पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के जाने के बाद सत्ता में आई गठबंधन सरकार एक महीने भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी, और मात्र 23 दिनों में तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इस आधार पर इस्तीफा दे दिया था कि वह न्यायपालिका के कार्यों में दखल नहीं देना चाहते थे।
प्रधानमंत्री थे चौधरी चरण सिंह, और ठीक 47 साल पहले आज ही के दिन (20 अगस्त, 1979) उन्होंने अपना इस्तीफा तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी को सौंप दिया था। लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ था कि 28 जुलाई को प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने वाले चरण सिंह ने इतनी जल्दी इस्तीफा दे दिया था।
पहले क्या हुआ
आपातकाल के बाद मार्च 1977 में सत्ता में आई मोरारजी देसाई की जनता सरकार में चरण सिंह ने गृह मंत्री के रूप में अपना पदभार ग्रहण किया था, लेकिन मोरारजी देसाई के साथ असहमतियों के कारण उन्होंने 1 जुलाई 1978 को इस्तीफा दे दिया। बाद में असहमतियों को दूर किया गया और जनवरी 1979 में चरण सिंह फिर से सरकार में शामिल हुए। इस बार उन्होंने उप-प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लिया और साथ ही वित्त मंत्रालय का भी कार्यभार संभाला। लेकिन दोनों दिग्गज नेताओं के बीच दूरियां कम नहीं हुईं। परिणाम यह हुआ कि मोरारजी देसाई को 15 जुलाई को प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा, क्योंकि जनता पार्टी के सहयोगियों का एक बड़ा हिस्सा चरण सिंह के समर्थन में था।
हालांकि, चौधरी चरण सिंह के पास भी सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत नहीं था। उन्होंने इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस (आई) के बाहरी समर्थन से सरकार बनाई। वह प्रधानमंत्री बने और यशवंतराव चव्हाण बने उप-प्रधानमंत्री।
इस्तीफा क्यों दिया
इस्तीफे के बाद स्वयं चरण सिंह ने एक बयान में बताया कि उन्होंने इस्तीफा इसलिए दे दिया क्योंकि समर्थन के बदले में इंदिरा गांधी चाहती थीं कि उनके खिलाफ इमरजेंसी के दौरान के चल रहे कुछ मामलों को वापस ले लिया जाए। चरण सिंह ने इस शर्त को मानने के बजाए इस्तीफा दे दिया। उल्लेखनीय है कि चौधरी चरण सिंह के गृह मंत्री रहने के दौरान ही इंदिरा गांधी पर आपातकाल के दौरान अपने पद और शक्ति के दुरुपयोग के लिए मामला दर्ज किया गया था और गिरफ्तारी भी हुई थी।
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस्तीफे के बाद चरण सिंह ने एक बयान में कहा, “यदि हम पद पर बने रहने के लिए आपातकाल के दौरान हुए अत्याचारों के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने पर सहमत हो जाते, तो देश हमें माफ नहीं करता।” सिंह ने श्रीमती गांधी का सीधा नाम नहीं लिया, लेकिन उन्होंने कहा कि वह ‘सत्तावादी ताकतों’ और ‘न्यायपालिका के सामान्य कामकाज में हस्तक्षेप चाहने वाले वर्गों’का समर्थन नहीं चाहते।
इस्तीफे के बाद क्या हुआ
इस्तीफे के साथ ही चरण सिंह ने राष्ट्रपति को लोकसभा को भंग करने की सलाह दी। हालांकि जगजीवन राम चाहते थे कि लोकसभा भंग न हो। उन्होंने राष्ट्रपति से मुलाकात कर लोकसभा भंग नहीं करने की मांग भी की। दूसरी ओर इंदिरा गांधी चाहती थीं कि लोकसभा भंग हो और मध्यावधि चुनाव कराई जाए। उन्होंने राष्ट्रपति से मुलाकात कर मध्यावधि चुनाव कराने की मांग भी की। कांग्रेस (आई) के संसदीय दल के बैठक में भी इस मांग को समर्थन देने की बात की गई।
राष्ट्रपति ने लोकसभा भंग कर दी, और चुनावों के बाद इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस फिर से सत्ता में आ गई। हालांकि, अपने इस्तीफे के बाद भी इंदिरा गांधी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने तक चरण सिंह जनवरी 1980 तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में कार्य करते रहे। वह अब एकमात्र प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने प्रधानमंत्री रहते हुए लोकसभा का सामना नहीं किया, यानि उन्हें विश्वास मत साबित करने की जरूरत नहीं पड़ी।
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