भारत के वीर पराक्रमी योद्धाओं को समर्पित जनसत्ता की विशेष सीरीज ‘रणबांकुरे’ के चौथे पार्ट में आपका स्वागत है। ‘रणबांकुरे‘ के इस एपिसोड में हम बात करेंगे 1962 में हुए भारत-चीन युद्ध के नायक सूबेदार जोगिंदर सिंह…. साल 1962 में अरुणाचल प्रदेश के बूमला में दो बार चीनी आक्रमण को विफल करने वाले सूबेदार जोगिंदर सिंह को मरणोपरांत परम वीर चक्र प्रदान से सम्मानित किया गया।

राष्ट्रीय समर स्मारक की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के अनुसार, 23 अक्तूबर 1962 भारत-चीन युद्ध के दौरान सूबेदार जोगिंदर सिंह की 1 सिख बटालियन की प्लाटून ने बूमला, अरुणाचल प्रदेश में चीनी सैनिकों के दो आक्रमणों को विफल कर दिया जिसमें शत्रु को भारी क्षति पहुंचीं।

इन दो आक्रमणों में सूबेदार जोगिंदर सिंह की प्लाटून के तब तक आधे जवान शहीद हो चुके थे। खुद जोगिंदर सिंह भी बुरी तरह घायल हो गए थे लेकिन उन्होंने अपना मोर्चा छोड़ने से इनकार कर दिया। जब उनकी प्लाटून पर चीनी सैनिकों ने तीसरी बार हमला किया तब भी वो और उनकी प्लाटून अपनी जगह पर ही डटे रहे।

इस आक्रमण के दौरान सूबेदार जोगिंदर सिंह ने खुद एक मशीन गन संभाली और देश के कई दुश्मनों को मार गिराया। आखिरी में जब उनका गोला-बारूद खत्म हो गया तो उन्होंने अपने जवानों संग संगीनों से लड़ाई लड़ी।

राष्ट्रीय समर स्मारक की वेबसाइट के अनुसार, इस महासंग्राम में संख्या में अधिक शत्रु सैनिकों से जोगिंदर सिंह और उनके साथी युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। अदम्य शौर्य, प्रेरणादायी नेतृत्व, अद्भुत साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए सूबेदार जोगिंदर सिंह को मरणोपरांत परम वीर चक्र प्रदान से सम्मानित किया गया।

जयपुर से तवांग सेक्टर में भेजे गए थे जोगिंदर सिंह

भारत के हर वीर सैनिक की जानकारी देने वाली वेबसाइट ऑनर पॉइंट के अनुसार, युद्ध से पहले 1 सिख बटालियन जयपुर में तैनात थी। तवांग सेक्टर की स्थिति को देखते हुए उन्हें उस समय के NEFA (अब अरुणाचल प्रदेश) भेजा गया। कठिन रास्तों, विषम परिस्थितियों और खराब मौसम का सामने करते हुए सूबेदार जोगिंदर सिंह और उनकी टीम तैनाती वाली जगह पर पहुंचीं।

सूबेदार जोगिंदर सिंह इससे पहले द्वितीय विश्व युद्ध और 1947-48 के कश्मीर युद्ध में हिस्सा ले चुके थे। अरुणाचल में जोगिंदर सिंह की प्लाटून को बूमला के साथ रणनीतिक पहाड़ी मोर्चे की रक्षा करने की जिम्मेदारी दी गई थी।

बूमला पर हमले से पहले चीनियों ने 20 अक्टूबर 1962 नामकू चू में तैयारी के साथ पहला बड़ा हमला किया। यहां उन्होंने भारतीय चौकियों पर कब्जा किया और तवांग की तरफ बढ़ने लगे, जहां उनका मुकाबला सूबेदार जोगिंदर सिंह और उनकी प्लाटून से हुआ। 23 अक्टूबर को जब चीनियों ने बूमला पर हमला किया, तब सुबह के तकरीबन साढ़े पांच बजे थे। विषम हालातों में हुए हमले का जोगिंदर सिंह और उनकी प्लाटून ने साहस के साथ जवाब दिया और चीनी सेना को भारी नुकसान पहुंचाया। 

आजादी से पहले ब्रिटिश आर्मी में हुए थे भर्ती

26 जनवरी 1921 को पंजाब के मोगा जिले के महाकलन गांव में जन्मे जोगिंदर सिंह ने आजादी से पहले ब्रिटिश इंडियन आर्मी ज्वॉइन की। वह बर्मा में कई स्थानों पर भी तैनात रहे। जिस समय सूबेदार जोगिंदर सिंह शहीद हुए, तब उनके परिवार में उनकी पत्नी के अलावा दो बेटियां और एक बेटा था।

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उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के रहने वाले योगेंद्र सिंह यादव जब 12वीं क्लास में थे, तभी आर्मी में उनका चयन हो गया था। योगेंद्र यादव के बड़े भाई भी सेना में थे। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।