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क्रांति करने से पहले जूता बेचने निकले थे चे ग्वेरा, बिका नहीं तो खुद पहनकर घूमने लगे

क्रांतिकारी चे ग्वेरा की टोपी विश्व प्रसिद्ध है। उस तरह की टोपी को बेरे कहते हैं। चे के पहले उस तरह की टोपी आयरिश क्रांतिकारी पहना करते थे।

Che guevara | Nehru | revolutionary
30 जून 1959 को चे भारत की यात्रा पर आए थे। इस दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और चे ग्वेरा की मुलाकात हुई थी, दोनों ने साथ खाना भी खाया था। दिल्ली के अलावा चे कलकत्ता भी गए थे। (Photo Credit – Express Archive)

एक अकेला व्यक्ति जो अमेरिकी साम्राज्यवाद के लिए सबसे बड़ा संकट बन गया, जिसे मारने के लिए अमेरिका ने अपनी पूरी ताकत लगा दी, जिसे मारने के बाद भी अमेरिका को डर सताता रहा… उस व्यक्ति का नाम है चे ग्वेरा। लैटिन अमेरिकी क्रांति परंपरा के महानायक चे ग्वेरा का जन्मदिन 14 जून 1928 में हुआ था। पूरा नाम ‘अर्नेस्टो ग्वेरा दे ला सरना’ था लेकिन चर्चित ‘चे’ से हुए। डॉक्टर, लेखक, क्रांतिकारी और गुरिल्ला योद्धा चे ग्वेरा इतिहास की कई महत्वपूर्ण घटनाओं के निर्माणकर्ताओं में रहे हैं। लेकिन आज चर्चा उनके बिजनेस करने की असफल कोशिशों पर केंद्रित रहेगी।

कारोबारी बनने का असफल प्रयास

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20 साल की उम्र में जोला, मार्क्स, लेनिन, फ्रायड, नेहरू को पढ़ते हुए भी चे ग्वेरा में वैचारिक परिपक्वता आनी अभी बाकी थी। उन्हीं दिनों चे को अचानक बिजनेस करने की सूझी। उन्होंने अपने दोस्तों के साथ मिलकर घरेलू कॉक्रोच मारने के लिए एक कीटनाशक बनाने और बेचने की योजना तैयार की। इस कीटनाशक को गेमेक्सीन और टेलकम पाउडर को मिलाकर तैयार किया जाना था। गेमेक्सीन टिड्डियों को मारने की दवा है जिससे खराब गंध आती है। चे ग्वेरा के जीवनीकार वी.के. सिंह अपनी किताब में बताते हैं, घर के निचले तल पर एक खाली गैरेज में फैक्ट्री शुरू हुई। सारे घर में गेमेक्सीन की बीमार कर देने वाली बदबू फैल गई। घरवालों से लेकर किरायदारों तक के दबाव को झेलते हुए काम जारी रहा। लेकिन इस काम से जुड़े लोग एक-एक कर बीमार होते चले गए। नाक पर कपड़ा बांध अपने बिजनेस को बचाने के लिए चे ग्वेरा सबसे आखिर तक टिके रहे। अंततः उन्होंने भी बिस्तर पकड़ लिया और पहले बिजनेस का दि एंड हो गया।

वी.के. सिंह के मुताबिक, चे का अगला बिजनेस प्लान था होल सेल से थोक भाव में जूते खरीदना और उन्हें घर-घर जाकर बेचना। तय योजना के तहत चे ग्वेरा होल सेल से जूता ले आए। गैरेज को गोदाम में बदलकर जूतों की पैकेजिंग शुरू हुई। लेकिन चे ग्वेरा को जल्द ही पता चल गया कि थोक भाव में लाए जूतों में से बमुश्किल 10 फीसदी जूतों की ही जोड़ी बन पा रही है। बाकी जूते अलग-अलग नाप और रंग के हैं। ऐसे में उन्होंने शहर के एक पैर से लंगड़े लोगों को ढूंढना शुरू किया। वो उन्हें एक-एक जूता बेचने लगे। कुछ 5-10 जूते बिके भी लेकिन बाकी बचे जूतों को उन्हें खुद लम्बे समय तक पहनकर सधाना पड़ा। वो अपने दोनों पैर में दो अलग-अलग रंग के जूते पहन घूमते थे। इस तरह महान क्रांतिकारी चे ग्वेरा का एक कारोबारी बनने का सपना अधूरा रह गया।

भारत और चे

क्यूबा से ‘अमेरिकी पिट्ठू’ बतिस्ता को भगाकर नए समाजावादी क्यूबा का निर्माण करने वाले चे ग्वेरा 1959 में दिल्ली भी आए थे। वो अपने कॉलेज के दिनों में जवाहरलाल नेहरू की लिखी डिस्कवरी ऑफ इंडिया से बहुत प्रभावित थे। 30 जून 1959 को नेहरू के विशेष आमंत्रण पर चे दिल्ली पहुंचे थे। तब चे क्यूबा सरकार में मंत्री थे। चे ग्वेरा की भारत यात्रा पर वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने एक विस्तृत रिपोर्ट लिखी है। उस रिपोर्ट से पता चलता है कि 1 जुलाई 1959 को चे ग्वेरा और नेहरू की मुलाकात हुई और दोनों ने साथ खाना खाया था। दिल्ली के अलावा चे ग्वेरा कलकत्ता भी गए थे, वहां उन्होंने बंगाल के मुख्यमंत्री से मुलाकात की थी। इस यात्रा से लौटने के बाद चे ग्वेरा ने एक रिपोर्ट लिखी थी, जो उन्होंने अपने साथी फिदेल कास्त्रो को सौंपी।

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