। यह कोई मामूली औद्योगिक परियोजना नहीं थी। सीमांत क्षेत्र में इस प्रोजेक्ट के आने से स्थानीय युवाओं को रोजगार मिला और क्षेत्र का आर्थिक चेहरा बदला। 29 अगस्त 2020 को इस रिफाइनरी के टाउनशिप में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई। अधिकारियों ने कहा कि यह केवल औद्योगिक प्रगति का प्रतीक नहीं, बल्कि क्षेत्रीय विकास और लोगों की भलाई की प्रतिबद्धता का प्रतीक है।
सरत चंद्र सिंघा का जन्म 1 जनवरी 1914 को धुबरी जिले के चापर कस्बे के भक्तपारा गांव में हुआ। उनका परिवार साधारण राजबंशी था और पिता लालसिंह सिंघा ने बचपन से ही मेहनत, अनुशासन और सरल जीवन की शिक्षा दी। सरत चंद्र हर दिन 25 किलोमीटर कभी पैदल और कभी साइकिल से स्कूल जाया करते थे। खेतों में पिता के साथ समय बिताना और स्लेट-पेंसिल लेकर गणित और जीवन की बातें सीखना उनके बचपन का हिस्सा था। उन्होंने सीखा कि शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं होती, बल्कि जीवन के हर कदम पर सीखने की प्रक्रिया चलती रहती है।
वकालत छोड़ शिक्षक बने, यहीं से गढ़ी नेतृत्व की नींव
कॉटन कॉलेज, गुवाहाटी से स्नातक करने के बाद उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई पूरी की। लेकिन कानून की दुनिया ने उन्हें कभी खींचा नहीं। 1940 में उन्होंने अपने गांव लौटकर विज्ञान शिक्षक के रूप में काम करना चुना। बच्चों को भूसे और प्राकृतिक सामग्री से कागज बनाना सिखाना, विज्ञान के प्रयोग कराना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना उनकी शिक्षा का हिस्सा था। यही अनुभव उनके नेतृत्व कौशल और सामाजिक संवेदना का आधार बना।
राजनीति में उनका सफर 1945 में ढुबरी लोकल बोर्ड से शुरू हुआ। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता महेंद्र मोहन चौधरी ने उन्हें 1946 में गुवाहाटी बुलाया और विधानसभा चुनाव के लिए टिकट दिलाया। चुनाव अभियान के लिए उन्हें 750 रुपये मिले, लेकिन उन्होंने शेष 250 रुपये लौटाने का निर्णय लिया। यह छोटी घटना उनके ईमानदारी और नैतिक चरित्र की मिसाल थी। उनके विधानसभा सफर में उन्होंने चार बार जीत हासिल की — 1946–52, 1962–67, 1972–78 और 1985–90 में।
जब असम की राजधानी शिलांग से दिसपुर पहुंची
1972 में इंदिरा गांधी ने उन्हें अस्थायी मुख्यमंत्री बनाया और बाद में निर्वाचित होकर 1978 तक उन्होंने मुख्यमंत्री पद संभाला। उनके कार्यकाल की बड़ी उपलब्धियों में असम की राजधानी का शिलांग से दिसपुर स्थानांतरण शामिल है। 21 जनवरी 1972 को जब मेघालय अलग राज्य बना, तब शिलांग को असम की राजधानी के बजाय नए राज्य मेघालय की राजधानी बनाया गया। उन्होंने बेरोजगार युवाओं को राजधानी निर्माण में लगाया और पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम को मजबूत किया, जिससे 13,615 फेयर प्राइस शॉप स्थापित हुईं।
भूमिहीनों को बैंक ऋण और जमीन दिलाना, सिंचाई परियोजनाओं की शुरुआत करना और बिजली उत्पादन को 43 प्रतिशत तक बढ़ाना उनके प्रशासनिक कार्यकाल की अहमियत दिखाता है। उनके प्रयासों से असम में बोनीगांव, कपिली, लाकुवा, लॉन्गपी और बोंगाईगांव थर्मल प्रोजेक्ट स्थापित हुए। गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के निर्माण में भी उनकी भूमिका रही।
