पाठ्य पुस्तकें तैयार करने वाली राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) एक बार फिर बड़े विवाद के केंद्र में है। ताजा मामला उसकी कक्षा आठ की नई सामाजिक विज्ञान पुस्तक एक्सप्लोरिंग सोसायटी : इंडिया एंड बियोंड, खंड 2 का है, जिसे 24 फरवरी 2026 को जारी किया गया और 48 घंटे के भीतर वापस लेना पड़ा। कारण, उसके एक अध्याय में न्यायिक भ्रष्टाचार का उल्लेख था। सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया, प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कड़े शब्दों में आपत्ति जताई और एनसीईआरटी ने सार्वजनिक माफी मांगते हुए पुस्तक को अपनी वेबसाइट से हटा दिया। सुप्रीम कोर्ट ने सख्त कदम उठाते हुए पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया। सरकार को भी कहना पड़ा कि इस गलती की जवाबदेही तय की जाएगी। लेकिन यह प्रकरण केवल एक अध्याय का नहीं है। यह उस बड़े सवाल का हिस्सा है जो पिछले कुछ वर्षों में लगातार उठता रहा है- एनसीईआरटी की स्वायत्तता कहां है? उसका बजट उसे किसके अधीन बनाता है? पाठ्य पुस्तकों में बदलाव शैक्षणिक जरूरत से होते हैं या किसी विचारधारा की मजबूरी के तहत? अपनी बुनियाद रखे जाने के साथ ही एनसीईआरटी का विवादों से नाता रहा है। मसले पर जनसत्ता सरोकार की पड़ताल।
अध्याय चार ‘द रोल आफ द ज्यूडीशियरी इन अवर सोसायटी’ में लिखा था- ‘लोग न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार का अनुभव करते हैं। गरीबों और वंचितों के लिए न्याय की चौखट तक पहुंचना बहुत मुश्किल होता है। पुस्तक में लंबित मुकदमों के आंकड़े भी थे-सुप्रीम कोर्ट में 81,000, उच्च न्यायालयों में 62.40 लाख और जिला अदालतों में 4.70 करोड़। पूर्व प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई का जुलाई 2025 का वह कथन भी उद्धृत था, जिसमें उन्होंने कहा था कि भ्रष्टाचार और कदाचार के उदाहरणों ने जनता के विश्वास पर नकारात्मक असर डाला है। सीपीजीआरएएमएस के जरिए साल 2017 से साल 2021 के बीच 1,600 से अधिक न्यायिक शिकायतें मिलने का भी उल्लेख था। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने फरवरी 2026 में लोकसभा में बताया था कि साल 2016-2025 के बीच न्यायाधीशों के विरुद्ध 8,639 शिकायतें आईं। इनमें सर्वाधिक साल 2024 में 1,170 शिकायतें थीं।
सुप्रीम कोर्ट का एक असाधारण कदम
25 फरवरी 2026 को वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुआई वाली पीठ के सामने यह मामला रखा। सिब्बल ने कहा-हम इस संस्था के सदस्य के रूप में गहरी चिंता में हैं कि कक्षा आठ के बच्चों को न्यायपालिका के भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ाया जा रहा है। सिंघवी ने चयनात्मकता पर सवाल उठाया, कहा- नेताओं और नौकरशाहों के भ्रष्टाचार का एक भी शब्द नहीं, केवल न्यायिक भ्रष्टाचार।