Devdutt Pattanaik Arts & Culture: (द इंडियन एक्सप्रेस ने UPSC उम्मीदवारों के लिए इतिहास, राजनीति, अंतर्राष्ट्रीय संबंध, कला, संस्कृति और विरासत, पर्यावरण, भूगोल, विज्ञान और टेक्नोलॉजी आदि जैसे मुद्दों और कॉन्सेप्ट्स पर अनुभवी लेखकों और स्कॉलर्स द्वारा लिखे गए लेखों की एक नई सीरीज शुरू की है। सब्जेक्ट एक्सपर्ट्स के साथ पढ़ें और विचार करें और बहुप्रतीक्षित UPSC CSE को पास करने के अपने चांस को बढ़ाएं। पौराणिक कथाओं और संस्कृति में विशेषज्ञता रखने वाले प्रसिद्ध लेखक देवदत्त पटनायक ने अपने इस लेख में बताया कि हिंदी को मुग़ल भाषा के रूप में क्यों नहीं समझा जाना चाहिए।)

हिंदी को अक्सर एक ऐसी भाषा के रूप में बताया जाता है जिसका जन्म मुगल छावनियों में हुआ था। मानो यह केवल शाही शिविरों की ही बोली रही हो। यह सुनने में तो आकर्षक लगता है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से यह बात अधूरी है। हिंदी की कहानी इससे कहीं अधिक पुरानी, ​​कहीं अधिक व्यापक और कहीं अधिक बहुआयामी है। यह समझने के लिए कि हिंदी का विकास कैसे हुआ, विद्यार्थियों को न केवल मुगल-कालीन दुनिया पर, बल्कि उत्तरी भारत की प्राचीन इंडो-आर्यन जड़ों और दक्कन क्षेत्र द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका पर भी दृष्टि डालनी होगी।

हिंदी की नींव मुगलों के भारत आने से बहुत पहले ही पड़ चुकी थी। इसका व्याकरण और मूल ढांचा संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और फिर उत्तरी भारत की शुरुआती स्थानीय बोलियों की प्राचीन भाषाई परंपरा से विकसित हुआ है। गंगा-यमुना दोआब, विशेष रूप से दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आस-पास बोली जाने वाली भाषा के रूप धीरे-धीरे विकसित होकर वह रूप बन गए जिसे विद्वान ‘खड़ी बोली’ और ‘हिंदवी’ कहते हैं। ये बोलियां मुगल साम्राज्य की स्थापना से कई सदियों पहले से ही अस्तित्व में थीं।

हिंदी का व्याकरण मजबूती से इंडो-आर्यन क्यों बना रहा?

दिल्ली सल्तनत और मुगल काल ने जो किया, वह था पूरे उत्तरी भारत में एक साझा बोलचाल की भाषा के प्रसार को तेज करना। फारसी बोलने वाले शासकों, तुर्की और अफगान सैनिकों, भारतीय सैनिकों, व्यापारियों और सूफी गुरुओं सभी को एक आम भाषा की जरूरत थी। बाजारों, छावनियों और कस्बों में, उत्तरी भारत की स्थानीय बोलियां फारसी और अरबी शब्दों के साथ घुल-मिल गईं। इससे ‘हिंदुस्तानी’ का जन्म हुआ—एक लचीली संपर्क भाषा, जिसका इस्तेमाल रोजमर्रा की जिंदगी में किया जाता था।

लेकिन शब्दावली और व्याकरण एक जैसी चीजें नहीं हैं। हिंदी का व्याकरण पूरी तरह से इंडो-आर्यन ही बना हुआ है। इसकी वाक्य-रचना, सर्वनाम, लिंग-संबंधी नियम और क्रिया के रूप ये सभी पुरानी भारतीय परंपराओं से ही आए हैं। उदाहरण के लिए, राम ने खाना खाया। सीता घर गई। यहां, भूतकाल में ‘ने’ का प्रयोग और ‘गई’ शब्द में लिंग के अनुसार हुआ बदलाव ये सभी इंडो-आर्यन व्याकरण के स्पष्ट संकेत हैं। यह व्याकरणिक ढांचा संस्कृत-प्राकृत परंपरा से आया है, न कि फारसी, अरबी या तुर्की भाषाओं से।

यह एक महत्वपूर्ण बात है, क्योंकि भाषाएं अक्सर दूसरी भाषाओं से शब्द तो आसानी से अपना लेती हैं, लेकिन वे अपना व्याकरण इतनी आसानी से नहीं बदलतीं।

