हार के बाद लगभग हर राजनीतिक दल एक ऐसे दौर से गुजरता है जहाँ चुनावी आंकड़ों को तो स्वीकार कर लिया जाता है, लेकिन उनके असली मायने और कारणों को समझने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। तमिलनाडु की सत्ता से द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) के बाहर होने के तीन महीने बाद, पार्टी अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन (जो खुद अपनी सीट हार गए) ने पार्टी की कार्यकारी समिति के सामने खड़े होकर इस विफलता का कारण समझाने की कोशिश की।

स्टालिन ने पार्टी की उच्चस्तरीय कार्यकारी समिति से कहा, “ऐसी कोई जीत नहीं है जो हमने न देखी हो और ऐसी कोई हार नहीं है जिससे हम न गुजरे हों। हम केवल यह चुनाव हारे हैं। यह हार स्थायी नहीं है।” इसी बैठक में पार्टी संगठन के पुनर्गठन के प्रस्तावों को भी मंजूरी दी गई।

पार्टी कैडर का हौसला बढ़ाने के लिए दिए गए इस संदेश में वह आंतरिक तनाव भी साफ़ झलकता है जो इस समय डीएमके के भीतर बना हुआ है। हालांकि पार्टी ने चुनावी हार को स्वीकार कर लिया है, लेकिन जिस लहर या घटनाक्रम ने उसे हराया है, उसे वह पूरी तरह समझ नहीं पाई है।

स्टालिन ने पार्टी की कमियों को लेकर खुलकर बात की। उन्होंने कहा, “सबसे पहले, हमें अपनी गलतियों को स्वीकार करना होगा। हमें उन्हें खुले तौर पर मानना होगा।” हार की समीक्षा के लिए 38 सदस्यों की एक समिति बनाई गई थी, और एक वेबसाइट के माध्यम से लोगों के सुझाव भी मांगे गए थे। पूर्व मुख्यमंत्री ने इस पर कहा कि उन्होंने इन सुझावों को पढ़ा है।

पूर्व मंत्री थंगम थेन्नरासु की अध्यक्षता वाली एक पुनर्गठन समिति ने सांगठनिक बदलावों पर विचार किया, जिसके बाद स्टालिन ने एक बेहद सटीक बात कही, “पूरे शहर को रोशनी देने वाला दीपक अपने खुद के नीचे फैले अंधेरे को नहीं देख पाता।”

पार्टी अध्यक्ष के आकलन में इस ‘अंधेरे’ की वजह ऐसे पदाधिकारी थे, जो कार्यकर्ताओं से कटे हुए थे, फर्जी सदस्यता के आंकड़ों का सहारा लेते थे और स्थानीय स्तर पर अपना वर्चस्व बनाए हुए थे। कुछ नेता नए लोगों को आगे बढ़ने का मौका भी नहीं देना चाहते थे। स्टालिन ने इसे बदलने के लिए कुछ पदों पर उम्र और कार्यकाल की सीमा तय करने, सदस्यता अभियान को पारदर्शी बनाने, सांगठनिक चुनाव कराने और नए चेहरों को ज्यादा अवसर देने का प्रस्ताव रखा। 75 साल पुराने राजनीतिक आंदोलन के लिए ये बदलाव न सिर्फ बड़े हैं, बल्कि साहसिक भी हैं।

क्या डीएमके समस्या की वजह गलत समझ रही है?

लेकिन क्या समस्या सिर्फ पार्टी संगठन तक ही सीमित है? स्टालिन के सुझाए उपायों को देखकर ऐसा लगता है कि डीएमके इस अस्तित्व के संकट को केवल एक सांगठनिक खराबी मानकर ठीक करने की कोशिश कर रही है। उनका मानना है कि जिला सचिवों को बदलने, सदस्यता की जांच करने और युवाओं को बढ़ावा देने से, यानी सीधे शब्दों में कहें तो चुनावी मशीनरी की सर्विसिंग करने से सब ठीक हो जाएगा।

हालांकि ये सभी बातें सही हो सकती हैं, लेकिन तमिलगा वेट्री कषगम (टीवीके) ने डीएमके को इसलिए नहीं हराया कि उसके पास बेहतर जिला सचिव थे। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय एक बिल्कुल अलग राजनीतिक ढांचे के जरिए सत्ता में आए- उनका स्टारडम, डिजिटल कल्चर, पहली बार राजनीति में आए युवा कार्यकर्ता, मौजूदा व्यवस्था से लोगों की ऊब और बिना किसी लंबे राजनीतिक अनुभव वाले नेताओं को राज्य सौंपने की जनता की इच्छा इस जीत की वजह थी।

इस चुनाव में मतदाताओं ने राजनीतिक वैधता को लेकर पुरानी सोच को चुनौती दी है। इस पर डीएमके प्रमुख ने कहा, “देखिए किस तरह के लोग अब सत्ता में आए हैं। वे जनता के लिए काम किए बिना, कोई संघर्ष किए बिना, बिना किसी विचारधारा और बिना किसी मजबूत सांगठनिक ढांचे के सत्ता में आ गए हैं।”

संक्षेप में, स्टालिन अपने सहयोगियों को यह याद दिलाने की कोशिश कर रहे थे कि उनकी पार्टी के पास एक ऐसी चीज़ है जो टीवीके के पास नहीं है— वह है इतिहास।

