15 साल का बब्लू जो पढ़ाई में औसत है लेकिन कॉन्फिडेंस से लबरेज़। वो अपने पापा की तरह कपड़े पहनता है, फर्राटेदार अंग्रेजी बोलकर अपनी उम्र के बच्चों पर रसूख जमाता है और अगर कोई उसे रोक टोक दे तो उसकी नाक पर गुस्सा और जुबान पर तुरंत जवाब तैयार रहता है। 15 साल की उम्र में ही बातचीत में बेहद मैच्योर दिखता है। किसी भी गलती के लिए उसे डांट-फटकार लगाओं तो तुरंत जवाब हाजिर रहता है। हाजिर जवाबी उनका हुनर, गुस्सा नाक पर और खुद को काबिल मानने की खुशफहमी में जीती है आज की ये पीढ़ी। आज के ज्यादातर घरों में एक बब्लू मौजूद है, जिसे पुरानी पीढ़ी बदतमीज या Overconfidence कहती है, मनोवैज्ञानिक (Psychologists) उसे Gen Z का सेल्फ-प्रोटेक्शन या अर्ली मैच्योरिटी मानते हैं। सवाल यह है कि क्या ये पीढ़ी वाकई गुमराह है, या इनके व्यवहार के पीछे कोई गहरा भावनात्मक दबाव छिपा है?

अक्सर सोशल मीडिया पर बदतमीज, अड़ियल और कामचोर जैसे टैग्स के साथ जेन-जी (1997-2012 के बीच जन्मे लोग) की आलोचना की जाती है। लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या ये व्यवहार वाकई अनुशासन की कमी है, या इसके पीछे गहरे मनोवैज्ञानिक कारण छिपे हैं? हालिया ग्लोबल मेंटल हेल्थ रिपोर्ट्स बताती हैं कि ये नई पीढ़ी इतिहास की सबसे अधिक इमोशनली एग्जॉस्ट यानी मानसिक रूप से थकी हुई पीढ़ी है। मनोवैज्ञानिकों (Psychologists) के अनुसार जिसे दुनिया बदतमीजी समझ रही है, वह दरअसल बर्नआउट और डिजिटल तनाव के खिलाफ इस जनरेशन का एक डिफेंस मैकेनिज्म हो सकता है।

15–16 साल के बच्चों में अर्ली मैच्योरिटी क्या सच में मैच्योरिटी है या एक डिफेंस मैकेनिज्म?

फोर्टिस हेल्थकेयर में अदायु माइंडफुलनेस हॉस्पिटल में सलाहकार मनोचिकित्सक डॉ. नेहा अग्रवाल से जब हमने बब्लू की मानसिक स्थिति को साझा किया तो उन्होंने बताया आज के बच्चों की परवरिश मीडिया, इंटरनेट के साथ हो रही है जिसकी वजह से इन जेन जी को खूब नॉलिज मिल जाती है। ये युवा अपने अधिकारों को लेकर बेहद जागरूक रहते है। इस पीढ़ी की जानकारी मिलेनियर से ज्यादा है। उनकी सोशल और इमोशनल अवेयरनेस बेहतर होती है। घर का माहौल इन युवाओं के बरताव में योगदान देता है। इन बच्चों को इंटरनेट, मोबाइल, टीवी और स्कूल से ज्यादा से ज्यादा जानकारी मिल रही है। इन युवाओं का इन्फॉर्मेशन लेवल बढ़ रहा है इसलिए ये ज्यादा चीजों की समझ कम उम्र में ही हासिल कर रहे हैं। इनका कॉन्फिडेंट लेवल घर के माहौल पर निर्भर करता है। बच्चे को अच्छे और बुरे काम के लिए नहीं टोकना उनका कॉन्फिडेंस बढ़ा देता है।  

बार-बार जवाब देना क्या बदतमीजी है?

आज के जेन जी इमोशनली और सोशली अवेयर हैं और उनके पास नॉलिज भी बहुत है।  इस उम्र में उनके पास जानकारी है लेकिन मैच्योरिटी की कमी है। उन्हें ये नहीं पता कि कब कैसे व्यवहार करना है। युवाओं में मैच्योरिटी लोगों के समझाने से आती है, घर के माहौल से आती है। इस जनरेशन को ये पता है कि उनके पास पिछली पीढ़ी से ज्यादा जानकारी है।

क्यों कम उम्र में ही बड़े दिखने की होड़ में है ये पीढ़ी?

