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V.P. Singh: पुश्तैनी जमीन दान कर बस से चुनाव प्रचार करने जाते थे ‘राजा ऑफ मांडा’

उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव लड़ते हुए वी.पी. सिंह ने अपने कार्यकर्ताओं से अपील की थी कि चुनाव प्रचार में जीप का इस्तेमाल न कर साइकिल और बाइक से जाकर लोगों से मिलें।

ब्रिटिश मंत्री नॉर्मन टेबिट (बाएं) के साथ विश्वनाथ प्रताप सिंह (दाएं) (Photo Credit – Express Archive)

साल 1989 को आपातकाल के बाद का सबसे बुरा दौर कहा जाता है। केंद्र में राजीव गांधी की सरकार थी, जो बोफोर्स के हंगामे और कश्मीर की अशांति से हांफ रही थी। इस बीच सरकार एक मानहानि निरोधक कानून भी लेकर आ गयी, जिसके तहत कथित अश्लील व फूहड़ लेखन को अपराध बनाया जाना था। पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने इस कानून का जमकर विरोध किया। राजीव सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा। कानून वापस ले लिया गया। 1988 में सलमान रुशदी की चर्चित किताब ‘द सेनेटिक वर्सेस’ इंग्लैंड में प्रकाशित हुई। छपने के मात्र 9 दिन बाद ही सरकार ने इस किताब को देश की सुरक्षा और देश की शांति का हवाला देते हुए बैन कर दिया। शाह बानो केस के बाद इस मामले ने राजीव गांधी को बहुसंख्यकों और प्रगतिशील वर्ग दोनों के बीच संदिग्ध बना दिया।

इस घटना के एक साल बाद देश 1989 के आम चुनाव में पहुंचा। राजीव गांधी खिलाफ चल रही लहर में एक नारा, जिसकी तुकबंदी बहुत सरल थी, लोगों की ज़बान पर चढ़ गया – ”राज नहीं फकीर है, देश की तकदीर है” ये नारा गूंज रहा था उत्तर प्रदेश के मांडा रियासत के राजा रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह उर्फ वी.पी. सिंह के लिए। वरिष्ठ पत्रकार और लेखक रशीद किदवई अपनी किताब ‘भारत के प्रधानमंत्री’ में बताते हैं कि पांच भाइयों में सबसे छोटे विश्वनाथ प्रताप सिंह को पड़ोस के एक राजा ने गोद लिया था क्योंकि उस राजा का कोई बेटा नहीं था।

ईमानदार राजनीति की कोशिश : वी.पी. सिंह राजनीति में आए तो साफ छवि के नेता कहलाए। अपनी पुश्तैनी जमीन दान कर कांग्रेस में शामिल हो गए। एक किस्सा मशहूर है कि जब वी.पी. सिंह यूपी का विधानसभा चुनाव लड़ रहे थे, तो प्रचार के लिए बस से जाया करते थे। कार्यकर्ताओं से अपील की थी कि जीप का इस्तेमाल न कर साइकिल और बाइक से जाकर लोगों से मिलें। जनता को ‘राजा ऑफ मांडा’ का ये भाव व्यवहार पसंद आया।

1980 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो जनता से वादा किया कि राज्य से अपराध खत्म कर देंगे। इस दिशा में काम भी शुरू हुआ लेकिन तभी एक बड़ी घटना हो गयी। डकैत फूलन देवी (जो बाद में सांसद बनीं) ने अपने साथ हुए अन्याय का बदला लेने के लिए 16 लोगों की हत्या कर दी। वी.पी. सिंह ने इसे अपनी सरकार की असफलता मानी और पद  छोड़ दिया।

सिंह जब राजीव गांधी के कार्यकाल में केंद्रीय वित्त मंत्री बने तो टैक्स चोरी के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। सरकार असहज हो गई। सिंह का मंत्रालय बदल दिया गया। इस बार मिला रक्षा मंत्रालय। यहां भी वी.पी. सिंह ने अपना काम जारी रखा। उन्हें पनडुब्बियों की खरीदारी में कमीशनखोरी की भनक लगी। उन्होंने पीएम राजीव से सहमति लिए बिना जांच का आदेश दे दिया। केंद्र सरकार ने आपाधापी में एक दूसरा आदेश जारी कर वी. पी. सिंह के आदेश को रद्द किया। मांडा के राजा को यह नहीं जमा। उन्होंने न सिर्फ मंत्रालय से इस्तीफा दिया बल्कि कांग्रेस से भी बाहर हो गए।

दो मोर्चों पर जीतकर PM बने वी.पी. सिंह : 1989 के चुनाव में वी.पी. सिंह न सिर्फ कांग्रेस को मात दिया बल्कि अपने ही मोर्चा के बलिया वाले चंद्रशेखर को भी राजनीतिक पटखनी दी और देश के 7वें प्रधानमंत्री बन गए। सत्ता संभालने के बाद 1990 में वी.पी. सिंह ने एक ऐसा फैसला लिया कि देश में फिर एक नारा गूंजने लगा, ‘राजा नहीं रंक है, देश का कलंक है’

दरअसल वी.पी. सिंह ने सामाजिक न्याय की दिशा में साहसिक कदम बढ़ाते हुए मंडल आयोग की कुछ सिफारिशों को लागू कर दिया। इसके तहत देश के सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग, जिसकी आबादी 52% बतायी जाती है, उसके लिए 27% आरक्षण लागू कर दिया। इस फैसले के लिए सवर्ण समुदाय के एक वर्ग ने जहां वी.पी. सिंह को देश का कलंक कहा, वहीं दूसरी तरफ ओबीसी समाज ने सिंह को मंडल मसीहा माना।

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