देश की राजनीति में इन दिनों ईडी की कार्रवाई, दल-बदल, चुनावी गारंटी और सत्ता विस्तार की रणनीति नए सिरे से चर्चा में है। पंजाब से लेकर पश्चिम बंगाल और तेलंगाना तक राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलते दिखाई दे रहे हैं। कहीं विपक्षी नेताओं पर जांच एजेंसियों का दबाव है, तो कहीं भाजपा अपने संगठन और नए चेहरों के जरिए भविष्य की जमीन तैयार करती दिख रही है। इन घटनाओं के बीच जवाबदेही, नैतिकता और राजनीतिक अवसरवाद पर भी बहस तेज हो गई है।
अब अरोड़ा?
पंजाब सरकार के मंत्री संजीव अरोड़ा इस समय जेल में हैं। उन्हें प्रवर्तन निदेशालय ने 100 करोड़ के जीएसटी घोटाले में आरोपी बनाया है। मंत्री बनने से पहले वे राज्यसभा सदस्य थे। आम आदमी पार्टी ने उन्हें पिछले दिनों लुधियाना से विधानसभा उपचुनाव लड़ाया था। जीत के बाद उन्होंने राज्यसभा से इस्तीफा दिया तो राज्यसभा की यह सीट अरविंद केजरीवाल ने राजेंद्र गुप्ता को दे दी। राघव चड्ढ़ा की भाजपा से नजदीकियां देखते हुए आम आदमी पार्टी ने गुप्ता को राज्यसभा में अपना वक्ता बनाया। लेकिन पिछले दिनों राघव चड्ढ़ा के साथ गुप्ता भीआम आदमी पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए। उन्हीं के साथ अशोक मित्तल भी भाजपा में आ गए। लवली यूनिवर्सिटी के मालिक मित्तल को प्रवर्तन निदेशालय ने गिरफ्तार नहीं किया था, पर उन पर काले धन को सफेद करने का आरोप लगा कर छापे मारे थे। राघव चड्ढा के साथ मित्तल भी भाजपा में आ चुके हैं। उनके खिलाफ प्रर्वन निदेशालय की कार्रवाई का अब कोई अता-पता नहीं। चर्चा है कि जमानत पर छूटने के बाद अरोड़ा भी भाजपा का दामन थाम सकते हैं। पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव होंगे। भाजपा इस चुनाव में खेला करना चाहेगी। प्रवर्तन निदेशालय के छापों से उसे अपना कुनबा बढ़ाने में आसानी होगी। बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद ही तंज कसा जा रहा था कि अब ईडी की पूरी टीम पंजाब की ओर कूच करेगी।
परीक्षा ‘गारंटी’ की
भाजपा की पश्चिम बंगाल में असली परीक्षा तो अब शुरू होगी जब उसकी चुनाव पूर्व दी गई गारंटियों का उल्लंघन होगा। जो काम सबसे आसान था वह सुवेंदु अधिकारी ने कर दिया। सरकार बीएसएफ को सीमा पर जमीन देगी ताकि बाड़ लगाई जा सके और बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ को रोका जा सके। असली मुश्किल तो भाजपा सरकार को नकदी से जुड़ी गारंटियों को पूरा करने में आएगी। महिलाओं को हर महीने 3000 रुपए देने का वादा कब पूरा होगा? दिल्ली में प्रधानमंत्री ने कहा था कि आठ मार्च 2025 को महिला दिवस है और उस दिन से ही दिल्ली की भाजपा सरकार महिला सम्मान निधि का पैसा महिलाओं के खाते में डालना शुरू कर देगी। यह अभी तक पूरा नहीं हुआ है। दिल्ली में प्रति व्यक्ति आय बंगाल से कई गुना ज्यादा है। तब भी 2500 रुपए नहीं दे पा रही भाजपा सरकार। बंगाल में तो वादा 3000 का है, कैसे होगा पूरा?
