राजस्थान हाई कोर्ट ने अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग के लिए मौजूदा 12 प्रतिशत आरक्षण में से भील समुदाय के लिए 9 प्रतिशत विशेष आरक्षण की मांग वाली याचिका के संबंध में राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया है। वहीं याचिकाकर्ताओं ने निर्णय होने तक एसटी वर्ग के अंतर्गत नियुक्तियों पर रोक लगाने की भी मांग की है।
हाई कोर्ट ने राजस्थान सरकार से पूछा है कि भील समुदाय को एसटी वर्ग के अन्दर अलग से आरक्षण क्यों न दिया जाए? याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए अधिवक्ता मनोज चौधरी ने अदालत में दावा किया कि भील समुदाय को एसटी आरक्षण का वास्तविक लाभ नहीं मिल रहा है। मनोज चौधरी याचिकाकर्ता ‘आदिवासी भील आरक्षण संघर्ष समिति’ की तरफ से पेश हुए।
याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट से कहा कि अनुसूचित जनजाति श्रेणी में शामिल विभिन्न समुदायों के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक पिछड़ेपन से संबंधित पर्याप्त आंकड़े आरक्षण लाभ निर्धारित करते समय इकट्ठे नहीं किए जाते हैं इसलिए कई समुदायों के संग न्यायसंगत लाभ नहीं पहुँचता है।
एसटी आरक्षण के अन्दर प्रतिनिधित्व का सवाल
याचिकाकर्ताओं का दावा है कि मीणा समुदाय को अनुसूचित जनजाति आरक्षण का बड़ा हिस्सा मिला है, लेकिन भील समुदाय को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। उन्होंने अनुसूचित जनजाति कोटे के भीतर उप-वर्गीकरण की मांग की है। याचिकारकर्ता चाहते हैं कि राजस्थान में एसटी समुदा के लिए आरक्षित 12 प्रतिशत आरक्षण में से 9 प्रतिशत हिस्सा भील समुदाय के लिए अलग से निर्धारित किया जाए।
याचिका में दावा किया गया है कि नेशनल एसटी आयोग ने बीते 25 फरवरी को अनुच्छेद 338A के तहत राजस्थान सरकार के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर एसटी श्रेणी के उप-वर्गीकरण और ‘पंजाब राज्य बनाम देवेंद्र सिंह’ में सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिए निर्णय को लागू करने को कहा था। इसके बावजूद एसटी श्रेणी का उप-वर्गीकरण नहीं किया गया है। राज्य सरकार के पास भील समुदाय के पिछड़ेपन के कोई ठोस आंकड़े नहीं हैं। साल 1931 के बाद भीलों के राज्य सेवाओं में प्रतिनिधित्व, शैक्षिक और आर्थिक स्थिति का कोई सर्वेक्षण नहीं किया गया है। बता दें कि भील समुदाय गरीबी रेखा से नीचे है, लेकिन उन्हें बीपीएल सहित अन्य योजनाओं में शामिल नहीं किया गया।
कितनी है एसटी आबादी?
2011 की जनगणना के अनुसार राजस्थान में 13.48 फ़ीसदी आबादी आदिवासी समुदाय से है। वहीं भारत सरकार के अनुसूचित जनजाति की वेबसाइट के अनुसार राजस्थान में आदिवासी वर्ग में 12 जातियाँ शामिल हैं। राजस्थान में एसटी की सूची में आने वाली जातियों में सर्वाधिक संख्या मीणा समुदाय की है। एसटी वर्ग में आबादी के हिसाब से दूसरे नंबर पर भील जनजाति है जिसकी संख्या मीणा से थोड़ी ही कम है।
2011 की जनगणना के अनुसार राजस्थान में कुल अनुसूचित जनजाति की आबादी में भील जनजाति की आबादी 44 फीसदी (करीब 41 लाख) है। जबकि मीणा जनजाति की आबादी 47 फीसदी ( करीब 43 लाख) है।
भील समुदाय का दावा
भील जनजाति का दावा है कि उनके साथ एसटी वर्ग के अन्य जातियों द्वारा भेदभाव किया जाता है और मीणा जनजाति के लोगों को सरकारी नौकरियों और योजनाओं में आबादी के अनुपात से काफी ज्यादा प्रतिनिधित्व मिलता है। जबकि भील समुदाय को आबादी के अनुपात में बहुत कम प्रतिनिधित्व मिलता है।
भील को भारत की सबसे पुरानी जनजातियों में से एक माना जाता है, जो मुख्य रूप से पश्चिम भारत में पाए जाते हैं। भील समुदाय के लोग राजस्थान, गुजरात, ओडिशा, मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में रहते हैं। मध्य प्रदेश और राजस्थान में इनकी आबादी सबसे अधिक है।
क्या है उपवर्गीकरण और किन राज्यों में लागू है
सुप्रीम कोर्ट ने ‘पंजाब राज्य बनाम देवेंद्र सिंह’ मामले में व्यवस्था दी थी कि सरकार विभिन्न समुदायों को समुचित प्रतिनिधित्व देने के लिए एससी और एसटी वर्ग का भी उपवर्गीकरण कर सकती है। यानी सरकार इन वर्गों को मिलने वाले कुछ आरक्षण को उपवर्गों में बाँट सकती है।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने के बाद तेलंगाना और हरियाणा ने एससी वर्ग को मिलने वाले आरक्षण का उपवर्गीकरण किया। तमिलनाडु, कर्नाटक और बिहार इत्यादि राज्यों में ओबीसी आरक्षम पहले से उपवर्गीकरण किया जा चुका है।
‘पंजाब राज्य बनाम देवेंद्र सिंह’ मामला क्या है?
