19वीं शताब्दी के शुरुआत तक ईस्ट इंडिया कंपनी भारत के बड़े हिस्से पर अपना अधिकार जमा चुकी थी। गुलामी में जकड़ा समाज छटपटा रहा था, अपने अंदर झांक रहा था और इस जकड़न से बाहर निकलने की राह तलाश रहा था। इसी कड़ी में भारतीय पुनर्जागरण के पिता राजा राममोहन राय ने आज ही के दिन, लगभग दो सदी पूर्व (20 अगस्त, 1928) ब्रह्म सभा की स्थापना की, जो आगे चलकर ब्रह्म समाज बना।
यह आधुनिक भारत का पहला बौद्धिक सुधार आंदोलन था; जिसने अंधविश्वासों, कर्मकांडों का विरोध किया तथा तर्कवाद को बढ़ावा देकर वैज्ञानिक ज्ञान को बढ़ावा देने की वकालत की। इन्हीं सुधारों का परिणाम था कि भारत में राष्ट्रवादी आंदोलन का विकास हुआ। मतलब यहीं वह सामाजिक सुधार आंदोलन था, जिसके आधार पर आज का आजाद और आधुनिक भारत खड़ा है।
नाम में सत्य और समानता की गूंज
आखिर इस संगठन और इस आंदोलन का नाम ब्रह्म समाज ही क्यों रखा गया? ब्राह्म समाज का अर्थ है- ऐसे लोगों का समूह जिन्हें’ब्रह्म’ यानी परम सत्य का ज्ञान हो। वास्तव में, ब्राह्म समाज जाति, पंथ या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करता है। यह मूल्य आज भी भारत के संविधान में प्रमुखता से निहित है। संविधान जाति, धर्म या पंथ के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव की मनाही करता है।
ब्रह्म समाज और उसके सदस्यों ने क्या किया
इस आंदोलन और इसके सदस्यों ने तत्कालीन समाज की कुरीतियों पर कुठाराघात किया और लोगों के सामने सच रखने की कोशिश की। ब्रह्म समाजियों का मानना था कि यह सामाजिक कुरीतियां ही थीं, जिनके कारण भारत गुलाम हुआ। इसलिए उन्होंने आडंबरों और कर्मकांडों पर सवाल उठाना शुरू किया। ब्राह्म समाजियों ने इस विचार को स्वीकार करने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया कि कोई भी धर्मग्रंथ मनुष्यों के तर्क, विवेक और नैतिक बुद्धि से ऊपर हो सकता है और सर्वोच्चता का दावा कर सकता है। उन्होंने ईश्वर के अवतार लेने की अवधारणा को भी खारिज कर दिया। मूर्तिपूजा का खंडन का खंडन किया और बहुत सारे भगवानों की पूजा करने के बजाय एक ईश्वर की पूजा करने की वकालत की।
ब्रह्मसमाजियों ने सिर्फ धार्मिक आडंबरों पर ही सवाल नहीं उठाए, सामाजिक कुरीतियों पर भी प्रहार किया। उन्होंने जाति व्यवस्था को नकार दिया, स्त्री शिक्षा का समर्थन किया और बाल विवाह का विरोध किया। उन्हीं के प्रयासों का परिणाम था कि 1829 में सती प्रथा पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून लागू हुआ।
आधुनिक भारत की नींव
ब्रह्म समाज ने न केवल लोगों को अंधविश्वासों से मुक्त कराने का प्रयास किया, बल्कि उसने समाज सुधारकों की अग्रदूतों को भी तैयार किया- देवेंद्र नाथ टैगौर, ईश्वर चंद्र विद्यासागर और केश्वचंद्र इसके उदाहरण हैं। इन्हीं समाज सुधारों ने राष्ट्रवादी आंदोलन की आधार रखी, जिसपर आगे चलकर राजनीतिक आंदोलनकारियों ने राष्ट्रीय आंदोलन की इमारत खड़ी की।
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