दक्कन का योगदान

अब हम दक्कन की बात करते हैं, जिसकी भूमिका को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। जब दिल्ली सल्तनत और बाद में बहमनी और दक्कन सल्तनतों के शासनकाल में राजनीतिक सत्ता दक्षिण की ओर बढ़ी, तो यह उत्तरी हिंदवी बोली सैनिकों, व्यापारियों, कवियों और सूफी संतों के साथ दक्कन के पठार तक जा पहुंची। वहां इसका सामना मराठी, तेलुगु, कन्नड़ और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं से हुआ। इस मेल-जोल से ‘दखनी’ या ‘दक्कनी’ का जन्म हुआ, जो हिंदुस्तानी का एक शुरुआती और जीवंत रूप था।

विडंबना यह है कि उत्तर भारत में हिंदुस्तानी के एक प्रमुख साहित्यिक भाषा बनने से पहले ही, दक्कन में यह पूरी तरह से फल-फूल चुकी थी। बीजापुर और गोलकोंडा के दरबारों में दखनी भाषा में लिखी गई कविताओं, प्रेम-साहित्य और सूफी रचनाओं को विशेष संरक्षण प्राप्त था। कई मायनों में, दक्कन ने ही हिंदुस्तानी को उसकी पहली बड़ी साहित्यिक पहचान प्रदान की। यहीं पर दक्कन का योगदान ऐतिहासिक रूप से निर्णायक सिद्ध होता है।

दक्कन का असर उच्चारण, शैली और शब्दावली पर पड़ा। आज भी हैदराबादी बोली में जो शब्द और मुहावरे सुनने को मिलते हैं, वे इसी याद को संजोए हुए हैं। फिर भी, यहां भी व्याकरण का ढांचा इंडो-आर्यन ही बना रहा। दक्कन ने भाषा को समृद्ध तो किया, लेकिन उसकी मूल संरचना को बदला नहीं।

हिंदी का व्याकरण उसके उद्गम की कहानी कहता है

यही बात पूर्वी भारत की भाषाओं के बारे में भी कही जा सकती है। बंगाली, असमिया और ओडिया भाषाएं इंडो-आर्यन परिवार से ही हैं, फिर भी उनकी व्याकरणिक प्रवृत्तियां काफी अलग हैं। उदाहरण के लिए, बंगाली में व्याकरणिक लिंग का निर्धारण उस तरह से नहीं होता, जिस तरह हिंदी में होता है।

हिंदी में क्रियाओं और विशेषणों में पुल्लिंग और स्त्रीलिंग रूपों के बीच आज भी अंतर किया जाता है। इससे यह पता चलता है कि मानक हिंदी ने पूर्वी व्याकरणिक ढांचों को किसी बड़े पैमाने पर नहीं अपनाया।

इसलिए, छात्रों को यह अंतर याद रखना चाहिए, हिंदी के शब्द संपर्कों की कहानी कहते हैं। हिंदी का व्याकरण उसके उद्गम की कहानी कहता है। इसके शब्द फारसी दरबारों, मुगल सेनाओं, दक्कन के बाजारों और बहुभाषी शहरी जीवन की झलक दिखाते हैं। लेकिन इसका व्याकरण आज भी पुरानी उत्तर भारतीय भाषाई परंपरा की ओर ही संकेत करता है। हिंदी को सबसे अच्छी तरह एक इंडो-आर्यन भाषा के रूप में समझा जा सकता है।

आधुनिक मानक हिंदी बहुत बाद में, उन्नीसवीं सदी में, ब्रिटिश शासन और राष्ट्रवाद के उदय के दौरान सामने आई। यह व्यापक हिंदुस्तानी भाषा का एक अधिक संस्कृतनिष्ठ रूप था, जिसे देवनागरी लिपि में लिखा जाता था और जो उर्दू से अलग थी, उर्दू में फारसी शब्दावली और फारसी-अरबी लिपि का प्रभाव अधिक बना रहा।

इसलिए, हिंदी का विकास किसी एक साम्राज्य या किसी एक क्षेत्र की कहानी नहीं है। यह एक प्राचीन उत्तर भारतीय भाषा की कहानी है जिसने दरबारों, छावनियों और बाजारों से होते हुए यात्रा की, दक्कन में इसे और परिष्कृत किया गया, संपर्कों से यह और समृद्ध हुई, फिर भी इसने अपनी मूल व्याकरणिक संरचना को बनाए रखा।

यही कारण है कि हिंदी को किसी मुग़ल भाषा के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी इंडो-आर्यन भाषा के रूप में समझना सबसे उचित है, जिसे पूरे उपमहाद्वीप में सदियों से चले आ रहे सांस्कृतिक आदान-प्रदान ने आकार दिया है।