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जायमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने स्वत: संज्ञान लिया। प्रधान न्यायाधीश ने कहा-यह एक सुनियोजित कदम लगता है। मुझे उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के भी संदेश आ रहे हैं। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि यह सामग्री संविधान की मूल संरचना और शक्ति-पृथक्करण के सिद्धांत के विरुद्ध है।
भारतीय संवैधानिक इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने किसी स्कूली पाठ्यपुस्तक पर स्वत: संज्ञान लिया। इसने एक नई बहस छेड़ दी है। क्या न्यायपालिका अपने बारे में लिखी सामग्री को भी नियंत्रित कर सकती है? और यदि हां, तो लोकतंत्र के तीनों अंगों का यह शक्ति संतुलन किस दिशा में जा रहा है? एनसीईआरटी ने तुरंत माफी मांगी। पुस्तक वेबसाइट से हटाई और कहा कि संशोधित संस्करण उचित प्राधिकारियों से परामर्श के बाद साल 2026-27 सत्र से उपलब्ध होगा। दिल्ली के अनेक विद्यालयों को यह भी नहीं पता था कि यह अध्याय पढ़ाना है या नहीं।
विवाद: एक क्रमिक बदलाव की तस्वीर
साल 2022 में कोविड के बाद पाठ्यभार कम करने के नाम पर एनसीईआरटी ने कक्षा छह और बारहवीं की पुस्तकों में व्यापक बदलाव किए। अप्रैल 2023 में पड़ताल में पता चला कि जो आधिकारिक सूची जारी की गई थी, उससे परे भी कई फेरबदल किए गए थे। कक्षा 12 की राजनीति विज्ञान की पुस्तक से वे अनुच्छेद हटाए गए, जो 15 वर्षों से पढ़ाए जा रहे थे- जैसे कि गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर कुछ समय के लिए प्रतिबंध लगाया गया और गांधी की हत्या के कई प्रयास किए गए। कक्षा बारहवीं के इतिहास से नाथूराम गोडसे को पुणे का ब्राह्मण और एक उग्रवादी हिंदू अखबार का संपादक बताने वाला संदर्भ भी हटाया गया।
इसी वर्ष कक्षा ग्यारहवीं की समाजशास्त्र की पुस्तक से साल 2002 के गुजरात दंगों का वह अंतिम उल्लेख भी हटाया गया जो किसी एनसीईआरटी पुस्तक में शेष था। कक्षा बारहवीं के इतिहास का मुगल दरबार पर पूरा अध्याय हटाया गया। वर्ष 2023 में कक्षा दस की विज्ञान पुस्तक से डार्विन का विकासवाद सिद्धांत पूरी तरह हटाया गया। 1,800 से अधिक विज्ञानियों और शिक्षाविदों ने खुले पत्र से विरोध किया। पूर्व एनसीईआरटी प्रमुख कृष्ण कुमार ने तब कहा था- क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि कोई छात्र दसवीं पास करे और डार्विन का नाम न जाने? भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद का नाम कक्षा ग्यारहवीं की पुस्तक से हटाया गया।
साल 2024 में कक्षा 12 की राजनीति विज्ञान पुस्तक में बाबरी मस्जिद का नाम बदलकर तीन गुंबद वाला ढांचा किया गया। कक्षा छह की नई पुस्तक में सिंधु घाटी सभ्यता को सिंधु-सरस्वती सभ्यता कहा गया और आर्य प्रवास सिद्धांत को नकारा गया। कक्षा तीन और छह की नई पुस्तकों में संविधान की प्रस्तावना तक अनुपस्थित थी। साल 2025 में कक्षा सात से दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य के अध्याय हटाकर मौर्य, शुंग और सातवाहन को प्रमुखता दी गई।