हालांकि, जैसा कि पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, यह एक अधिक गंभीर सवाल खड़ा करता है। नेता ने पूछा, “यदि पर्याप्त संघर्ष, विचारधारा या संगठन के बिना आए लोगों ने इन तीनों चीज़ों से लैस पार्टी को हरा दिया, तो आखिर मतदाताओं ने चुना क्या? यह कहना कि टीवीके के पास सत्ता में आने की पारंपरिक योग्यताएं नहीं थीं, हमारी अपनी राजनीतिक समझ के हिसाब से सही हो सकता है। लेकिन मतदाता स्पष्ट रूप से किसी दूसरी परिभाषा का इस्तेमाल कर रहे थे।”

उस वरिष्ठ नेता के अनुसार, यही वजह है कि पार्टी विशेषकर कोलाथुर में स्टालिन की हार और पूरे चुनाव परिणाम को पचा नहीं पा रही है।

द्रविड़ राजनीति के एक अनुभवी विश्लेषक ने कहा, “डीएमके के लिए विजय केवल एक प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं। उनकी जीत राजनीति को लेकर डीएमके की सबसे बुनियादी धारणा को चुनौती देती है कि सत्ता विचारधारा, संगठन और सालों के राजनीतिक काम से ही हासिल की जानी चाहिए। विजय ने उस तरीके से राजनीति किए बिना जीत हासिल की जिस तरीके को डीएमके सही मानती है।”

विश्लेषक ने कहा कि जिस पार्टी के बारे में डीएमके का मानना है कि उसे ढंग से पार्टी चलाना भी नहीं आता, उससे तमिलनाडु हारने के बाद डीएमके का तत्काल समाधान ‘एक बेहतर डीएमके’ बनना है। उन्होंने कहा कि यह कुछ वैसा ही है जैसे यह पता चलने पर कि पूरे मोहल्ले ने अखबार की जगह स्मार्टफोन का इस्तेमाल शुरू कर दिया है, आप अपने अखबार के वितरण नेटवर्क को सुधारने में लग जाएं।

स्टालिन की तारीफ क्यों होनी चाहिए?

कुछ लोगों का मानना है कि चुनाव में करारी हार के बाद जिस तरह स्टालिन ने शांत और संयमित तरीके से आत्ममंथन किया, उसके लिए उनकी सराहना होनी चाहिए। डीएमके अध्यक्ष ने यह माना कि जो पार्टी कभी भाषा, सिनेमा, सड़क की राजनीति, तर्क और सामाजिक न्याय के जरिए पुरानी राजनीतिक व्यवस्था को चुनौती देती थी, वह आज खुद एक पारंपरिक संस्था बन गई है। और अब उसे एक नई राजनीतिक ताकत की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।

विश्लेषक ने कहा, “संस्थाएं भी व्यक्तियों की तरह अपनी जानी-पहचानी दुनिया के जाल में फंस सकती हैं। जो चीजें जानी-पहचानी होती हैं, वे एक विकल्प के रूप में दिखना बंद हो जाती हैं।”

फिर भी, स्टालिन की यह बात सही है कि मजबूत संगठन हार से उबर आते हैं। डीएमके ने बार-बार ऐसा किया है और टीवीके का मुकाबला करते समय उसके अनुभव उसकी सबसे बड़ी ताकत बन सकते हैं।

स्टालिन ने कार्यकर्ताओं से अपने घरों से प्रचार शुरू करने को कहा। उन्होंने कहा कि बाहर जाने से पहले अपने बच्चों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों के वोट सुरक्षित करें। यह एक व्यावहारिक सलाह थी, लेकिन अनजाने में इसने समस्या की गहराई को भी उजागर कर दिया। विश्लेषक ने कहा, “एक कैडर अपने परिवार के साथ खाने की मेज पर बैठा हो सकता है। जीवनभर डीएमके समर्थक रहे परिवार का बच्चा पेरियार का सम्मान कर सकता है, सामाजिक न्याय को मान सकता है, द्रविड़ आंदोलन की भाषा बोल सकता है और फिर भी विजय को वोट दे सकता है… उस मतदाता को केवल एक बेहतर सदस्यता रजिस्टर या नए जिला सचिव के दम पर वापस नहीं लाया जा सकता।”

डीएमके के करीब आधा दर्जन पुराने नेताओं, पूर्व मंत्रियों और टीवीके में शामिल हो चुके एक नेता ने एक ही सवाल उठाया। उनके मुताबिक, डीएमके के सामने चुनौती सिर्फ संगठन में बदलाव करने की नहीं है। उसे यह भी समझना होगा कि द्रविड़ आंदोलन की विचारधारा और उसकी विरासत से प्रभावित लोग अब उसी पार्टी से क्यों दूर हो रहे हैं, जिसे इस विरासत का सबसे बड़ा राजनीतिक वारिस माना जाता है। आखिर वे क्यों मानने लगे हैं कि डीएमके अब उनके वोट की हकदार नहीं रही?

एक पूर्व मंत्री ने कहा, “स्टालिन ने पहला कदम उठा लिया है। उनका भाषण साबित करता है कि डीएमके जानती है कि उसे बदलना होगा।”

जैसा कि स्टालिन ने कहा, एक दीपक अपने नीचे के अंधेरे को देखे बिना पूरे शहर को रोशन कर सकता है। लेकिन इस चुनाव के बाद डीएमके को एक और सवाल पर विचार करना होगा—कहीं ऐसा तो नहीं कि जिस शहर को वह रोशन करने का दावा कर रही है, उसकी जरूरतें, सोच और पूरा का पूरा शहर ही अब बदल चुका है?

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तमिलनाडु विधानसभा में विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन ने टीवीके के नेतृत्व वाली राज्य सरकार पर तीखा हमला बोला है। पट्टुकोट्टई में एक शादी समारोह के दौरान रविवार को उन्होंने आरोप लगाया कि विजय सरकार तमिलनाडु के विकास को पीछे ले जा रही है। पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें।