जलवायु परिवर्तन (Climate Change) को अक्सर बढ़ते तापमान, हीटवेव, बाढ़ और सूखे से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन अब इसका असर इंसानी शरीर की सबसे बुनियादी जरूरत- नींद पर भी साफ दिखाई देने लगा है। एक नई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट बताती है कि भारत में बढ़ती गर्म रातों के कारण लोग हर साल दर्जनों घंटे की नींद खो रहे हैं। कुछ राज्यों में यह नुकसान 90 घंटे के करीब पहुंच चुका है जबकि इसका एक बड़ा हिस्सा सीधे जलवायु परिवर्तन से जुड़ा है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में रात के तापमान में लगातार बढोतरी होने से लोगों की नींद का समय घट रहा है। क्लाइमेट सेंट्रल की एक लेटेस्ट रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है। ‘Climate Change is Costing People Sleep’ नाम से आई इस रिपोर्ट के अनुसार, औसतन भारतीय हर साल 66 से 93 घंटे तक की नींद गर्म रातों की वजह से खो रहे हैं। इनमें से 5 से 8 घंटे की अतिरिक्त नींद का नुकसान केवल जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहा है।
दक्षिण भारत सबसे ज्यादा प्रभावित
राज्यवार आंकड़े बताते हैं कि सबसे ज्यादा असर दक्षिण भारत में दिखाई दे रहा है। पुडुचेरी में एक व्यक्ति औसतन 92 घंटे, आंध्र प्रदेश में 88.6 घंटे, केरल में 88.3 घंटे और तमिलनाडु में 84 घंटे की नींद हर साल खो रहा है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि तमिलनाडु में केवल जलवायु परिवर्तन की वजह से ही करीब 7.9 घंटे की अतिरिक्त नींद कम हो रही है जो देश में सबसे ज्यादा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि समुद्री तटों वाले इलाकों में अधिक नमी (ह्यूमिडिटी) और रात में बढ़ा हआ तापमान शरीर को पर्याप्त ठंडा नहीं होने देता। यही वजह है कि इन क्षेत्रों में नींद पर असर अधिक दिखाई देता है।
| राज्य/केंद्रशासित प्रदेश | शहरों की संख्या | वार्षिक नींद की कमी (घंटे/व्यक्ति) | जलवायु परिवर्तन से अतिरिक्त नींद की कमी (घंटे/व्यक्ति) |
| पुडुचेरी | 1 | 92 | 5 |
| आंध्र प्रदेश | 5 | 88.6 | 5.8 |
| केरल | 4 | 88.3 | 6 |
| तमिलनाडु | 10 | 84 | 7.9 |
| गुजरात | 7 | 81.4 | 5.6 |
| तेलंगाना | 2 | 78.5 | 6.5 |
| ओडिशा | 3 | 78 | 5.3 |
| छत्तीसगढ़ | 2 | 77 | 6 |
| महाराष्ट्र | 22 | 76.3 | 5.8 |
| पश्चिम बंगाल | 5 | 75 | 5.6 |
| बिहार | 1 | 73 | 5 |
| कर्नाटक | 4 | 72 | 7.8 |
| असम | 1 | 72 | 6 |
| झारखंड | 4 | 71 | 6.3 |
| राजस्थान | 5 | 70.4 | 7 |
| मध्य प्रदेश | 5 | 69.6 | 6 |
| उत्तर प्रदेश | 11 | 68.8 | 4.9 |
| हरियाणा | 3 | 67.3 | 4.7 |
| दिल्ली | 5 | 66.8 | 5 |
| चंडीगढ़ | 1 | 62 | 6 |
महानगरों में भी बढ़ रही समस्या
भारत के बड़े शहर भी इस संकट से अछूते नहीं हैं। रिपोर्ट के अनुसार, चेन्नई में एक व्यक्ति सालाना 93 घंटे, मुंबई में 84 घंटे, कोलकाता में 80 घंटे, अहमदाबाद में 78 घंटे, हैदराबाद में 75 घंटे, बेंगलुरु में 67 घंटे, दिल्ली में 66 घंटे और पुणे में 65 घंटे तक की नींद गर्म रातों के कारण खो रहा है। इन शहरों में जलवायु परिवर्तन अकेले 5 से 8 घंटे की अतिरिक्त नींद कम कर रहा है।
