कर्नाटक की राजनीति में डीके शिवकुमार का नाम एक ऐसे रणनीतिकार के रूप में लिया जाता है, जो मुश्किल राजनीतिक परिस्थितियों में भी रास्ता निकाल लेने की क्षमता रखते हैं। लेकिन उनकी कहानी सिर्फ सत्ता के शिखर तक पहुंचने की नहीं है। यह उस राजनीति की कहानी भी है जो मंचों की रोशनी से दूर, बैठकों, संवादों, संगठन और रणनीति के सहारे आकार लेती है।

कनकपुरा से शुरू हुई यह यात्रा आज मुख्यमंत्री पद तक पहुंच चुकी है, लेकिन इस सफर के कई ऐसे किस्से हैं जो भाषणों से अधिक राजनीतिक गलियारों में सुनाई देते हैं। यह उस नेता की कहानी है जिसने राजनीति को केवल पढ़ा नहीं, बल्कि उसे संघर्ष, संगठन और अनुभव की भट्ठी में तपकर समझा है।

भीड़ में भी याद रहते थे नाम, लोगों को जोड़ने की कला बनी ताकत

डीके शिवकुमार के बारे में एक पुराना किस्सा कनकपुरा और बेंगलुरु के कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच अक्सर सुनाई देता है। कहा जाता है कि कॉलेज के दिनों में ही उन्होंने लोगों को जोड़ने और मजबूत नेटवर्क तैयार करने की कला सीख ली थी। वे केवल छात्र राजनीति तक सीमित नहीं थे, बल्कि अलग-अलग समूहों और विचारों वाले लोगों को एक मंच पर लाने की क्षमता भी रखते थे। उनके पुराने साथी बताते हैं कि वे छोटे-छोटे कार्यक्रमों में भी लोगों के नाम और उनसे जुड़ी बातें याद रखते थे। लोगों की समस्याएं सुनना, उनसे संवाद बनाए रखना और उन्हें संगठन से जोड़े रखना धीरे-धीरे उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गया। यही क्षमता आगे चलकर कांग्रेस संगठन में उनकी पहचान का आधार बनी।

कांग्रेस के कई पुराने नेताओं का कहना है कि चुनावी राजनीति में उनकी तैयारी काफी व्यवस्थित मानी जाती है। स्थानीय समीकरणों, प्रभावशाली परिवारों, प्रमुख मतदाता समूहों और क्षेत्रीय मुद्दों पर उनकी पकड़ को लेकर अक्सर चर्चा होती रही है। पार्टी के भीतर कई लोग उन्हें ऐसे नेता के रूप में देखते हैं जो संगठन और चुनावी रणनीति पर बारीकी से नजर रखते हैं। यही वजह है कि राजनीतिक हलकों में उन्हें एक कुशल रणनीतिकार के रूप में भी देखा जाता है।

गुजरात राज्यसभा चुनाव: एक रिसॉर्ट, 44 विधायक और सियासी सस्पेंस

डीके शिवकुमार के राजनीतिक जीवन का एक और बड़ा चर्चित किस्सा है। बात अगस्त 2017 की है, जब गुजरात राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक घमासान अपने चरम पर था। कांग्रेस नेता अहमद पटेल की उम्मीदवारी दांव पर थी और पार्टी के भीतर बगावत की खबरों ने चिंता बढ़ा दी थी। ऐसे में कांग्रेस के कई विधायकों को गुजरात से बाहर ले जाकर कर्नाटक के बेंगलुरु स्थित ईगलटन रिसॉर्ट में ठहराया गया। इस पूरी कवायद की जिम्मेदारी डीके शिवकुमार को सौंपी गई थी।

राजनीतिक गलियारों में आज भी उस दौर की चर्चा होती है। कहा जाता है कि शिवकुमार ने विधायकों को एकजुट बनाए रखने और पूरे अभियान के समन्वय में अहम भूमिका निभाई। रिसॉर्ट के बाहर राजनीतिक बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहा, लेकिन भीतर कांग्रेस अपने विधायकों को साथ रखने की कोशिश में जुटी रही।

वोटिंग के दिन मामला और रोमांचक हो गया। मतगणना के दौरान कांग्रेस ने अपने दो बागी विधायकों के वोटों पर आपत्ति जताई। लंबी बहस और विचार-विमर्श के बाद चुनाव आयोग ने उन वोटों को अमान्य घोषित कर दिया। देर रात आए नतीजों में अहमद पटेल बेहद कम अंतर से चुनाव जीतने में सफल रहे।

इस पूरे घटनाक्रम ने डीके शिवकुमार को राष्ट्रीय राजनीति में नई पहचान दिलाई। इसके बाद उन्हें कांग्रेस के उन नेताओं में गिना जाने लगा, जिन्हें कठिन राजनीतिक परिस्थितियों में संगठन की जिम्मेदारी संभालने के लिए याद किया जाता है।

साल 2019 में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई और गिरफ्तारी के बाद डीके शिवकुमार एक बार फिर सुर्खियों में आ गए। उस समय कर्नाटक की राजनीति में इसे एक बड़े घटनाक्रम के रूप में देखा गया। उनके करीबी नेताओं और समर्थकों का कहना है कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने सार्वजनिक रूप से संयम बनाए रखा। राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि यह दौर उनके राजनीतिक जीवन की सबसे चुनौतीपूर्ण परीक्षाओं में से एक था। उनके समर्थक इसे संघर्ष और धैर्य के दौर के रूप में याद करते हैं, जिसने उनकी राजनीतिक छवि को और मजबूत किया।

