असम जल रहा था। सड़कों पर गुस्सा था, लोगों के दिलों में डर और अनिश्चितता थी। छात्र आंदोलन अपने चरम पर था, “कौन अपना, कौन बाहरी” का सवाल हर घर में गूंज रहा था। ऐसे वक्त में जब बड़े-बड़े नेता भी हालात संभालने से हिचक रहे थे, तब एक महिला को आगे किया गया – सैयदा अनवरा तैमूर। यह फैसला सिर्फ राजनीतिक नहीं था, बल्कि एक उम्मीद थी कि शायद यह महिला उस आग को शांत कर पाएगी, जो पूरे राज्य को अपनी चपेट में ले चुकी थी।
सन् 1980 की सर्दियों में जब देश की राजनीति भी करवट ले रही थी और इंदिरा गांधी की वापसी हो चुकी थी, तब असम में कांग्रेस ने एक ऐसा दांव खेला जिसने इतिहास बना दिया। 6 दिसंबर 1980 को सैयदा अनवरा तैमूर (Syeda Anwara Taimur) ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और इसी के साथ वह देश के किसी भी राज्य की पहली मुस्लिम महिला मुख्यमंत्री बन गईं। यह सिर्फ एक पद नहीं था, बल्कि एक प्रतीक था – महिलाओं के लिए, अल्पसंख्यकों के लिए और उन तमाम लोगों के लिए जो राजनीति में अपनी जगह तलाश रहे थे।
लेकिन यह कुर्सी आसान नहीं थी। असम आंदोलन अपने उफान पर था। ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के नेतृत्व में लोग सड़कों पर थे। मुद्दा था – बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासियों का। यह आंदोलन धीरे-धीरे उग्र होता जा रहा था। ऐसे में अनवरा तैमूर को मुख्यमंत्री बनाना एक सोचा-समझा कदम था। वह खुद असम की मूल निवासी थीं, एक मुस्लिम महिला थीं और समाज में उनकी छवि बेहद साफ और सम्मानजनक थी। कांग्रेस को उम्मीद थी कि वह दोनों पक्षों के बीच पुल का काम करेंगी। और सच कहें तो उन्होंने कोशिश भी पूरी ईमानदारी से की।
लोग उन्हें नेता कम, एक मां ज्यादा मानते थे
उनके व्यक्तित्व में एक अजीब-सी सादगी और अपनापन था। लोग उन्हें नेता कम, एक मां ज्यादा मानते थे। यही वजह थी कि जब वह किसी गांव में जातीं, तो लोग बिना हिचक अपने दुख-दर्द उनके सामने रख देते थे। वह सुनती थीं, समझती थीं और जहां तक हो सके, समाधान निकालने की कोशिश करती थीं।
लेकिन राजनीति सिर्फ नीयत से नहीं चलती, हालात भी बहुत कुछ तय करते हैं। अनवरा तैमूर का कार्यकाल बहुत छोटा रहा – सिर्फ करीब 6 महीने। 30 जून 1981 को असम में फिर से राष्ट्रपति शासन लागू हो गया और उनका मुख्यमंत्री पद खत्म हो गया। लेकिन इस छोटे से समय में भी उन्होंने यह दिखा दिया कि नेतृत्व सिर्फ ताकत का नहीं, भरोसे का भी होता है।
सैयदा अनवरा तैमूर की कहानी यहीं से शुरू नहीं होती। दरअसल उनकी असली ताकत उनके शुरुआती जीवन में ही नजर आने लगती है। 24 नवंबर 1936 को जन्मी अनवरा ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स में ऑनर्स किया। उस दौर में जब लड़कियों की पढ़ाई भी बड़ी बात मानी जाती थी, तब उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की। इसके बाद उन्होंने जोरहाट के देवीचरण बरुआ गर्ल्स कॉलेज में इकोनॉमिक्स की लेक्चरर के रूप में काम किया।
एक शिक्षक के रूप में उनका व्यक्तित्व और भी निखरकर सामने आया। छात्र-छात्राएं उन्हें बहुत पसंद करते थे। वह सख्त कम और स्नेही ज्यादा थीं। यही गुण बाद में उनकी राजनीति की पहचान बना। जब वह राजनीति में आईं, तो उनके पास भाषणों की चमक-दमक कम थी, लेकिन लोगों से जुड़ने की ताकत बहुत ज्यादा थी।
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1972 में वह पहली बार असम विधानसभा की सदस्य बनीं। इसके बाद 1978, 1983 और 1991 में भी उन्होंने चुनाव जीता। यह बताता है कि उनका जनाधार कितना मजबूत था। लोग उन्हें सिर्फ एक नेता के रूप में नहीं, बल्कि अपने परिवार के सदस्य की तरह देखते थे।
