भाजपा सांसद निशिकांत दुबे का कहना है कि नेता प्रतिपक्ष ऐसा होना चाहिए जो देश के अंदर सत्ता की आलोचना करे लेकिन विदेश में देश की सरकार का साथ दे। इतिहास के हवालों से वे सत्ता पक्ष के राहुल-केंद्रित हमले को जायज ठहराते हैं। उनका आरोप है कि भारत का संविधान अल्पसंख्यकों को पहले दर्जे तो हिंदुओं को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाता है। संस्थानों पर हमले को नकारते हुए कहते हैं कि फोर्ड फाउंडेशन को लोदी रोड में घर कांग्रेस ने दिया। दुबे ने कहा कि संविधान ने कानून बनाने का काम सिर्फ संसद को सौंपा है। न्यायपालिका सिर्फ उसकी व्याख्या कर सकती है। उन्होंने दावा किया कि युवा वर्ग सत्ता-पक्ष के साथ है। निशिकांत दुबे के साथ कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज की बातचीत के चुनिंदा अंश।

बात की शुरुआत आपके संसदीय क्षेत्र से। आप गोड्डा से चौथी बार सांसद हैं। चौथी बार के सांसद के तौर पर बताएं आपने गोड्डा को क्या दिया? क्या चुनौतियां रहीं?
निशिकांत दुबे:
2009 में मैं गोड्डा के लिए नामांकन करने गया तो मुझे देवघर से जाने में साढ़े पांच घंटे लगे। यह महज 85 से 90 किलोमीटर की दूरी थी। आज यहां पहली फोरलेन सड़क बन चुकी है और देवघर से आप नब्बे मिनट में पहुंच जाएंगे। पहले यहां ट्रेन सिर्फ कोयला ढोने के लिए होती थी। आज यहां से देश के लगभग सभी क्षेत्रों में जाने के लिए प्रीमियर से लेकर लोकल ट्रेन चलती है। यहां अडाणी का संयंत्र चल रहा है। गर्भवतियों के लिए एंबुलेंस और अस्पताल है। नवोदय विद्यालय, केंद्रीय स्कूल है। झारखंड के सबसे बड़े नेता हुए शिबू सोेरेन। दुमका का कुछ हिस्सागुरु जी का रहा। वे लगभग चालीस साल वहां के सांसद रहे। आज आप वहां की जनता से पूछिए कि उन्होेंने क्या दिया? वोट बैंक की राजनीति ने उनकी मदद की। गोड्डा का आधा भाग मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का है, जहां के लिए रेलवे लाइन नहीं है। हमारी रघुवर दास की सरकार ने रेल-लाइन लाने का लक्ष्य रखा। लेकिन सरकार में आते ही हेमंत सोरेन ने कहा, वे अपना पचास फीसद हिस्सा नहीं देंगे। इस प्रकार की भावना के साथ विकास कैसे होगा?

सूबे में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्या हालात हैं। पुनर्वास भी एक मुद्दा है।
निशिकांत दुबे: स्कूल में शिक्षक नहीं हैं। उच्च शिक्षा में सेमेस्टर सही समय पर पूरा नहीं हो रहा है। आदिवासी समुदाय बीमारियों से जूझ रहा है। मैं निजी मेडिकल कालेज खोलने के लिए चार साल से लड़ाई लड़ रहा हूं। अपने क्षेत्र में मुझे एंबुलेंस सेवा शुरू करनी पड़ी है। धनबाद मेंं कोयले की चोरी रोकने के लिए गृहमंत्री को बैठक लेनी पड़ी। जसीडीह में अमृत भारत का स्टेशन सिर्फ इसलिए नहीं बन पा रहा है क्योंकि वहां सात एकड़ जमीन के लिए राज्य सरकार प्रति एकड़ 60 करोड़ रुपए मांग रही है।

