Devdutt Pattanaik on Arts & Culture: (द इंडियन एक्सप्रेस ने UPSC उम्मीदवारों के लिए इतिहास, राजनीति, अंतर्राष्ट्रीय संबंध, कला, संस्कृति और विरासत, पर्यावरण, भूगोल, विज्ञान और टेक्नोलॉजी आदि जैसे मुद्दों और कॉन्सेप्ट्स पर अनुभवी लेखकों और स्कॉलर्स द्वारा लिखे गए लेखों की एक नई सीरीज शुरू की है। सब्जेक्ट एक्सपर्ट्स के साथ पढ़ें और विचार करें और बहुप्रतीक्षित UPSC CSE को पास करने के अपने चांस को बढ़ाएं। पौराणिक कथाओं और संस्कृति में विशेषज्ञता रखने वाले प्रसिद्ध लेखक देवदत्त पटनायक ने अपने इस लेख में बताया कि रूपक यानी मेटाफर को लेकर विस्तार से बात की है)

रूपक एक ऐसा शब्द या वाक्यांश है जिसका प्रयोग कल्पनात्मक तरीके से यह दर्शाने के लिए किया जाता है कि एक वस्तु में दूसरी वस्तु के समान गुण हैं। हम ठंडे मौसम का जिक्र कर सकते हैं लेकिन हमारा मतलब ‘अकेलापन’ हो सकता है, या गर्म मौसम का जिक्र कर सकते हैं लेकिन हमारा मतलब ‘प्रेम’ हो सकता है। एक चीज़ का प्रयोग किसी दूसरी चीज़ को व्यक्त करने के लिए किया जाता है। अक्सर प्रकृति का प्रयोग किसी मनोवैज्ञानिक भावना को जगाने के लिए किया जाता है। प्रकृति दृश्यमान है, लेकिन मन नहीं; इसलिए प्रकृति एक प्रतीक, एक रूपक बन जाती है, जो मन की अवस्था को समझाने का काम करती है।

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प्रारंभिक भारतीय रूपक तीन अत्यंत भिन्न सांस्कृतिक क्षेत्रों से उत्पन्न हुए: वैदिक उत्तर-पश्चिम, तमिल दक्षिण और प्राकृत भाषी दक्कन। प्रत्येक क्षेत्र की अपनी जलवायु, वनस्पति, जीव-जंतु, बस्ती का स्वरूप और ऐतिहासिक लय थी। इसी भौगोलिक विविधता ने कवियों की विश्व-कल्पना की शैली और अनुभव एवं अर्थ के बीच एक सेतु के रूप में प्रकृति के उपयोग को आकार दिया।

वैदिक जगत के रूपक

वैदिक जगत का विकास लगभग 1500 से 800 ईसा पूर्व के बीच, अफगानिस्तान से हरियाणा तक फैले मैदानी इलाकों में, सरस्वती नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारे हुआ। यह विशाल घास के मैदानों, तेज बहने वाली नदियों, कठोर सर्दियों, चिलचिलाती गर्मियों और क्षितिज पर छाए विशाल आकाश की भूमि थी।

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यहां समुदाय मवेशियों के साथ यात्रा करते थे, रात में अग्नि अनुष्ठान (यज्ञ) करते थे और ऋतुओं के बदलाव के लिए तारों के उदय और अस्त होने का अवलोकन करते थे। यहां प्रकृति सौम्य नहीं थी, वह विशाल, अप्रत्याशित और दिव्य थी। उनकी कविता के रूपक इसी भव्यता को दर्शाते हैं। सरस्वती नदी की प्रशंसा एक शक्तिशाली मां के रूप में की जाती है जो बर्फ से पिघलते जलप्रपात की तरह शोर मचाती हुई बहती है। भोर (उषा) एक युवती के समान है जो अंधकार को हटाती है और दिन का द्वार खोलती है, जो खुले मैदानों पर सुबह की मनमोहक चमक को प्रतिबिंबित करती है।