मुख्यमंत्री पद के बाद भी उनका राजनीतिक सफर जारी रहा। 1983 से 1985 के बीच उन्होंने असम में पीडब्ल्यूडी मंत्री के रूप में काम किया। इस दौरान उन्होंने सड़क, पुल और इमारतों के निर्माण में अहम योगदान दिया। असम के कई हिस्सों में जो बुनियादी ढांचा आज नजर आता है, उसमें कहीं न कहीं उनकी मेहनत की छाप जरूर मिलती है।
1988 में उन्हें राज्यसभा भेजा गया। यह उनके राजनीतिक अनुभव और कद का सम्मान था। बाद में 1991 में उन्हें असम सरकार में कृषि मंत्री भी बनाया गया। यानी उन्होंने राज्य और केंद्र – दोनों स्तरों पर काम किया और हर जगह अपनी पहचान बनाई।
लेकिन राजनीति में सब कुछ हमेशा सीधा नहीं चलता। वक्त के साथ उनके और कांग्रेस के बीच दूरियां बढ़ीं। आखिरकार 2011 में उन्होंने ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) जॉइन कर ली। हालांकि, उन्होंने इस पार्टी से चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन एक स्टार प्रचारक के रूप में सक्रिय रहीं।
पूर्व मुख्यमंत्री का नाम NRC से बाहर, सवालों में घिरा सिस्टम
उनकी जिंदगी का एक दिलचस्प और थोड़ा दुखद पहलू भी है। 2018 में जब असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (NRC) का फाइनल ड्राफ्ट आया, तो उसमें उनका नाम नहीं था। यह खबर चौंकाने वाली थी – एक ऐसी महिला, जो राज्य की मुख्यमंत्री रह चुकी हो, उसका नाम नागरिक सूची में न हो! बाद में उन्होंने साफ किया कि शायद परिवार के लोगों ने आवेदन नहीं किया था, इसलिए उनका नाम शामिल नहीं हो पाया। यह घटना अपने आप में कई सवाल खड़े करती है, लेकिन साथ ही यह भी दिखाती है कि सिस्टम कितना जटिल हो सकता है।
सैयदा अनवरा तैमूर की जिंदगी का आखिरी अध्याय थोड़ा भावुक है। अपने अंतिम वर्षों में वह अपने बेटे के पास ऑस्ट्रेलिया चली गईं। वहीं 28 सितंबर 2020 को उनका निधन हो गया। दिल का दौरा पड़ने से उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा। यह एक अजीब संयोग था कि जिस महिला ने अपनी पूरी जिंदगी असम और भारत के लिए समर्पित कर दी, उसने अपनी आखिरी सांस अपने देश से दूर ली।
लेकिन दूरी सिर्फ भौगोलिक थी, दिल से वह हमेशा भारत में ही रहीं। ऑस्ट्रेलिया में भी उनका घर “मिनी इंडिया” जैसा था। वह हर भारतीय त्योहार मनाती थीं, पड़ोसियों को बुलाती थीं, भारतीय संस्कृति से परिचित कराती थीं। उनकी यह आदत बताती है कि वह जहां भी रहीं, अपनी जड़ों से कभी नहीं कटीं।
आज जब हम राजनीति में बड़े-बड़े नामों की चर्चा करते हैं, तो सैयदा अनवरा तैमूर का नाम अक्सर छूट जाता है। यह थोड़ा अन्याय भी है। क्योंकि उन्होंने न सिर्फ इतिहास बनाया, बल्कि उस इतिहास को अपने काम से सार्थक भी किया।
उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि पहचान सिर्फ पद से नहीं बनती, बल्कि उस विश्वास से बनती है जो लोग आप पर करते हैं। उन्होंने यह विश्वास जीता था – एक शिक्षक के रूप में, एक नेता के रूप में और एक इंसान के रूप में।
“किस्सा मुख्यमंत्री का” सीरीज में सैयदा अनवरा तैमूर की कहानी इसलिए खास है, क्योंकि यह सिर्फ एक मुख्यमंत्री की कहानी नहीं है, बल्कि उस महिला की कहानी है जिसने खुद अपनी पहचान गढ़ी, मुश्किल हालात में जिम्मेदारी संभाली और यह साबित किया कि सादगी और ईमानदारी भी राजनीति में अपनी जगह बना सकती है। उनका कार्यकाल भले छोटा रहा हो, लेकिन असर बहुत गहरा था। और शायद यही किसी भी नेता की असली पहचान होती है।
यह सीरीज असम के सभी मुख्यमंत्रियों की कहानी प्रस्तुत करती है। पढ़ें अगली कड़ी में केशब चन्द्र गोगोई की राजनीतिक यात्रा।