सिंघा का लोकतंत्र और विकास के प्रति दृष्टिकोण अलग था। उनका मानना था कि लोकतंत्र तभी जीवंत रहता है जब सत्ता और संसाधनों का लाभ पिछड़े वर्ग और गरीबों तक पहुंचे। उन्होंने पंचायत राज की व्यवस्था लागू की, स्थानीय युवाओं को रोजगार दिया और सहकारी समितियों का नेटवर्क 30 लाख परिवारों तक पहुंचाया।
उनके मुख्यमंत्री रहते हुए तीन बार अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा। 1973 में गरीबी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के आरोप लगे। 1974 में अकाल और प्रशासनिक आलोचना हुई। 1977 में बाढ़ राहत फंड और केंद्रीय सहायता के उपयोग पर सवाल उठे। लेकिन हर बार उन्होंने धैर्य और गंभीरता से जवाब दिया और यह दिखाया कि विकास और जनता की भलाई में किसी समझौते की गुंजाइश नहीं। यही उनके उस कथित कथन का जादू था — “जनता की भलाई में समझौते की गुंजाइश नहीं”।
उनकी निजी जिंदगी भी उनके सिद्धांतों की मिसाल थी। पत्नी लाबन्या सिंघा और उनके तीन पुत्र तथा तीन पुत्रियों के साथ उनका जीवन सादगी और लगाव का उदाहरण था। बड़े पुत्र के निधन के बाद भी उन्होंने अपने निजी दुःख को सार्वजनिक सेवा में बाधा नहीं बनने दिया। उनकी बेटी कहती थीं कि वे कभी “वादे नहीं करते थे, जो कर सकते थे वही करते थे।” यही उनकी राजनीति और जीवन की मूल भावना थी।
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सरत चंद्र सिंघा केवल प्रशासनिक सुधार और विकास के नेता ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने सामाजिक न्याय और शिक्षा के क्षेत्र में भी अहम योगदान दिया। उन्होंने स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर दिए, किसानों के लिए सहायता योजनाएं लागू की, सिंचाई और ग्रामीण विकास की पहल की। उनके समय में असम में स्वास्थ्य और शिक्षा के बुनियादी ढांचे को मजबूत किया गया।
उनके मुख्यमंत्री पद के दौरान असम की राजनीति में कई संवेदनशील क्षण आए। विभाजन, अकाल, आर्थिक दबाव और सामाजिक असमानता जैसी परिस्थितियों में उन्होंने धैर्य, दूरदर्शिता और जनता की भलाई के नजरिए से निर्णय लिए। यही कारण है कि असमिया जनता आज भी उन्हें नैतिक और जनकेंद्रित राजनीति का प्रतीक मानती है।
सिंघा का स्वास्थ्य 2005 के दिसंबर में बिगड़ गया और 25 दिसंबर 2005 की सुबह उन्होंने 91 साल की उम्र में अंतिम सांस ली। असम सरकार ने तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया। सिन्हा की याद में 28 सितंबर 2020 को ढुबरी जिले के चापर में उनका स्मारक और प्रतिमा स्थापित की गई।
सरत चंद्र सिंघा का बेयरफुट अंदाज, जनता के बीच सरल जीवनशैली, दूरदर्शिता और नैतिकता हमेशा असम के इतिहास में याद रखी जाएगी। उनके किस्से, उनके फैसले और उनके जीवन का हर पल यह बताता है कि सच्चे नेता वही हैं जो सत्ता के लिए नहीं, जनता के लिए जीते हैं।
यह सीरीज असम के सभी मुख्यमंत्रियों की कहानी प्रस्तुत करती है। पढ़ें अगली कड़ी में गोलाप बोरबोरा की राजनीतिक यात्रा।