आसमान में छाए तूफान को एक ‘दहाड़ते हुए बैल’ के रूप में देखा गया है, क्योंकि इस क्षेत्र में बादलों की गर्जना पहाड़ियों के बीच गूंजती थी। यहाँ भूगोल ने विस्मय (awe) को जन्म दिया। मनुष्य स्वयं को छोटा समझते थे, इसलिए उनके रूपक प्रकृति को देवताओं और ब्रह्मांडीय शक्तियों में परिवर्तित करते हुए एक विशाल पैमाने पर विस्तारित होते गए।

संगम साहित्य: जब भावनाएं परिदृश्य में पिरोई गईं

सुदूर दक्षिण में संगम कवि 300 ईसा पूर्व और 300 ईस्वी के बीच तमिलनाडु के क्षेत्र में सक्रिय थे। यह छोटी नदियों, मानसूनी बारिश, लंबी तटरेखाओं, पथरीली पहाड़ियों और उपजाऊ धान के खेतों वाला क्षेत्र था। यह एक स्थापित कृषि प्रधान समाज था जहाँ कुल की पहचान, पशुधन और समुद्री व्यापार का महत्व था।

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यहां कवियों ने भूमि को पांच पारिस्थितिक क्षेत्रों में विभाजित किया: कुरिंजी (पहाड़), मुल्लाई (वन), मरुथम (कृषि भूमि), नेथल (समुद्र तट) और पालाई (मरुस्थल)। प्रत्येक क्षेत्र ने अपना एक अलग भावनात्मक वातावरण उत्पन्न किया। यह इसलिए संभव था क्योंकि तमिलनाडु का परिदृश्य कम दूरी में ही तेजी से बदल जाता था।

इन बदलावों ने रूपकों को जन्म दिया। ‘मुल्लाई’ कविताओं में जब नायिका अपने प्रियतम की प्रतीक्षा करती है, तो वह शाम ढलते समय मवेशियों को घर लौटते हुए देखती है। ‘कुरिंजी’ पहाड़ियों में प्रेमी फूलों से भरी झाड़ियों के पीछे छिपकर मिलते हैं, क्योंकि पश्चिमी घाट वास्तव में ऐसी झाड़ियों से ढका हुआ है। ‘नेथल’ की कविताओं में बेचैन लहरें नायिका की तड़प को दर्शाती हैं। धान के खेतों में हाथियों का प्रवेश भावनात्मक उथल-पुथल का प्रतीक है। यहाँ भूगोल भावनाओं को क्षेत्रों में विभाजित करता है, और भावनाएँ उन क्षेत्रों को कविता में पिरो देती हैं।

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दक्कन: शहरी संवेदनशीलता के रूपक

इन दोनों के बीच ‘गाथा सप्तसती’ की दुनिया है (लगभग 100 से 300 ईस्वी), जिसका संबंध दक्कन के सातवाहन दरबारों से है। यह क्षेत्र व्यापारिक कस्बों, बौद्ध और जैन मठों और कारवां मार्गों से भरा हुआ था। गोदावरी और कृष्णा जैसी नदियों ने यहां आम के बागों और कमल के तालाबों वाली घाटियों को आकार दिया था। यहाँ प्रकृति ‘संवारी हुई’ और ‘आत्मीय’ थी।

यहां के रूपक शहरी संवेदनशीलता को दर्शाते हैं। महल के बगीचों में यह माना जाता था कि अशोक का पेड़ स्त्री के पैर के स्पर्श से खिल उठता है। बंद आंगनों में आम के फूलों की सुगंध कामुकता और इच्छा का संकेत देती है। पालतू तोता नायिका के शब्दों को दोहराता है। यहां मानसून भी एक ‘संदेशवाहक’ बन जाता है, न कि कोई डरावनी ब्रह्मांडीय शक्ति, क्योंकि बसे-बसाए शहरों के लिए बारिश का मतलब तालाबों और कुओं का भरना था। यहाँ प्रकृति डरावनी नहीं, बल्कि निजी रोमांचों में एक ‘सहयोगी’ की तरह है। भारत का सौंदर्य सिद्धांत, रस, कलाओं में भावनाओं के विभिन्न रूपों की व्याख्या कैसे करता है?