बजट और निर्भरता : स्वायत्तता की असलियत
एनसीईआरटी कानूनी रूप से एक स्वायत्त निकाय है, किंतु व्यवहार में वह पूर्णत: शिक्षा मंत्रालय के बजट पर निर्भर है। साल 2024-25 में शिक्षा मंत्रालय को कुल 1,20,628 करोड़ रुपए आबंटित किए गए। केवीएस और एनवीएस सहित स्वायत्त निकायों का हिस्सा इस बजट का लगभग 12 फीसद रहा। एनसीईआरटी इन्हीं स्वायत्त निकायों में से एक है और उसका संचालन पूरी तरह केंद्र सरकार के अनुदान पर चलता है। साल 2025-26 में शिक्षा मंत्रालय का कुल बजट 1,28,650 करोड़ रुपए हो गया जो 6.22 फीसद अधिक है। इस वित्तीय निर्भरता का सीधा असर एनसीईआरटी के निदेशक की नियुक्ति प्रक्रिया पर पड़ता है, जो शिक्षा मंत्रालय द्वारा की जाती है। साल 2022 से निदेशक के रूप में कार्यरत दिनेश प्रसाद सकलानी की नियुक्ति भी इसी प्रक्रिया से हुई। इसी दौरान पाठ्यपुस्तकों में बदलावों की रफ्तार असाधारण रूप से बढ़ी। पड़ताल में पाया कि साल 2014-2018 के बीच एनसीईआरटी की 182 पाठ्यपुस्तकों में 1,334 बदलाव किए गए। इनमें से 68 बिना एनसीईआरटी की आंतरिक विशेषज्ञ प्रक्रिया के किए गए।
राजनीतिक विचारधारा का हस्तक्षेप कोई नई घटना नहीं है
एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तकों में राजनीतिक विचारधारा का हस्तक्षेप कोई नई घटना नहीं है। साल 1998-2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में भी ऐसे विवाद उठे थे, जब मुरली मनोहर जोशी के शिक्षा मंत्री के कार्यकाल में पाठ्यक्रम को राष्ट्रवादी रंग देने की कोशिश की गई थी। एनसीईआरटी निदेशक की नियुक्ति, पाठ्यक्रम समितियों का चयन और युक्तिसंगतीकरण की प्रक्रिया-ये सभी शिक्षा मंत्रालय की निगरानी में होती हैं। एक विश्लेषण में यह भी सामने आया कि कक्षा आठ से 12 तक की पुस्तकों में वीडी सावरकर को महान देशभक्त, महान क्रांतिकारी और महान संगठक कहा गया, जबकि जवाहरलाल नेहरू को कक्षा आठ की पुस्तक से हटा दिया गया।
बजट निर्भरता का अर्थ
एनसीईआरटी की कार्यपरिषद में शिक्षा मंत्रालय के प्रतिनिधि होते हैं। निदेशक मंत्रालय द्वारा नियुक्त होते हैं। अनुदान सरकारी है। ऐसे में स्वायत्त शब्द केवल संवैधानिक श्रेणी बनकर रह जाता है। यह व्यवहार में खरा नहीं उतरता है। न्यायपालिका वाले अध्याय का विवाद इसलिए अलग है क्योंकि इसमें पाठ्यसामग्री वैचारिक नहीं, तथ्यात्मक थी और इसे हटाने का आदेश विचारधारा से नहीं, संस्थागत दबाव से आया। इसने एक नया प्रश्न खड़ा किया? क्या हर संस्था अपनी आलोचना को पाठ्यक्रम से हटवाने में सक्षम है? यदि हां, तो फिर लोकतांत्रिक शिक्षा का अर्थ क्या रह जाता है?
मूल सवाल: क्या पढ़ें, यह कौन तय करे?
