दिल्ली-एनसीआर में अगर आप रहते हैं और मेट्रो की रेड लाइन पर कभी आपने सफर किया हो तो पुल बंगश मेट्रो स्टेशन जरूर देखा होगा। पुल बंगश मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलकर इस इलाके को देखेंगे, तो आपको कोई पुल नहीं दिखाई देगा। चारों तरफ दुकानें, गाड़ियां, संकरी गलियां और घनी आबादी है। ऐसे में अब सभी के मन में एक ही सवाल आता है कि आखिर इस इलाके को पुल बंगश क्यों कहा जाता है। दिल्ली की कहानी सीरीज में हम इसके नाम के पीछे की दिलचस्प कहानी के बारे में जानेंगे।
बंगश पूर्वी अफगानिस्तान में काफी प्रसिद्ध जनजाति है और मुहम्मद खान बंगश इसी जनजाति के एक बेहद प्रभावशाली योद्धा थे। वे उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद के पहले नवाब भी बने। मुगल बादशाह फर्रुखसियर और मुहम्मद शाह रंगीला के दौर में नवाब मुहम्मद खान बंगश का मुगल दरबार और शाहजहानाबाद (पुरानी दिल्ली) में काफी प्रभाव था। उनकी गिनती मुगल सेना के प्रमुख बावन हजारी सरदारों में होती थी।
शाहजहां के शासनकाल में उनके मशहूर वास्तुकार अली मर्दन खान ने पुरानी दिल्ली शहर में पानी की आपूर्ति के लिए नहरों का एक खूबसूरत नेटवर्क बिछाया था। इसे ‘नहर-ए-बहिश्त’ (जन्नत की नहर) की एक शाखा या ‘अली मर्दन नहर’ कहा जाता था। 18वीं सदी में जब नवाब बंगश का परिवार दिल्ली के इस इलाके में बसा, तो उनकी पत्नी राविया बेगम ने इस नहर को पार करने के लिए एक पत्थर के पुल का निर्माण करवाया।
बंगश परिवार ने करवाया पुल का निर्माण
इस पुल का निर्माण बंगश परिवार की ओर से करवाया गया था। इसी वजह से इसको लोग पुल बंगश कहकर पुकारने लगे। उस दौर में बंगश परिवार का प्रभाव केवल इस पुल तक सीमित नहीं था। पुरानी दिल्ली में उनके नाम से कई अन्य ऐतिहासिक पहचानें भी बनीं। इसमें कमरा बंगश और सराय बंगश का नाम भी शामिल है। हालांकि मुगल शासन के पतन के साथ ही ये नहर सूख गई। लेकिन इस इलाके का नाम आज भी नहीं बदला।
अब कितना बदल गया पुल बंगश?
आज पुल बंगश पुरानी दिल्ली का एक बहुत व्यस्त इलाका है। यह सब्जी मंडी, आजाद मार्केट और रोशनआरा रोड के पास मौजूद है। यहां हर दिन बड़ी संख्या में लोग आते-जाते हैं और कारोबार होता है। जब दिल्ली मेट्रो ने रेड लाइन पर यहां स्टेशन बनाया, तो इस जगह के पुराने इतिहास को याद रखने के लिए उसका नाम पुल बंगश रखा गया।
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दिल्ली की पहचान सिर्फ लाल किला, इंडिया गेट या चांदनी चौक तक सीमित नहीं है। इस शहर की गलियों में कई ऐसे इलाके भी हैं, जिनका इतिहास समय के साथ धुंधला पड़ गया, लेकिन उनकी कहानी आज भी उतनी ही दिलचस्प है। पश्चिमी दिल्ली में स्थित आनंद पर्वत भी ऐसा ही एक इलाका है, जिसकी पहचान केवल एक रिहायशी और औद्योगिक क्षेत्र भर नहीं, बल्कि विभाजन, पुनर्वास और दिल्ली के विस्तार की कहानी से भी जुड़ी हुई है। आखिर इस इलाके का नाम ‘आनंद पर्वत’ कैसे पड़ा, इसका इतिहास क्या है और समय के साथ यह कैसे बदलता गया? आइए जानते हैं आनंद पर्वत की अनकही दास्तान। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर…