शहरी क्षेत्रों में कंक्रीट, डामर और कम हरित क्षेत्र के कारण बनने वाला अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव रात में भी तापमान को ऊंचा बनाए रखता है। इसका असर खासतौर पर घनी आबादी वाले शहरों में रहने वाले लोगों पर पड़ता है।
भारत के प्रमुख महानगरों में नींद की कमी (2020–2025)
| रैंक | महानगर | राज्य | वार्षिक नींद की कमी (घंटे/व्यक्ति) | जलवायु परिवर्तन से अतिरिक्त नींद की कमी (घंटे/व्यक्ति) | जलवायु परिवर्तन की हिस्सेदारी |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 | चेन्नई | तमिलनाडु | 93 | 5 | 6% |
| 2 | मुंबई | महाराष्ट्र | 84 | 5 | 6% |
| 3 | कोलकाता | पश्चिम बंगाल | 80 | 5 | 7% |
| 4 | अहमदाबाद | गुजरात | 78 | 6 | 7% |
| 5 | हैदराबाद | तेलंगाना | 75 | 7 | 9% |
| 6 | बेंगलुरु | कर्नाटक | 67 | 8 | 12% |
| 7 | दिल्ली | दिल्ली | 66 | 5 | 7% |
| 8 | पुणे | महाराष्ट्र | 65 | 6 | 9% |
नींद क्यों कम हो रही है?
इंसान का शरीर सोते समय अपना तापमान थोड़ा कम करता है। लेकिन जब रात का तापमान अधिक रहता है तो शरीर के लिए खुद को ठंडा करना मुश्किल हो जाता है। इससे नींद आने में देर लगती है, बीच-बीच में नींद खुलती रहती है और गहरी नींद का समय कम हो जाता है। लगातार ऐसा होने पर नींद की कुल अवधि भी घट जाती है।
सेहत पर भी असर
रिपोर्ट चेतावनी देती है कि लंबे समय तक नींद की कमी केवल अगले दिन की थकान तक सीमित नहीं रहती। इससे हृदय रोग, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, स्ट्रोक, मानसिक तनाव, अवसाद, कमजोर इम्यून सिस्टम और सड़क दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है। बच्चों में सीखने की क्षमता और बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर भी इसका असर पड़ता है।
सबसे ज्यादा असर किन लोगों पर?
रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन से होने वाली नींद की कमी का असर सभी पर एक जैसा नहीं है। गरीब परिवार, बुजुर्ग, महिलाएं, गर्भवती महिलाएं और वे लोग जिनके घरों में एयर कंडीशनिंग जैसी सुविधाएं नहीं है, सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। कम इनकम वाले परिवारों के लिए रात की गर्मी से राहत पाने के ऑप्शन सीमित होते हैं जिससे स्वास्थ्य संबंधी जोखिम और बढ़ जाते हैं।
यह सिर्फ मौसम नहीं, जलवायु परिवर्तन का संकेत
रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी है कि आज दुनिया के अधिकांश बड़े शहरों में जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाला नींद का नुकसान 1970 के दशक की तुलना में कम-से-कम दोगुना हो चुका है। यानी यह समस्या केवल मौसमी गर्मी नहीं बल्कि बदलती जलवायु का दीर्घकालिक प्रभाव है।
आगे की चुनौती
भारत दुनिया के सबसे तेजी से शहरीकरण करने वाले देशों में है। बढ़ती आबादी, कंक्रीट के फैलाव और लगातार गर्म होती रातों के बीच यह चुनौती और गंभीर हो सकती है। अब तक जलवायु परिवर्तन पर चर्चा मुख्य रूप से हीटवेव, ऊर्जा खपत और कृषि पर केंद्रित रही है लेकिन यह रिपोर्ट बताती है कि इसका असर लोगों की रोजमर्रा की नींद, स्वास्थ्य, काम करने की क्षमता और जीवन की गुणवत्ता तक पहुंच चुका है।
जलवायु परिवर्तन का असर अब सिर्फ दिन के बढ़ते तापमान में नहीं बल्कि उन रातों में भी महसूस किया जा रहा है। जब शरीर आराम करना चाहता है लेकिन बढ़ती गर्मी उसे चैन की नींद नहीं लेने देती।
