15 अगस्त 2026 को देश आजादी के 79 साल पूरे कर लेगा और देशवासी 80वें स्वतंत्रता दिवस का जश्न मनाएंगे। भारत को आजादी दिलाने में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन लंबे समय तक चला था। अभी तक आजादी से जुड़े एक से बढ़कर एक किस्से आपने सुने होंगे, लेकिन क्या आप जानते हैं 1920 के दशक में बर्लिन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े क्रांतिकारियों और दूसरे देशों के साम्राज्यवाद-विरोधी नेताओं का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था।

10 फरवरी 1926 को बर्लिन के सिटी हॉल के एक रेस्टोरेंट में 43 विदेशी और जर्मन समाजवादी, शांतिवादी और साम्राज्यवाद-विरोधी लोग एक सम्मेलन के लिए जुटे। इस बैठक का नेतृत्व जर्मन कम्युनिस्ट नेता विली मुंजेनबर्ग ने किया था।

चट्टो थे अहम किरदार

खास बात यह है कि इस सम्मेलन का हिस्सा भारतीय स्वतंत्रता सेनानी वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय भी थे जिन्हें ‘चट्टो’ के नाम से जाना जाता था। उस समय चट्टो बर्लिन में भारतीय क्रांतिकारियों और दुनिया के दूसरे वामपंथी व साम्राज्यवाद-विरोधी समूहों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी थे।

1927 में ब्रेसेल्स में आयोजित हुआ था अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन

इस मीटिंग के बाद लीग अगेंस्ट कॉलोनियल ऑपरेशन (LACO) का गठन हुआ। LACO के गठन के बाद दुनिया के अलग-अलग देशों के साम्राज्यवाद-विरोधी नेताओं को एक मंच पर लाने की कोशिश शुरू हुई। इसी का नतीजा था कि 1927 में ब्रेसेल्स में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में एशिया, अफ्रीका और दूसरे उपनिवेशों के 174 प्रतिनिधि शामिल हुए थे।

भारत से कौन गया था इस सम्मेलन में?

भारत की ओर से इस सम्मेलन में जवाहरलाल नेहरू, मुहम्मद बरकतुल्लाह और दूसरे प्रतिनिधि शिरकत करने पहुंचे थे। इस सम्मेलन में लीग अगेंस्ट इंपीरियलिज़्म (LAI) नाम का संगठन बनाया गया। इसका मुख्यालय बर्लिन में रखा गया और वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय इसके अंतरराष्ट्रीय सचिव बने।

बर्लिन ही क्यों बना सेंटर?

बर्लिन के केंद्र बनने कई कारण थे। उस समय शहर में साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के खिलाफ काम करने वाले कई अंतरराष्ट्रीय संगठन और राजनीतिक समूह सक्रिय थे। यहां समाजवादी और कम्युनिस्ट विचारों का भी मजबूत प्रभाव था। इसके अलावा बर्लिन उस समय यूरोप का एक महत्वपूर्ण बौद्धिक और राजनीतिक केंद्र था।

दुनिया के अलग-अलग देशों से आए छात्र, लेखक, क्रांतिकारी और राजनीतिक कार्यकर्ता यहां रहते थे। इसलिए भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों को भी यहां अपने विचार फैलाने और दूसरे देशों के आंदोलनों से जुड़ने का अवसर मिला।

1920 के दशक में बर्लिन में लगभग 200 भारतीय रहते थे। इनमें बड़ी संख्या छात्रों की थी, जबकि कुछ लोग पहले से ही स्वतंत्रता आंदोलन और क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े हुए थे। इस भारतीय समुदाय के बीच वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय सबसे महत्वपूर्ण लोगों में से एक थे। वे भारत की आजादी के लिए काम करने वाले भारतीयों को यूरोप और दुनिया के दूसरे साम्राज्यवाद-विरोधी आंदोलनों से जोड़ते थे।

इस तरह भारतीय क्रांतिकारियों की मौजूदगी, अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक नेटवर्क, समाजवादी विचारधारा और साम्राज्यवाद-विरोधी आंदोलनों के मेल ने बर्लिन को विदेश में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना दिया।