सिद्धारमैया बनाम शिवकुमार: टकराव के बीच ‘मौन समझौता’ ने बनाया खास

कर्नाटक कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच प्रतिस्पर्धा और राजनीतिक मतभेदों की चर्चा समय-समय पर होती रही है। हालांकि, यह भी उल्लेखनीय है कि दोनों नेताओं के बीच सार्वजनिक स्तर पर टकराव के अवसर अपेक्षाकृत कम देखने को मिले। पार्टी के भीतर यह धारणा रही है कि शिवकुमार संगठनात्मक और राजनीतिक मुद्दों पर अपनी बात रखने के साथ-साथ परिस्थितियों को धैर्यपूर्वक समझने पर भी जोर देते हैं। यही शैली उन्हें पार्टी के भीतर एक महत्वपूर्ण नेता के रूप में स्थापित करती रही है।

कनकपुरा क्षेत्र में उनकी राजनीतिक पकड़ को लेकर कई स्थानीय किस्से प्रचलित हैं। क्षेत्र के कार्यकर्ताओं का कहना है कि चुनावी समय में वे केवल बड़े नेताओं या प्रमुख चेहरों पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करने पर ध्यान देते हैं। स्थानीय सामाजिक समीकरणों, मतदाताओं की प्राथमिकताओं और क्षेत्रीय मुद्दों पर उनकी पकड़ की चर्चा अक्सर होती है। राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत बनाए रखने की यही शैली उनकी चुनावी सफलता के प्रमुख कारणों में से एक रही है।

‘किस्सा मुख्यमंत्री का’ सीरीज की अन्य कड़ियां पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

राजनीतिक हलकों में डीके शिवकुमार को लंबे समय से कांग्रेस के प्रभावशाली संगठनकर्ताओं में गिना जाता रहा है। पार्टी के भीतर संगठनात्मक समन्वय, चुनावी तैयारियों और कार्यकर्ताओं के नेटवर्क पर उनकी मजबूत पकड़ की चर्चा अक्सर होती है। कांग्रेस के कई नेताओं का मानना है कि संगठन को सक्रिय बनाए रखने और विभिन्न स्तरों पर संवाद कायम रखने की उनकी क्षमता ने उन्हें पार्टी के भीतर एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया है।

उनसे जुड़ा एक और दिलचस्प किस्सा कार्यकर्ताओं के बीच अक्सर सुनने को मिलता है। कर्नाटक कांग्रेस के एक पुराने कार्यकर्ता के अनुसार, एक बार भीड़भरे कार्यक्रम में शिवकुमार ने उसे नाम लेकर संबोधित किया। यह घटना भले ही छोटी थी, लेकिन उस कार्यकर्ता के लिए यादगार बन गई। उनके सहयोगियों का कहना है कि लोगों को याद रखने और उनसे व्यक्तिगत स्तर पर जुड़ाव बनाए रखने की यह शैली उन्हें कई अन्य नेताओं से अलग पहचान देती है।

डीके शिवकुमार की राजनीतिक यात्रा को देखने वाले अक्सर कहते हैं कि उनकी सबसे बड़ी ताकत संगठन को मजबूत बनाए रखने की क्षमता रही है। सरकार में हों या पार्टी संगठन में, उनकी भूमिका अक्सर एक ऐसे नेता की रही है जो कार्यकर्ताओं, नेताओं और राजनीतिक समीकरणों के बीच समन्वय स्थापित करने में सक्षम माना जाता है।

कॉलेज के दिनों की छात्र राजनीति से लेकर कर्नाटक की सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने का उनका सफर कई उतार-चढ़ावों, चुनौतियों और राजनीतिक घटनाक्रमों से होकर गुजरा है। संगठन निर्माण, चुनावी रणनीति और कठिन राजनीतिक परिस्थितियों में सक्रिय भूमिका ने उनकी पहचान को अलग आयाम दिया है। यही वजह है कि कर्नाटक की राजनीति में उनका नाम समय-समय पर नए राजनीतिक समीकरणों के केंद्र में दिखाई देता रहा है।

यह भी पढ़ें: कर्नाटक में आज से ‘डीके राज’, दो से तीन उपमुख्यमंत्री भी बना सकती है कांग्रेस

कर्नाटक की राजनीति में डी.के. शिवकुमार का दौर शुरू होने जा रहा है। वह जल्द ही मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले हैं। बताया जा रहा है कि डी.के. शिवकुमार के साथ 10 मंत्री भी शपथ ले सकते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सामाजिक समीकरण साधने के लिए कांग्रेस दो उपमुख्यमंत्री भी बना सकती है। इस पद के लिए जी. परमेश्वर जैसे नेताओं का नाम सबसे आगे चल रहा है। बताया जा रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ इस मुद्दे पर अहम बैठक हुई है। इस बैठक में डी.के. शिवकुमार के अलावा पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया भी मौजूद थे। वहीं, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने भी बैठक में हिस्सा लिया। बैठक में कैबिनेट विस्तार से लेकर कई अन्य राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा की गई। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक