भाजपा में संगठन से लेकर राज्यों की राजनीति तक बदलाव की आहट दिखाई दे रही है। नितिन नवीन की टीम में सुनील बंसल की मजबूत भूमिका चर्चा में है तो पंजाब में भाजपा और अकाली दल के रिश्तों को लेकर नए समीकरण बन रहे हैं। महंगी चीनी और एथेनॉल का मुद्दा विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका दे रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जयंत चौधरी और अखिलेश यादव के बीच बयानबाजी तेज है। इसी बीच राज्यपालों में बदलाव की चर्चा भी है।
बंसल की योजना
नितिन नवीन की टीम में सुनील बंसल शक्तिशाली महामंत्री बनकर उभरे हैं। वे पहले भी पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री थे। संघ से भाजपा में आए हैं। अमित शाह पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री बने और उत्तर प्रदेश के प्रभारी थे तो वे ही सुनील बंसल को यहां लाए थे। लोकसभा चुनाव के बाद अमित शाह 2014 में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने तो सुनील बंसल को राकेश जैन की जगह उत्तर प्रदेश में पार्टी का संगठन महामंत्री बना दिया गया। योगी सरकार के 2017 के पहले कार्यकाल में सुनील बंसल का खासा जलवा था। चर्चा थी कि उत्तर प्रदेश की सरकार सुनील बंसल ही चला रहे हैं। बाद में उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय महामंत्री बना दिया गया। पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत का श्रेय भी उन्हें ही दिया जाता है। आम तौर पर भाजपा में आरएसएस से आने वाले प्रचारक चुनाव लड़ते भी नहीं। पर वे चाहें तो राज्यसभा के सदस्य तो बन ही सकते हैं। उनके करीबी कहते हैं कि उनकी इच्छा सांसद बनने की जगह पार्टी का राष्ट्रीय संगठन महासचिव बनने की है। यह पद आरएसएस के प्रचारक को ही दिया जाता है। जो खुद चुनाव नहीं लड़ता। अभी बीएल संतोष भाजपा के संगठन महासचिव हैं। वे कर्नाटक के हैं। जिस तरह नरेंद्र मोदी भाजपा के संगठन महासचिव से 2001 में सीधे गुजरात के मुख्यमंत्री बन गए थे, संतोष भी कुछ इसी तरह की हसरत रखते बताए जाते हैं। यानी मौका मिला तो वे कर्नाटक की सरकार चलाना चाहेंगे।
राजनीतिक समरसता!
पंजाब के पूर्व उप मुख्यमंत्री और अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल पिछले दिनों दिल्ली आकर प्रधानमंत्री से मिले थे। इसके बाद महाराष्ट्र के नांदेड़ में सुखबीर बादल पर हमला हो गया। तब से पंजाब की सियासत में भूचाल आया हुआ है। बादल की सांसद पत्नी हरसिमरत कौर बादल ने घटना की एनआइए से जांच की मांग की है। फिलहाल बादल परिवार के प्रति भाजपा का पूरा सदभाव है। एक तरफ भाजपा तालमेल की रणनीति पर काम कर रही है तो दूसरी तरफ सभी 117 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की बात भी पार्टी के कई नेता कर रहे हैं। दलित मतदाताओं पर फोकस है। प्रधानमंत्री अपने पंजाब दौरे में रविदासी समुदाय के डेरा सचखंड बलां भी इसी मकसद से गए थे। दलितोें को लुभाने के प्रयास के तौर पर भाजपा पंजाब में पांच अक्तूबर से सामाजिक समरसता यात्रा शुरू करेगी।
महंगी चीनी पर मधुमेह का तर्क