आप 2014 के पहले भी सांसद रहे हैं। क्या यूपीए सरकार की कुछ अच्छी यादें हैं?
निशिकांत दुबे:
उस वक्त जो वित्त मंत्री थे, जो बाद में भारत के राष्ट्रप्रति हुए प्रणब मुखर्जी साहब, हम दोनों संयोग से गुरु भाई थे। श्यामाचरण लाहिड़ी के शिष्य थे भूपेंद्र सान्याल साहब, उन्हीं से उनके मां-पिताजी दीक्षित थे और वो हमारा आश्रम है। वे 2013 में मेरे यहां आए थे। उनके साथ अच्छा अनुभव था। उन्होंने संसदीय राजनीति को बेहतर बनाने के लिए बहुत सीख दी। दूसरे फारूख अब्दुल्ला साहब ने हमारे क्षेत्र को तब सौर ऊर्जा संयंत्र दिया, जब देश में इसकी धूम नहीं मची थी।देवघर मंदिर और बासुकीनाथ मंदिर के बीच 44 किलोमीटर की दूरी है। देवघर और बासुकीनाथ के रास्ते में सोलर स्ट्रीट लाइट लगाने का काम हुआ। यूपीए में सब कुछ खराब नहीं था। काम करने वाले लोग उस समय भी थे।

आपने बजरिए प्रणब मुखर्जी संसदीय राजनीति की बात कही। अभी जो संसद का हाल है उसे देखते हुए क्या और किस तरह की बेहतरी हो सकती है?
निशिकांत दुबे:
मैंने अभी एक चिट्ठी जारी की थी। इरफान हबीब जो बहुत बड़े इतिहासकार हुए उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली थी। जब उन्हें वजीफे पर विदेश भेजना था तो कुलपति जाकिर हुसैन ने इस मामले में दखल दी थी। तब इस बाबत नेहरू जी ने चिट्ठी लिख कर कहा था कि सरकारी वजीफा देने के लिए व्यक्ति की विश्वसनीयता और वस्तुनिष्ठा जरूरी है। देश के बाहर जाकर कोई आदमी देश के बारे में गलत बात कहे, उसे वजीफा देना मुश्किल है। आगे भी विद्वानों ने कहा कि विपक्ष का नेता वही होगा जो देश के अंदर भारत सरकार की नीति की आलोचना करेगा। लेकिन जब देश के बाहर जाएगा तो उसे भारत सरकार की सोच को मजबूत रखना है। अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर नरेंद्र मोदी तक की यही सोच रही है। आज हमारे नेता प्रतिपक्ष बाहर जाकर इल्हान उमर और रो खन्ना जैसे लोगों से बात करते हैं। सैम पित्रोदा का संगठन सोरोस, राकफेलर और फोर्ड फाउंडेशन से फंड लेता है। इस तरह के विपक्ष में, या इस तरह के माहौल में जहां केवल विरोध करने के लिए, विरोध करना है, देश कहीं नहीं खड़ा होता है।

लेकिन यह बात सभी विपक्षी दलों के साथ सटीक नहीं है। विपक्ष का मतलब सिर्फ कांग्रेस नहीं है। आपरेशन सिंदूर के वक्त गए थे विपक्ष के नेता विदेश की धरती पर। सभी ने एक सुर के साथ रखी थी सरकार की सोच पूरी दुनिया के सामने। कांग्रेस के नेता शशि थरूर की आवाज भी थी शामिल।
निशिकांत दुबे:
नेता प्रतिपक्ष का व्यवहार मायने रखता है। जैसे अभी मलेशिया के प्रधानमंत्री आए थे तो वो मिले थे विपक्ष के नेता से। यदि वे भारत के बारे में गलत बातें कहेंगे तो क्या प्रभाव पड़ेगा?

आरोप है कि समारोह में विपक्ष के प्रतिनिधियों को आमंत्रित नहीं किया गया।
निशिकांत दुबे:
ऐसा नहीं है। हमने मुख्यमंत्री को भी बुलाया था, नेता प्रतिपक्ष को भी बुलाया था। उन्हें बुलाते हैं, लेकिन वे आते नहीं हैं। उनके पास समय नहीं है। तीस दिन में उन्हें दस-पंद्रह दिन कहीं बाहर जाना ही पड़ता है।

सरकार और भाजपा का सारा हमला राहुल गांधी पर ही केंद्रित क्यों होता है?
निशिकांत दुबे:
इसलिए कि कोई दूसरा चेहरा दिखाई नहीं देता है जो ‘अंट-शंट’ बोलता है। उनको समझाने के लिए कुछ तो करना पड़ता है। राहुल जी अलग तरह के हैं। अगर मेरे जैसे व्यक्ति को संसद के अंदर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी में से किसी एक को चुनना हो तो प्रियंका गांधी को चुनूंगा। क्योंकि वे उनसे बेहतर हैं।