Climate Central की 15 जुलाई 2026 को आई लेटेस्ट रिपोर्ट में दुनियाभर में जलवायु परिवर्तन के कारण नींद की कमी के आंकड़े बताए गए हैं।
- पिछले 50 सालों में जलवायु परिवर्तन के कारण नींद की कमी दोगुनी से ज्यादा हो गई है।
- 1,338 बड़े शहरों के अध्ययन में लगभग हर शहर में तापमान से जुड़ी नींद की हानि बढ़ी पाई गई।
- 2020-2025 के दौरान दुनिया में एक व्यक्ति ने औसतन 56 घंटे प्रति वर्ष नींद खोई।
- इस नींद की कमी का 10% से ज्यादा हिस्सा सीधे जलवायु परिवर्तन (फॉसिल फ्यूल और वनों की कटाई) से जुड़ा है।
- मिडिल ईस्ट में सबसे ज्यादा असर: 55-87 घंटे/वर्ष नींद की हानि जिसमें 12-16 घंटे जलवायु परिवर्तन के कारण।
- दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में 78-91 घंटे/वर्ष नींद की कमी जिसमें लगभग 8-9 घंटे जलवायु परिवर्तन से जुड़े।
- पश्चिम अफ्रीका के कई शहरों में 65+ घंटे/वर्ष नींद की हानि दर्ज हुई।
- रात का बढ़ता तापमान शरीर को ठंडा होने नहीं देता जिससे स्ट्रोक, हृदय रोग और मृत्यु का जोखिम बढ़ता है।
- कम और खराब नींद से मानसिक स्वास्थ्य, याददाश्त, सीखने की क्षमता और उत्पादकता प्रभावित होती है।
- बुजुर्ग, बच्चे, गर्भवती महिलाएं और कम आय वाले लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, गर्म रातें सार्वजनिक स्वास्थ्य और आर्थिक उत्पादकता के लिए बढ़ता खतरा हैं और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी जरूरी है।
Climate Central की वीपी फॉर साइंस डॉ. क्रिस्टिना डाहल के अनुसार, यह विश्लेषण दिखाता है कि जलवायु परिवर्तन अब दुनिया भर के लोगों की नींद पर प्रत्यक्ष और मापने योग्य असर डाल रहा है। बढ़ते तापमान और नींद पर उसके प्रभाव से जुड़े नवीनतम शोध के आधार पर पहली बार यह आकलन किया गया है कि बढ़ती गर्मी के कारण लोग कितने घंटे की नींद खो रहे हैं। अध्ययन में पाया गया कि 1300 से अधिक शहरों में 1970 के दशक की तुलना में तापमान से होने वाली नींद की कमी कम से कम दोगुनी हो चुकी है जो यह दिखाती है कि जीवाश्म ईंधनों से होने वाली ग्लोबल वार्मिंग का असर केवल चरम मौसम तक सीमित नहीं है बल्कि मानव स्वास्थ्य की सबसे बुनियादी जरूरत, पर्याप्त नींद को भी प्रभावित कर रहा है।
ग्लोबल क्लाइमेट एंड हेल्थ अलायंस की चेयर और कनाडियन मेडिकल एसोसिएशन की प्रेसिडेंट-इलेक्ट डॉ. कोर्टनी हॉवर्ड का कहना है कि कि स्वस्थ रहने के लिए वयस्कों को प्रतिदिन 7 से 9 घंटे की नींद आवश्यक है लेकिन रात के बढ़ते तापमान से नींद की गुणवत्ता और अवधि प्रभावित हो रही है। इसका सबसे अधिक असर कम आय वाले देशों के लोगों, बुजुर्गों और महिलाओं पर पड़ रहा है। लगातार 7 घंटे से कम नींद लेने से रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, कार्य क्षमता घटती है, दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ता है और लंबे समय में मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग तथा समय से पहले मृत्यु का जोखिम बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण गर्म रातों की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता को देखते हुए नींद में बाधा को सार्वजनिक स्वास्थ्य और उत्पादकता के लिए गंभीर चुनौती माना जाना चाहिए तथा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में तत्काल कमी और प्रभावी अनुकूलन उपाय अपनाना जरूरी है।