एनसीईआरटी के ये विवाद मिलकर एक बड़ी तस्वीर बनाते हैं। यह एक ऐसी संस्था है, जो कागज पर तो स्वायत्त है, लेकिन नियुक्तियों के मामलेमें नियंत्रित है और पाठ्यसामग्री में राजनीतिक व संस्थागत दबावों के प्रति संवेदनशील है। साल 2022 से 2026 के बीच जो बदलाव हुए उनकी दिशा स्पष्ट है:- मुगल इतिहास का संकुचन, विकासवाद की अनुपस्थिति, दंगों पर मौन, संविधान प्रस्तावना की गैरहाजिरी, और अब न्यायिक आलोचना का निषेध।
इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि लोकतंत्र के तीनों अंगों में से एक न्यायपालिका ने पहली बार पाठ्यपुस्तक की सामग्री के मामले में सीधा हस्तक्षेप किया और इसका विरोध करने की स्थिति में न एनसीईआरटी थी, न शिक्षा मंत्रालय। यह संस्थागत कमजोरी ही असली विवाद है।
रोमिला थापर, कृष्ण कुमार जैसे शिक्षाविद् वर्षों से कहते रहे हैं कि पाठ्यपुस्तक निर्माण की प्रक्रिया को राजनीतिक और संस्थागत हस्तक्षेप से मुक्त करना होगा। जब तक एनसीईआरटी की वित्तीय स्वायत्तता नहीं होगी, नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं होगी और पाठ्यक्रम समितियों में विविध दृष्टिकोणों का प्रतिनिधित्व नहीं होगा-तब तक हर नई पुस्तक एक नए विवाद की संभावना लेकर आएगी। और भारत के कई करोड़ बच्चे इस अनिश्चितता का बोझ उठाते रहेंगे।
पाठ्य पुस्तकों में बदलाव का राजनीतिक इतिहास
साल 2014 से पहले भी एनसीईआरटी विवादों से अछूती नहीं थी। कांग्रेस, जनता पार्टी, राजग के पहले कार्यकाल यानी सभी के दौर में पाठ्य पुस्तकें राजनीति का अखाड़ा बनी रहीं। एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों पर विवाद साल 2014 के बाद की देन नहीं है। यह लड़ाई उतनी ही पुरानी है, जितनी एनसीईआरटी खुद-यानी साल 1961 से। जब भी केंद्र में सरकार बदली, पाठ्यपुस्तकें भी बदलीं। कभी वामपंथी पूर्वाग्रह हटाने, कभी भगवाकरण तो कभी गैर भगवाकरण के नाम पर। जानकारों ने इस तरीके को अबाध विवाद कहा है। एक ऐसा विवाद जो हर सरकार में नए रूप में लौटता है।
साल 1961-1977 : नींव और पहला विरोध
साल 1961 में स्थापना के बाद एनसीईआरटी ने रोमिला थापर, बिपन चंद्र, राम शरण शर्मा, सतीश चंद्र जैसे इतिहासकारों को पाठ्यपुस्तकें लिखने का काम सौंपा। इन पुस्तकों में भारतीय इतिहास को एक बहुलतावादी, धर्मनिरपेक्ष दृष्टि से प्रस्तुत किया गया। हिंदू-राष्ट्रवादी संगठनों ने इन्हें शुरू से ही मार्क्सवादी और मुसलिम-तुष्टीकरण वाला बताकर विरोध किया। यह वैचारिक तनाव तभी से चला आ रहा है।
साल 1977-1979 : जनता पार्टी- पहला औपचारिक हमला
साल 1977 में मोरारजी देसाई सरकार के तीन माह के भीतर नानाजी देशमुख (पूर्व जनसंघ नेता और जनता पार्टी के महासचिव) ने प्रधानमंत्री को एक ज्ञापन सौंपा। निशाने पर थीं : रोमिला थापर की मिडिवल इंडिया, बिपन चंद्र की माडर्न इंडिया, फ्रीडम स्ट्रगल (त्रिपाठी, डे, चंद्र) और कम्युनिलिज्म एंड राइटिंग आफ इंडियन हिस्ट्री। पुस्तकें उस समय नहीं बदलीं क्योंकि जनता पार्टी की सरकार साल 1979 में ही गिर गई, लेकिन सत्ता और पाठ्यपुस्तक के बीच टकराव की परंपरा औपचारिक रूप से शुरू हो गई।
साल 1998-2004 : वाजपेयी युग
साल 1998-2004 राजग सरकार, मानव संसाधन मंत्री : मुरली मनोहर जोशी। एनसीएफ 2000 के तहत एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों में व्यापक बदलाव किए गए। सिंधु घाटी सभ्यता को सिंधु-सरस्वती सभ्यता कहा गया, आर्यों को मूल निवासी बताया गया। वैदिक गणित और आयुर्वेद पाठ्यक्रम में जोड़े गए। इतिहासकार मक्खन लाल की नई पुस्तकों पर भारतीय इतिहास कांग्रेस ने 130 पृष्ठ की रपट में सैकड़ों तथ्यात्मक गलतियां गिनाईं। 200 से अधिक इतिहासकारों ने इसे भगवाकरण कहकर विरोध किया। भाजपा का तर्क था कि वह पाठ्यक्रम को कांग्रेस और कम्युनिस्ट एकाधिकार से मुक्त कर रही है।