आपको जो दिक्कत राहुल गांधी से है, वैसी लेखिका अरुंधति राय से क्यों नहीं है? अरुंधति राय भारत ही नहीं पूरे विश्व की व्यवस्था के विरोध में लिखती हैं, बोलती हैं।
निशिकांत दुबे:
अरुंधति राय को हमसे ज्यादा पी चिदंबरम साहब ने परेशान किया। आप देख लीजिए कि अरुंधति राय को पुरस्कार मिलने के बाद क्या हुआ। चिंदबरम साहब के बयान को देख लीजिए। गृहमंत्री के तौर पर अरुंधति राय के वही सबसे विरोधी रहे। जो भी भारतीय विदेश जाकर देश के खिलाफ बात करेगा तो उस समय की जो भी सत्ता होगी उसकी विरोधी होगी।

संसद में आप सरकार के मुख्य प्रवक्ता हैं। सरकार को जिस मुद्दे पर भी देशव्यापी बहस चलानी होती है, उसे आपके हवाले किया जाता है। ऐसा ही मुद्दा है वक्फ बोर्ड का। वक्फ बोर्ड एक सांस्कृतिक ऐतिहासिक घटना का हिस्सा बना। इतिहास के इस हिस्से से इतनी दिक्कत क्यों है?
निशिकांत दुबे:
कुछ चीजें ध्यान में होनी चाहिए। वक्फ पैगंबर मोहम्मद ने शुरू किया। आपको पता है कि पहला वक्फ मुसलमान ने नहीं किया? यहूदी ने किया। अपनी इच्छा से वक्फ होगा न! 1946-47 में पाकिस्तान के लोग भारत में आ गए और भारत के लोग पाकिस्तान चले गए। जो पाकिस्तान चले गए उनके लिए संपत्ति कानून बनाया गया। उन्होंने पाकिस्तान पहुंच कर उसे वक्फ कर दिया। भोपाल की जो सैफ अली खां की नानी की बड़ी बहन रानी थी, वो चली गईं 1947 में। वहां जाकर अपनी संपत्ति को वक्फ कर दिया। वक्फ अमेंडमेंट एक्ट को दुबारा 2012 में पी चिदंबरम लेकर आए। वक्फ समस्या नहीं है। वक्फ अच्छी चीज है। लेकिन वक्फ की आड़ में आप टैक्स बचाना चाहते हैं। इसकी आड़ में शत्रु-संपत्ति को अपना बताएंगे, हमारे सफदरजंग मकबरे जैसे ऐतिहासिक स्मारकों, अजमेर शरीफ पर कब्जा कर लेंगे। यहां तो सबकी आस्था जुड़ी है। आप इस्लाम को मानते हैं तो आपको मजार नहीं मानना चाहिए। तो चाहे वो किसी ऋषि का आश्रम हो या चरार ए शरीफ, ये सब आपने कहा वक्फ की संपत्ति है। कैसे मुसलमान हो भाई? हम इस देश को इस देश के हिसाब से चलाना चाहते हैं। इसलिए वक्फ अमेंडमेंट एक्ट आया और इसका सबको स्वागत करना चाहिए। इस देश को इस देश के हिसाब से ही चलना होगा। यह एक बहुत जरूरी सुधारात्मक प्रक्रिया है सरकार की।

आरोप है कि भाजपा नेताओं के द्वारा मुसलिम पहचानों का इसलिए विरोध किया जाता है ताकि हिंदु वोटों का ध्रुवीकरण किया जा सके। उत्तर प्रदेश से लेकर बंगाल तक यह दिखा भी।
निशिकांत दुबे:
संविधान के कई अनुच्छेद इस देश में मुसलमानों को अल्पसंख्यक नहीं मानते हैं। संविधान मुसलमान या अल्पसंख्यक को प्रथम दर्जे का नागरिक मानता है। और जो हिंदू बहुसंख्यक हैं उनको दोयम दर्जे का नागरिक मानता है।