संगठन के काम में जुटे नेताजी
विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद मुख्यमंत्री की दौड़ एक राज्य में सबसे लंबी चली। यहां केंद्रीय नेतृत्व में सक्रिय नेता जी इस दौड़ में सबसे आगे बताए जा रहे थे, लेकिन स्थानीय स्तर पर चले घमासान के बाद उन्हें खुद केंद्रीय नेतृत्व की बात को समझना पड़ा। अब ये नेता जी अपने पुराने काम पर लौट आए हैं। एक के बाद एक राज्यों व संगठनों के लिए आदेश जारी कर रहे हैं। बीते चुनावों की वजह से संगठन में इन आदेशों के नहीं मिलने का मलाल देखा जा रहा था। इस निर्णय से संबंधित राज्य के सांसदों ने भी राहत की सांस ली है। उन्हें भी इस बात का डर था कि नेता जी कहीं राज्य में ही डेरा डाल कर न बैठ जाएं, जिससे उनकी गतिविधियों पर असर पड़ सकता है।
रेवंत पर नजर
हैदराबाद की सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तेलंगाना के कांग्रेसी मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी को अपने साथ आने का प्रस्ताव दे दिया। यों प्रधानमंत्री का अंदाज मजाकिया था। प्रधानमंत्री ने संदर्भ के साथ यह बात कही, लेकिन उनकी टिप्पणी आकस्मिक नहीं थी। बेशक उन्होंने राज्य की भलाई के लिए रेवंत रेड्डी को अपने साथ आने की बात कही लेकिन ऐसा लग रहा है कि रेवंत रेड्डी का भला भी इसी में है कि वे भाजपा के साथ आ जाएं। हालांकि अभी तो वे मुख्यमंत्री हैं और उनको सत्ता संभाले हुए ढाई साल ही हुए हैं। इसलिए वे कहीं नहीं जाएंगे। लेकिन उनके साथ दो बातें ऐसी हैं, जो संदेह पैदा करती हैं। पहली तो यह कि सोनिया व राहुल गांधी के प्रति बहुत ज्यादा स्वामीभक्ति दिखाते हैं। उन्होंने कहा था कि अगर गांधी परिवार कहे तो वे एक हजार करोड़ रुपए भी जुटा कर दे सकते हैं। ऐसी बातें करने वालों को हमेशा शक की निगाह से देखा जाता है। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि रेवंत रेड्डी का अतीत संघ का रहा है। वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से ही कांग्रेस में गए हैं। शुभेंदु अधिकारी भी संघ के बाल स्वयंसेवक थे। उसके बाद उन्होंने राजनीति कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के साथ ही की लेकिन आखिरकार भाजपा में गए और वहां जाकर ऐसे रमे कि क्या कोई पुराना स्वयंसेवक रमेगा। आरएसएस में तो यही कहा जाता है कि एक बार जब संघ के संस्कार आ गए तो फिर जाते नहीं हैं। सो, रेवंत रेड्डी पर नजर रखने की जरूरत है।
‘बाहरी’ की दावेदारी
भाजपा में दूसरे दलों से आने वाले नेताओं के मुख्यमंत्री बनने का सिलसिला जारी है। नया नाम शुभेंदु अधिकारी का जुड़ा है, जो 2020 में ही तृणमूल कांग्रेस से भाजपा में आए थे। उनके नेतृत्व में 2016 की तीन विधायकों वाली भाजपा के विधायकों की संख्या 2021 में बढ़कर 77 हुई और अधिकारी नेता विरोधी दल बन गए। पांच साल बाद 2026 में पार्टी को दो-तिहाई सीटें जिताकर सरकार बनवा दी और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बन गए। मीडिया में भाजपा के ‘आउटसाइडर सीएम क्लब’ की खूब चर्चा होती है। इससे पुराने भाजपाई वफादार त्रस्त दिखते हैं, पर पार्टी आलाकमान की सोच है कि दूसरे दलों के कद्दावर नेताओं को पार्टी नहीं लेती तो इतना विस्तार संभव न होता। इसी क्लब में हिमंता बिस्व सरमा, सम्राट चौधरी और पेमा खांडू हैं। कर्नाटक में बसवराज बोम्मई थे, पर वे अब मुख्यमंत्री नहीं हैं। त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक शाह भी कांग्रेस से ही भाजपा में आए थे। भविष्य में ज्योतिरादित्य सिंधिया (मध्य प्रदेश), बृजेश पाठक (उत्तर प्रदेश) और राघव चड्ढा (पंजाब) अगर मुख्यमंत्री बने तो इस ‘बाहरी समुदाय’ की संख्या में और इजाफा होगा।