पंजाब राज्य बनाम देवेंद्र सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट की 7 जजो की बेंच ने ऐतिहासिक फैसला दिया था। इसमें यह कहा गया था कि राज्य सरकारों को सार्वजनिक रोजगार और शिक्षा में आरक्षण के उद्देश्य से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के भीतर उप वर्गीकरण बनाने का अधिकार है। 1 अगस्त 2024 को यह फैसला सुप्रीम कोर्ट ने 6:1 के बहुमत से दिया था। 6 जजों ने इस पर सहमति जताई थी जबकि एक ने इसके विरोध में तर्क दिया था। कोर्ट ने चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में अपने 2004 के दिए फैसले को ही पलट दिया था। चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश मामले में कोर्ट ने कहा था कि अनुसूचित जातियां एक समरूप समूह हैं और आरक्षण लाभ के लिए उनका उप वर्गीकरण नहीं किया जा सकता है।
यह मामला पंजाब सरकार द्वारा 1975 में जारी एक अधिसूचना से शुरू हुआ था, जिसमें अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सीटों का 50% वाल्मीकि और मज़हबी सिख समुदायों को आवंटित किया गया था। इन्हें राज्य में अनुसूचित जातियों में सबसे पिछड़ा माना जाता था। 2000 में आंध्र प्रदेश विधानसभा ने आंध्र प्रदेश अनुसूचित जाति अधिनियम, 2000 नामक एक कानून पारित किया, जिसमें अनुसूचित जातियों को उप-समूहों में संगठित किया गया।
हालांकि, इस कानून की संवैधानिकता को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई, जहां इसे बरकरार रखा गया और फिर सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई। 2004 में सुप्रीम कोर्ट पांच न्यायाधीशों की पीठ ने अपने फैसले ई.वी. चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य में यह माना कि अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित जातियों की राष्ट्रपति सूची एक एकल समरूप समूह का गठन करती है। कोर्ट ने इस कानून को असंवैधानिक करार दिया।
देवेन्द्र सिंह ने दी थी चुनौती
चिन्नैया फैसले के बाद पंजाब सरकार ने पंजाब अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग (सेवाओं में आरक्षण) अधिनियम, 2006 पारित किया। इस अधिनियम की संवैधानिकता को देवेन्द्र सिंह द्वारा प्रतिनिधित्व किए गए चमार महासभा ने चुनौती दी। इसमें चिन्नैया मामले के फैसले पर भरोसा करते हुए पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने कई फैसलों में इसे रद्द कर दिया। राज्य ने बाद में हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की, जिसकी सुनवाई 2020 में न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की अध्यक्षता में पांच न्यायाधीशों की पीठ ने की।
अपील की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने चिन्नैया फैसले की वैधता पर संदेह व्यक्त किया और कहा कि यह इंदिरा साहनी और अन्य बनाम भारत संघ मामले में 9 न्यायाधीशों की एक बड़ी पीठ द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के साथ असंगत है। पीठ ने टिप्पणी की कि जाति और वर्ग दोनों गतिशील हैं और आरक्षण के लाभ अक्सर अनुसूचित जाति सूची में कुछ प्रभावशाली जातियों द्वारा हथिया लिए जाते हैं, जिससे सबसे हाशिए पर रहने वाले लोग प्रतिनिधित्व से वंचित रह जाते हैं। इसके कारण इस मामले को सात न्यायाधीशों की पीठ को भेजा गया। इसके बाद 7 जजों की पीठ ने फैसला सुनाया।
यह भी पढ़ें- आरक्षण में उप-वर्गीकरण का पूरा मुद्दा क्या है? जानिए सरकारों ने अब तक क्या कदम उठाए हैं
आरक्षण में सुधार करने की हालिया मांग को लेकर कई सवाल फिर से चर्चा की केंद्र में आ गए हैं। इसमें आरक्षण के उप-वर्गीकरण पर भी चर्चाएं हो रही हैं। अभी दो साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के भीतर उप-वर्गीकरण की अनुमति दी थी, जिसके बाद राज्य इस दिशा में कदम उठा रहे हैं। पढ़ें पूरी खबर