वाकई…आपके इस दावे पर आश्चर्य करना चाहूंगा। पूछना चाहूंगा कैसे?
निशिकांत दुबे:
मैं और आप मिलकर एक स्कूल खोलते हैं। उस स्कूल में ईडब्लूएस का दाखिला होगा या नहीं, यह भारत का संविधान तय करेगा। उस स्कूल में शिक्षक की नियुक्ति के नियम-कानून भी बने हुए हैं। अगर मैं मेडिकल कालेज खोलूं तो उसमें दाखिला नीट की परीक्षा से तय होगा। लेकिन…यह कोई मुसलमान खोलेगा तो उस पर नीट लागू नहीं होता है। शुल्क का सौ फीसद ढांचा मुसलमान तय करेगा। इसलिए समान नागरिक संहिता का विरोध कर रहे हैं। हमारे यहां संथाल परगना में 1951 में 45 फीसद आदिवासी थे आज 22 से 23 फीसद हैं। मुसलमान नौ फीसद थे आज वे 27 फीसद हैं। वजह वही स्पेशल मैरिज एक्ट है, जिसमें धर्म परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है। ठीक है कि आपने धर्म परिवर्तन नहीं किया, आपके बच्चे तो कानून के हिसाब से पिता के धर्म में जाएंगे न। जल, जंगल, जमीन, बेटी और रोटी सभी पर वे लोग कब्जा कर रहे हैं। सवाल यह है कि क्या यह देश सभी का है या केवल मुसलमानों का है।

अल्पसंख्यकों से भेदभाव के आरोप पर आप कहते हैं कि मुफ्त राशन से लेकर सभी जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ देश के सभी मुसलमानों को मिलता है। लेकिन भाजपा के मुख्यमंत्री कहते हैं कि मुसलमान हमें वोट नहीं करते, इससे आगे बढ़ कर यह भी कहते हैं कि हमें उनका वोट चाहिए ही नहीं। क्यों नहीं चाहिए उनका वोट?
निशिकांत दुबे: मैं आपको 2024 के चुनाव की बात बताता हूं। अपने लोकसभा के क्षेत्र मधुपुर में प्रचार करने पहुंचा। एक मोहल्ले में बीस-बाइस लोग आए। छह महीने के बच्चे से लेकर अस्सी साल के बुजुर्ग तक। सब एक ही परिवार के। बड़े बुजुर्ग साहब एक महिला को लेकर आए और बोले, ये फातिमा है। इसकी जान आपने बचाई। प्रधानमंत्री राहत कोष से आपने 12 लाख रुपए दिए और उसमें दो लाख कम पड़ने पर आपने अपनी जेब से दो लाख और दिए। ये अब बच गई। लेकिन हम आपसे माफी मांगने आए हैं कि हम आपको वोट नहीं देंगे। आपको वोट देने के बाद ये समाज हमें बहिष्कृत कर देगा। जब ऐसी स्थिति होगी तो कोई क्या कर सकता है। ऐसी स्थिति बना दी गई है कि अल्पसंख्यक वर्ग चाह कर भी हमें वोट नहीं दे सकता है। अब और क्या कहूं…।

आप हर मुद्दे पर बेबाकी से अपनी बात रखते हैं। आप उन गिने-चुने नेताओं में हैं जिन्होंने न्यायपालिका को भी कठघरे में रखा। आप कायम हैं अपने उन बयानों पर?
निशिकांत दुबे:
न्यायपालिका का अपना स्थान है और लोगों को उस पर भरोसा है। ज्यादातर फैसलों में आम लोगों को राहत मिलती है। लेकिन जब किसी आतंकवादी को छोड़ने के लिए रात ढाई बजे कोर्ट खुल जाए तो तकलीफ होगी न। संविधान ने कानून बनाने का अधिकार संसद को दिया है, न्यायपालिका उसकी व्याख्या करती है। जिस दिन यह व्यवस्था खत्म होगी संसद और संविधान खत्म हो जाएगा। एनजेएसी हमने लाया तो आप कहते हैं उसे फेंक दो। इसे लेकर इन्हें, हमें, आपको सभी को गाली पड़ती है। मैं न्यायपालिका की बहुत इज्जत करता हूं। मेरा तो यह मानना है कि इस देश में न्यायपालिका और प्रेस नहीं रहे तो राजनेता और नौकरशाह मिल कर सब कुछ खत्म कर देंगे। लेकिन हर किसी को अपने दायरे में रहना है। संसद का दायरा भी संविधान का दिया हुआ है।