देश में चीनी के दाम बढ़ने के बाद तरह-तरह के तर्क सामने आ रहे हैं। जहां एक ओर बिहार के एक नेता ने कहा है कि चीनी के दाम बढ़ने से कोई असर नहीं होगा, क्योंकि वैसे भी मधुमेह के मरीजों की संख्या में इजाफा हो रहा है। लोग कम ही चीनी का प्रयोग कर रहे हैं। दूसरी ओर इसके पीछे नया तर्क एथेनाल को भी लेकर सामने आ रहा है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि गन्ने से एथेनाल बनाने के कारण चीनी महंगी हो गई है। विपक्ष इस मसले को लेकर सत्ता पक्ष पर हमलावर हो गया है। चीनी महंगी होने की कई वजहें हैं लेकिन सरकार के लिए एथेनाल का मुद्दा पहले ही मुसीबत बन चुका है। अब त्योहारी मौसम में महंगी चीनी ने एक बार फिर से एथेनाल पर हंगामा बरपा दिया है।
चवन्नी पर चर्चा
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इन दिनों जयंत चौधरी के समर्थक सपा के मुखिया अखिलेश यादव पर हमले कर रहे हैं। अखिलेश ने एक साक्षात्कार में जयंत चौधरी का नाम लिए बिना कह दिया था कि पिछले विधानसभा चुनाव में जिनकी हैसियत चवन्नी की थी, उन्हें समाजवादी पार्टी ने रुपया बना दिया था। संकेत उनका जयंत चौधरी की तरफ ही रहा होगा। दरअसल 2017 के विधानसभा चुनाव में रालोद को उत्तर प्रदेश में केवल एक सीट पर सफलता मिली थी। तब अजित सिंह भी जीवित थे। लेकिन 2022 का विधानसभा चुनाव जयंत चौधरी ने सपा के साथ मिलकर लड़ा था। नतीजतन उन्हें नौ सीटों पर सफलता मिल गई थी। हालांकि अखिलेश ने जयंत को 33 सीटें दी थीं। पर जीत का उनका औसत सपा से कम रहा था। इसके बाद राज्यसभा चुनाव हुआ तो अखिलेश ने अपनी पत्नी डिंपल यादव का टिकट काट कर उनकी जगह जयंत चौधरी को राज्यसभा भेज दिया था। जबकि एक राज्यसभा सीट के लिए न्यूनतम 34 विधायकों का समर्थन जरूरी था। जयंत चौधरी बाद में 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले सपा से नाता तोड़ भाजपा के साथ चले गए। राज्यसभा के सदस्य थे तो मंत्री भी बन गए। भाजपा ने उत्तर प्रदेश सरकार में भी उनकी पार्टी को एक मंत्रिपद दे दिया। जयंत चौधरी के समर्थक अब गड़े मुर्दे उखाड़ रहे हैं और याद दिला रहे हैं कि उनके पिता मुलायम सिंह यादव को राजनीति में जयंत के दादा चरण सिंह ने ही आगे बढ़ाया था।
बारी राज्यपालों की
नितिन नवीन की टीम बन गई है। चर्चा है कि अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने मंत्रिमंडल में फेरबदल करेंगे। लेकिन उससे पहले कुछ राज्यपालों की नियुक्तियां भी होनी हैं। कुछ राज्यपाल हटाए भी जाएंगे। राजभवन को भाजपा ने लोकभवन नाम दे दिया है। बदलाव की शुरुआत उत्तर प्रदेश से हो सकती है। आनंदी बेन पटेल कुछ महीने बाद 85 साल की हो जाएंगी। वे पिछले सात साल से देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की राज्यपाल हैं। इससे पहले डेढ़ साल तक वे मध्य प्रदेश की राज्यपाल भी रहीं। राज्यपाल का सामान्य कार्यकाल पांच वर्ष होता है। मोदी सरकार ने अमूमन राज्यपालों को पांच साल से ज्यादा वक्त दिया भी नहीं। चर्चा कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत को बदले जाने की भी है। वहां कांग्रेस की सरकार है और विधानसभा चुनाव में दो साल से भी कम समय बचा है। लिहाजा पार्टी के किसी तेज तर्रार नेता को वहां के लोकभवन में भेजा जाएगा। तमिलनाडु में भी नियुक्ति होनी है। कहा तो यह भी जा रहा है कि भाजपा के संसदीय बोर्ड से हटाए जाने वाले दो-तीन नेता भी राज्यपाल बनाए जाएंगे।