टीनएजर्स हमेशा से ही अपनी पहचान तलाश रहे होते हैं। वो खुद को स्टेबलिश करने में लगे रहते हैं। उन्हें जिंदगी में रोकटोक पसंद नहीं है इसलिए वो घर के बड़ों से, पेरेंट्स से कटने लग जाते हैं।  नॉर्मल बच्चे जिन्हें किसी तरह की कोई साइकोलॉजिकल परेशानी नहीं है उनमें एडल्ट होने के लिए स्कूल का, सोसाइटी का और परिवार का सबका अहम रोल है।

डिजिटल बर्नआउट और FOMO का रोल

सोशल मीडिया का 24 घंटे का एक्सपोजर इन युवाओं को भावनात्मक रूप से थका रहा है। वो हमेशा ओन मोड में रहते हैं, जिससे उनमें चिड़चिड़ापन और हाजिर-जवाबी बढ़ती जा रही है। आज की पीढ़ी 24 घंटे डिजिटल कनेक्टिविटी में जी रही है। स्मार्टफोन, रील्स, नोटिफिकेशन और लगातार ऑनलाइन मौजूदगी ने उनके दिमाग को एक्टिव मोड में रहने की आदत डाल दी है। इस स्थिति को साइकोलोजिस्ट डिजिटल बर्नआउट कहते हैं,यानी लगातार स्क्रीन एक्सपोजर के कारण भावनात्मक और मानसिक थकावट। सोशल मीडिया के साथ जुड़ाव जैसे  लगातार नोटिफिकेशन और लाइक्स से दिमाग में डोपामाइन रिलीज होता है। तुरंत प्रतिक्रिया देने की आदत बनती है और उनका धैर्य कम होता है। ऑफलाइन बातचीत में भी उन्हें तुरंत जवाब देने की आदत बढ़ती जा रही है।

FOMO यानी Fear of Missing Out युवा पीढ़ी में समाया हुआ है। उन्हें ये डर रहता है कि कहीं वो किसी ट्रेंड, पार्टी, खबर या मौके से पीछे न रह जाएं। American Psychological Association के अनुसार, लगातार social comparison युवाओं में असंतोष और तनाव बढ़ा सकता है। सोशल मीडिया पर दूसरों की परफेक्ट लाइफ देखकर युवाओं को लगता है कि उन्हें भी हमेशा कुछ बड़ा, बेहतर और रोमांचक करना चाहिए। यह दबाव भीतर ही भीतर उन्हें थका देता है।

बच्चों की आदत के लिए पेरेंट्स भी हैं जिम्मेदार

बच्चों का ये व्यवहार अचानक नहीं बनता बल्कि वो खुद को धीरे-धीरे इस माहौल में डालते हैं। कई बार पेरेंट्स शुरुआत में बच्चों की छोटी-छोटी आदतों को बच्चा है, ठीक हो जाएगा कहकर नजरअंदाज कर देते हैं। कभी जरूरत से ज्यादा लाड़-प्यार और कभी अचानक सख्ती करते हैं। ये असंतुलित व्यवहार बच्चे के मन में भ्रम और असुरक्षा पैदा कर सकता है।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार जब पैरेंटिंग में स्थिरता नहीं होती, तो बच्चा यह समझ नहीं पाता कि उसकी सीमाएं क्या हैं। नतीजा यह होता है कि वह या तो अत्यधिक आत्मविश्वासी दिखने लगता है, या हर बात पर Defensive हो जाता है। आज के बच्चों पर पढ़ाई, करियर, सोशल इमेज और परफॉर्मेंस का दबाव पहले से ज्यादा है। ऐसे में अगर घर भी एक परफॉर्मेंस जोन बन जाए, तो बच्चा भावनात्मक रूप से थक सकता है।

बब्लू जैसे बच्चों को टोकने का सही तरीका क्या है?

 हर घर में एक बब्लू मौजूद है अगर आप चाहते हैं कि आपका बच्चा सभ्य और धैर्यवान बने तो आप बच्चे को रोकने और टोकने के बजाए उससे प्यार से बातचीज करें। ऊंची आवाज़ या बच्चों से टोंट में बात करने पर बच्चा तुरंत डिफेंस हो जाता है। पहले उसकी बात पूरी सुनें, फिर शांत लहजे में उसे समझाएं।

जेन जी को बदतमीजी और तर्क के बीच का फर्क कैसे समझाएं?

बच्चों को उदाहरण देकर समझाएं कि वो अपनी बात शांति और तर्क के साथ रखें। उसे बताएं कि बदतमीजी में लहजा और शब्द आक्रामक हो जाते हैं। बच्चे को ये अहसास दिलाएं कि अपनी बात में सहमति जताना गलत नहीं, लेकिन तरीका मायने रखता है। घर में बड़ों का व्यवहार ही उनका पहला सीखने का मॉडल होता है। पेरेंट्स को चाहिए कि वो बच्चे को मारे नहीं बल्कि उसे रूल्स समझाएं। बच्चे के साथ बैलेंस रहें।

डिजिटल डिटॉक्स क्यों जरूरी है?

लगातार स्क्रीन एक्सपोजर दिमाग को हमेशा ऑन मोड में रखता है, जिससे उनके दिमाग में चिड़चिड़ापन, ध्यान की कमी और नींद की समस्या बढ़ सकती है। डिजिटल डिटॉक्स से दिमाग को आराम मिलता है और भावनात्मक संतुलन बेहतर होता है। दिन में कुछ समय बिना फोन, बिना नोटिफिकेशन के बिताना जरूरी है। इससे वास्तविक बातचीत, पारिवारिक जुड़ाव और आत्म-चिंतन के लिए वक्त मिलता है जो किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद अहम है।

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डिस्क्लेमर:

यह जानकारी मनोवैज्ञानिकों की सामान्य राय पर आधारित है। अगर आप या आपके परिचित किसी मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं, तो किसी मनोवैज्ञानिक डॉक्टर से सलाह लें।