आपकी सरकार पर संस्थाओं को ध्वस्त करने के आरोप लगते रहे हैं। संस्थाओं पर सत्ता का वर्चस्व चुनावी मुद्दा भी बन चुका है।
निशिकांत दुबे:
क्या बात करते हैं? संस्थाओं को बर्बाद हमने किया है? चलिए बताता हूं…। इसी देश में बिना वकालत की डिग्री के कैलाशनाथ वांचू साहब प्रधान न्यायाधीश हो चुके हैं। बहारुल इस्लाम साहब कांग्रेस से राज्यसभा के सदस्य हुए। फिर वो हाई कोर्ट के जज और चीफ जस्टिस हो गए। वे सेवानिवृत्त हुए और फिर से सुप्रीम कोर्ट के जज हो गए। सुप्रीम कोर्ट के जज से सेवानिवृत्त हुए तो फिर राज्यसभा के सदस्य बने। हमने संस्थानों को खत्म किया? एफसीआरए एक्ट में राकफेलर फाउंडेशन ने पूरा इंडिया इंटरनेशनल सेंटर बना दिया। सोचिए जरा, विदेशी पैसे से यहां क्लब बना। फोर्ड फाउंडेशन को आपने लोदी रोड में घर दे दिया। सुभद्रा जोशी कांग्रेस की उम्मीदवार थीं, उन्होंने आधिकारिक रूप से कहा कि सोवियत रूस ने दस लाख रुपए दिए और मैं चुनाव लड़ी। आप बताइए किसने संस्थानों को खत्म किया?

सीबीआइ, ईडी जैसी संस्थाओं के दुरुपयोग के आरोप भी लगे हैं।
निशिकांत दुबे:
ये सिर्फ पकड़े जाने पर हल्ला मचाने की बातें हैं। किसी भी संस्था का कोई दुरुपयोग नहीं किया गया है।

हर तरफ सवाल उठते हैं कि भाजपा के या सत्ता-पक्ष से जुड़े किसी बड़े नेता पर ईडी का छापा नहीं पड़ता है।
निशिकांत दुबे:
क्योंकि सत्ता पक्ष के लोग शोर नहीं मचाते हैं। जो आरोप लगते हैं उसका मुकम्मल कागजातों के साथ जवाब देते हैं। मुझे, मेरी पत्नी को, मेरे कई रिश्तेदार को आयकर विभाग के नोटिस मिले हैं। हमने उनका जवाब दिया है। अब आते हैं बड़े नेता की बात पर। जीएम सिद्धेश्वर राजग सरकार में मंत्री थे। कर्नाटक के बहुत बड़े नेता हैं। इनके यहां ईडी के छापे पड़े। आपकी कमाई पचास हजार है और आप एक करोड़ की खरीदारी करेंगे तो सवाल उठेंगे ही।

आपने एक अहम बहस छेड़ी थी, संसद में प्रायोजित सवालों को लेकर। इसने एक बड़ी चिंता भी पैदा की थी। आप इस समस्या को किस तरह से देखते हैं।
निशिकांत दुबे:
यह समस्या है, और इसका हल वही है जो संसद ने निकाला। दोषी सांसद को संसद से बाहर किया।

महुआ मोइत्रा को लेकर कोई व्यक्तिगत मनमुटाव अब भी है?
निशिकांत दुबे:
नहीं, नहीं…व्यक्तिगत संबंध अलग होते हैं। मेरी पत्नी को चाहिए थी ढकई साड़ी। अभी महुआ मोइत्रा ने मुझे डेढ़ महीना पहले कई मैसेज भेजे कि ढकई साड़ी कहां अच्छी मिलती है। गलती के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए, लेकिन व्यक्तिगत संबंध अलग हैं।

उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे अहम राज्यों में चुनाव होने हैं। क्या महंगाई और जेन-जी से दूरी जैसे मुद्दे प्रभावित करेंगे?
निशिकांत दुबे:
महंगाई काबू में है। जेन-जी मोदी जी के साथ है।