साल 2004-2014 : यूपीए में गैर भगवाकरण व नई समस्या
साल 2004 में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने सत्ता संभालते ही राजग के सभी बदलाव उलट दिए। कृष्ण कुमार को एनसीईआरटी निदेशक बनाया गया, जिन्होंने एनसीएफ 2005 के जरिए पाठ्यक्रम को विचारधारा से शिक्षाशास्त्र की ओर मोड़ने की कोशिश की। लेकिन जल्दबाजी में गैर भगवाकरण की प्रक्रिया में उर्दू संस्करण समय पर तैयार नहीं हो सके, जिससे उर्दू माध्यम के छात्र प्रभावित हुए। साल 2006 में एनसीईआरटी ने कक्षा 12 की माडर्न इंडिया में एक अनुच्छेद बदला, जिस पर सिख संगठनों ने आपत्तिजनक बताकर विरोध किया था। साल 2012 में कक्षा 11 की राजनीति विज्ञान पुस्तक में नेहरू को व्यंग्यात्मक कार्टून में दिखाने पर आरपीआइ के रामदास आठवले ने पुस्तक की प्रतियां जलाईं-यह वही पुस्तक थी जो साल 2006 से पढ़ाई जा रही थी।
तुलना : तब और अब में क्या फर्क है?
जानकारों ने इस तौर-तरीके को विस्तार से दर्ज किया है। साल 1977 और 1998-2004 के बदलाव मुख्यत: इतिहास की व्याख्या को लेकर थे और उनका विरोध इतिहासकारों की समिति के माध्यम से संभव था। साल 2004 में सरकार बदलते ही वे बदलाव पलट दिए गए। वर्ष 2014 के बाद के बदलावों की तीन विशेषताएं अलग हैं। पहली-गति और व्यापकता : साल 2022-23 में एक साथ 30 फीसद से अधिक सामग्री बदली गई। दूसरी- विविधता: केवल इतिहास नहीं, विज्ञान (डार्विन), राजनीति (नेहरू, आजाद) और संविधान (प्रस्तावना) तक पहुंचा बदलाव। तीसरी-प्रक्रिया : एक पड़ताल में पाया गया कि कई बदलाव एनसीईआरटी की अपनी अकादमिक समिति की प्रक्रिया से बाहर हुए। साल 2026 में न्यायपालिका वाला विवाद इसलिए और अलग है क्योंकि पहली बार बदलाव न राजनीतिक दबाव से हुआ, न विचारधारा से, बल्कि लोकतंत्र के एक अंग, न्यायपालिका ने सीधे हस्तक्षेप कर पाठ्यसामग्री बदलवाई। यह उस 65 साल पुरानी लड़ाई में एक नया मोर्चा है।
बदलती सरकारें, एक ही समस्या
एनसीईआरटी का इतिहास बताता है कि पाठ्यपुस्तकों में सत्ता का हस्तक्षेप कोई एक दल या एक विचारधारा की विशेषता नहीं है। जनता पार्टी, राजग और यूपीए, इन तीनों ने इस संस्था को अपने-अपने तरीके से प्रभावित किया। फर्क यह है कि हर बार विरोध करने वाले और बदलाव करने वाले बदल जाते हैं। जो आज सत्ता में होते हैं वे इतिहास सुधार कहते हैं, जो विपक्ष में होते हैं वे विकृति कहते हैं। असली जरूरत इस चक्र को तोड़ने की है और यह तभी होगा जब एनसीईआरटी को सही मायनों में स्वायत्त बनाया जाए, वित्तीय रूप से, नियुक्तियों में और अकादमिक प्रक्रिया में।
‘यह न्यायपालिका को बदनाम करने के इरादे से किया गया’
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की आठवीं कक्षा के सामाजिक विज्ञान पाठ्यक्रम में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर अध्याय होने को लेकर बुधवार को कड़ी आपत्ति जताई, जिसके बाद एनसीईआरटी ने विवादित पाठ्यपुस्तक को अपनी वेबसाइट से हटा दिया। एनसीईआरटी ने ‘अनुचित सामग्री’ शामिल करने के लिए माफी मांगी और कहा कि त्रुटि अनजाने में हुई। विवाद के बाद शिक्षा मंत्रालय ने एनसीईआरटी को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित विवादास्पद पाठ्यपुस्तक का वितरण रोकने का निर्देश दिया है। साथ ही कहा है कि पाठ्यपुस्तक को संबंधित अधिकारियों से परामर्श के बाद दोबारा लिखा जाएगा।
