पश्चिम बंगाल में बकरीद के अवसर पर पशुओं की कुर्बानी को लेकर विवाद छिड़ा हुआ है। राज्य की शुभेंदु सरकार ने पुराने नियमों को सख्ती से लागू करने की घोषणा की है, जिसकी वजह से राज्य की एक आबादी नाराज है। मामला अदालत तक पहुंच गया है।

लेकिन इस बहस के बीच एक और सवाल लोगों के मन में उठ रहा है कि भारत में बकरीद के समय कितने बकरों की कुर्बानी दी जाती है। सरकार इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा जारी नहीं करती है। सिर्फ कुछ रिपोर्ट्स मौजूद हैं, जिनके जरिए अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह बाजार कितना बड़ा है।

कितने बकरों की कुर्बानी?

भारत में 20 करोड़ से ज्यादा मुस्लिम आबादी है। भिन्न-भिन्न रिपोर्ट में दावा किया गया है कि करीब 8 से 10 फीसदी मुस्लिम परिवार बकरीद के अवसर पर जानवरों की कुर्बानी देते हैं।

कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक बकरीद के दौरान करीब 2 करोड़ बकरों की बिक्री और कुर्बानी हो सकती है। हालांकि इन आंकड़ों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है। पिछले साल अकेले लखनऊ में बकरीद के मौके पर पशुओं की खरीद-फरोख्त से करीब 400 करोड़ रुपये के कारोबार होने का दावा किया गया।

रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले साल लखनऊ में करीब तीन लाख लोगों ने बकरीद पर कुर्बानी दी थी। इन लोगों ने ₹15,000 से लेकर ₹5 लाख तक के बकरे खरीदे थे। लखनऊ के दुबग्गा और खजुरा बाजार में ही सिर्फ 6 दिनों के भीतर करीब 60 करोड़ रुपये का कारोबार हुआ था।

साल 2023 में बीएमसी ने एक डेटा साझा किया था। उस डेटा में बताया गया कि 2023 में मुंबई के देवनार बूचड़खाने से सिर्फ एक हफ्ते के अंदर 1.68 लाख से ज्यादा बकरे और भेड़ें बेची गईं थीं। उसी रिपोर्ट में ये भी बताया गया कि देवनार बूचड़खाने में देश के अलग-अलग राज्यों से 1,77,278 बकरे और भेड़ें बिक्री के लिए आई थीं। यहां भी 1,68,498 जानवर बिक गए थे।

जानकारी के लिए बता दें कि एशिया का सबसे बड़ा बूचड़खाना मुंबई की देवनार मंडी में ही स्थित है। पिछले साल भी ईद-उल-अजहा से कुछ दिन पहले ही 1.5 लाख से ज्यादा जानवर वहां लाए गए थे। इनमें बकरे और करीब 8,000 भैंसें शामिल थीं। पिछले साल ही मुंबई के अलावा देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में भी लाखों की संख्या में बकरों की बिक्री देखने को मिली थी। लखनऊ में जॉगर्स पार्क, दुबग्गा, नींबू पार्क, हर्डिंग ब्रिज, खुर्मनगर और मौलवीगंज में बकरा मंडियां लगाई गई थीं। यहां भी कुर्बानी के लिए सबसे ज्यादा बकरे दुबग्गा मंडी से खरीदे गए थे।

भारत की मीट इंडस्ट्री कितनी बड़ी है

Basic Animal Husbandry Statistics 2025 एक विस्तृत रिपोर्ट है। यह रिपोर्ट बताती है कि भारत की मीट इंडस्ट्री कितनी बड़ी है। साल 2024-25 में देश में मीट प्रोडक्शन 10.50 मिलियन टन रहा है। अगर पूरी दुनिया की बात करें तो भारत मीट प्रोडक्शन के मामले में चौथे पायदान पर आता है। अगर 2023-24 से तुलना की गई तो 2024-25 में मीट प्रोडक्शन 2.46 फीसदी तक बढ़ गया था। नीचे दी गई टेबल से समझते हैं कि भारत साल दर साल कितना मीट प्रोडक्शन रहा है-

वर्षमीट प्रोडक्शन (मिलियन टन)प्रति व्यक्ति उपलब्धता (किलो/वर्ष)
2018-198.116.15
2019-208.596.45
2020-218.796.52
2021-229.296.82
2022-239.767.1
2023-2410.257.39
2024-2510.57.5

ऊपर दी गई टेबल से पता चलता है कि 2018-19 में देश का कुल मीट प्रोडक्शन 8.11 मिलियन टन था, जो 2024-25 में बढ़कर 10.50 मिलियन टन तक हो गया था। इसी दौरान अगर प्रति व्यक्ति मीट उपलब्धता की बात करें तो यह संख्या 6.15 किलो प्रति वर्ष से बढ़कर 7.50 किलो प्रति वर्ष हो गई थी। ऊपर दी गई टेबल से यह ट्रेंड स्पष्ट हो रहा है कि मीट की मांग और उत्पादन दोनों तेजी देखने को मिली है।

रिपोर्ट से यह जानकारी भी मिलती है कि कुल मीट प्रोडक्शन में किस जानवर का कितना हिस्सा है। यहां चिकन की हिस्सेदारी 49 फीसदी है, भैंस की 19 फीसदी और बकरे की 15 फीसदी। नीचे दी गई टेबल में पूरी लिस्ट देखें-

जानवरकुल मीट प्रोडक्शन में हिस्सेदारी
पोल्ट्री (चिकन)49%
भैंस19%
बकरा (Goat)15%
भेड़ (Sheep)11%
सुअर (Pig)4%
गाय-बैल (Cattle)2%

बात अगर भारत के सबसे ज्यादा मीट प्रोडक्शन वाले राज्य की करें तो इसे लेकर भी विश्वनीय डेटा मिलता है। इस मामले में पश्चिम बंगाल पहले पायदान पर आता है, यूपी दूसरे नंबर पर और महाराष्ट्र तीसरे पर। नीचे दी गई टेबल से इसे समझें-

राज्यकुल मीट प्रोडक्शन में हिस्सेदारी
पश्चिम बंगाल12.46%
उत्तर प्रदेश12.20%
महाराष्ट्र11.57%
आंध्र प्रदेश10.84%
तेलंगाना10.49%

ऐसे में भारत में कितने बकरे कटते हैं, इसे लेकर कोई आधिकारी डेटा उपलब्ध नहीं है। लेकिन रिपोर्ट्स के जरिए एक ट्रेंड जरूर देखने को मिलता है। इसके ऊपर भारत का मीट प्रोडक्शन भी कुछ संकेत समझने में मदद जरूर करता है।

ऐसे में भारत में हर साल कितने बकरे कटते हैं, इसे लेकर कोई आधिकारिक डेटा उपलब्ध नहीं है। लेकिन अलग-अलग रिपोर्ट्स और बाजार के आंकड़ों से एक ट्रेंड जरूर पकड़ में आता है। वहीं भारत का बढ़ता मीट प्रोडक्शन भी इस इंडस्ट्री के तेजी से फैलते दायरे की तस्दीक करता है।