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक सिंघवी द्वारा मामले का, तत्काल विचार करने के लिए उल्लेख किए जाने के बाद, प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति जायमाल्य बागची और विपुल एम पंचोली की पीठ ने एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका के बारे में आपत्तिजनक सामग्री का स्वत: संज्ञान लिया।
एनसीईआरटी की आठवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में कहा गया है कि भ्रष्टाचार, बड़ी संख्या में लंबित मामले और काफी संख्या में न्यायाधीशों की कमी न्यायिक प्रणाली के समक्ष पेश आने वाली चुनौतियों में शामिल हैं। न्यायालय ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि वह धरती पर किसी को भी न्यायपालिका की सत्यनिष्ठा को धूमिल करने की अनुमति नहीं देगा। इसके बाद, एनसीईआरटी ने पाठ्यपुस्तक को अपनी वेबसाइट से हटा दिया। सूत्रों का कहना है कि सरकार पाठ्यक्रम में विवादास्पद संदर्भों से काफी नाराज है।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद की कक्षा आठ की उस किताब पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया, जिसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर एक अध्याय शामिल है। न्यायालय ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि यह न्यायपालिका को बदनाम करने के इरादे से की गई सुनियोजित साजिश है। साथ ही अदालत ने भ्रष्टाचार पर अध्याय से संबंधित कक्षा आठ की सभी किताबों, उनकी प्रतियों और डिजिटल स्वरूपों को जब्त करने का आदेश दिया। इस मामले में कोर्ट ने शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा सचिव और एनसीईआरटी निदेशक को कारण बताओ नोटिस जारी किया। अदालत ने पूछा कि उनके खिलाफ अवमानना अधिनियम या किसी अन्य कानून के तहत कार्रवाई क्यों न की जाए।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि उन्होंने ऐसा आघात किया है, जिससे न्यायपालिका आहत हुई है। पीठ ने एनसीईआरटी के निदेशक और विद्यालय शिक्षा विभाग के सचिव को कारण बताओ नोटिस जारी किया और उनसे पूछा कि जिम्मेदार लोगों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों शुरू नहीं की जानी चाहिए। एनसीईआरटी के बुधवार के पत्र का जिक्र करते हुए प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि यह (पत्र) अपने आप में गहरी साजिश को दर्शाता है, एक सुनियोजित साजिश।
पीठ ने कड़े शब्दों में कहा कि ऐसा लगता है कि न्यायपालिका को कमजोर करने और उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाने की ‘सोची-समझी साजिश’ रची जा रही है। पीठ ने चेतावनी दी कि अगर उसके निर्देशों का किसी भी तरह से उल्लंघन किया गया तो गंभीर कार्रवाई की जाएगी।
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सुप्रीम कोर्ट के क्लास 8 की सोशल साइंस की टेक्स्टबुक को जब्त करने का आदेश दिया है। इस टेक्स्टबुक में ज्यूडिशियरी में करप्शन का ज़िक्र था। वहीं नेशनल काउंसिल ऑफ़ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) ने शुक्रवार को ऑफिशियली लोगों और इंस्टीट्यूशन से इसकी सभी प्रतियां वापस करने और उससे जुड़ा डिजिटल कंटेंट डिलीट करने को कहा। सुप्रीम कोर्ट के टेक्स्टबुक को जब्त करने का आदेश दिया। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
