बांकीपुर और दतिया के उपचुनाव नतीजों ने भाजपा के भीतर जवाबदेही और हार के पैमाने पर सवाल खड़े किए हैं। पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार केंद्रीय एजंसियों और राजनीतिक दबाव के बीच मुश्किल डगर पर है। संसद में मकर द्वार पर सावन के गीत ने सियासी तनाव के बीच अलग रंग दिखाया। दूसरी ओर बसपा के कमजोर होते जनाधार और चंद्रशेखर आजाद के उभार के बीच मायावती की राजनीति पर सवाल हैं। कर्नाटक में राहुल गांधी भी घिरे हैं।
दोहरा पैमाना
बांकीपुर और दतिया की हार से भाजपा सदमे में है। बांकीपुर में तो पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की प्रतिष्ठा दांव पर लगी थी। पांच बार वे खुद इस सीट से लगातार जीते और उनसे पहले तीन बार उनके पिता भी यहीं से जीते थे। सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद यह पहला उपचुनाव था। पहली ही परीक्षा में वे फेल हो गए। जबकि वहां पर चुनावी प्रचार में कोई कमी नहीं रही थी। विपक्ष ने आरोप लगाया कि भाजपा को घमंड है कि वह कुत्ता-बिल्ली को भी खड़ा कर देगी तो वह जीत जाएगा।
भाजपा की सहयोगी जद (एकी) के नेताओं की प्रतिक्रिया चौंकाने वाली है। पार्टी के विधायक अनंत सिंह ने तो साफ फरमाया है कि नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटाने का अंजाम देख लिया भाजपा ने। उधर जीत कर नायक बने प्रशांत किशोर अलग चाल चल रहे हैं। वे कह रहे हैं कि बांकीपुर सीट हारने से भाजपा पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। पर इस इलाके की जनता ने संदेश दे दिया कि लालू के जंगल राज के साथी रहे दागी नेता को मुख्यमंत्री बनाओगे तो अंजाम भुगतना होगा।
उधर मुख्यमंत्री मोहन यादव दतिया की हार से इस कदर बौखलाए हैं कि नरोत्तम मिश्रा पर गाज गिराने की व्यूह रचना कर रहे हैं। जबकि दतिया तो भाजपा की हारी हुई सीट थी। अगर पार्टी हार की जिम्मेदारी ईमानदारी से तय करने के प्रति वाकई गंभीर होती तो बांकीपुर के लिए नितिन नवीन और सम्राट चौधरी से सवाल जवाब करती।
मुश्किल डगर
पंजाब की भगवंत मान सरकार अब भाजपा के निशाने पर है। अगले साल जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, उनमें केवल पंजाब में ही विपक्षी आम आदमी पार्टी सत्ता में है। केंद्रीय एजंसियां पहले कारोबारियों पर छापे डालती थी। लेकिन पंजाब में आम आदमी पार्टी के नेताओं और सरकारी विभागों तक पर छापे डाले जा रहे हैं। चुनाव वाले चारों राज्यों की भाजपा सरकारें जमकर अपने प्रचार में सरकारी पैसा खर्च कर रही हैं। लेकिन पंजाब सरकार को ऐसा करने से रोका जा रहा है। यहां तक कि हाई कोर्ट ने भी आदेश दे दिया कि जब तक सरकार कर्मचारियों को महंगाई भत्ते की रकम अदा नहीं करती तब तक कोई विज्ञापन अभियान शुरू नहीं करेगी। अचानक ड्रग्स के खिलाफ भी केंद्र सरकार सक्रिय हुई है। ऐसे में आम आदमी पार्टी की सरकार का परेशान होना स्वाभाविक है। पार्टी के राज्यसभा सांसदों को भाजपा ने पहले ही तोड़ लिया था।
मकर द्वार पर सावन का सुर
संसद सत्र शुरू होने के बाद से हीमकर द्वार विपक्षी सांसदों के लिए हंगामे का केंद्र बना हुआ है। यहां लगातार नारेबाजी हो रही है। बीते दिनों तो सत्ता पक्ष के सांसद भी विपक्ष के खिलाफ नारेबाजी करने का मोह नहीं छोड़ पाए। लेकिन दिल्ली में लगातार सावन की झड़ी के बाद मकर द्वार का माहौल भी बदल गया। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी तकरार के बीच सांसद बाबुल सुप्रियो ने वरिष्ठ सांसद जगदंबिका पाल के अनुरोध पर किशोर कुमार का मशहूर गीत ‘रिमझिम गिरे सावन’ गुनगुना दिया। कुछ पल के लिए लगा कि राजनीति ने विराम लिया और संगीत ने सदन की दहलीज को सुरीला बना दिया। यहां तक कि विपक्ष के सांसद भी इस सुरीले अंदाज का आनंद लेते नजर आए।
बसपा का हाल
बहुजन समाज पार्टी के उत्तर प्रदेश के इकलौते विधायक उमाशंकर सिंह का इसी हफ्ते निधन हो गया। जिस राज्य में मायावती ने चार बार मुख्यमंत्री रहने का रिकार्ड बनाया, आज उसी राज्य के दोनों सदनों में उनकी पार्टी का एक भी सदस्य नहीं है। खुद मायावती भी एक दशक से न विधानमंडल में हैं और न संसद के किसी सदन में। याद कीजिए, 2012 तक वे उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार चला रही थीं। यहां तक कि 2009 के लोकसभा चुनाव में तो बसपा ने मायावती के प्रधानमंत्री बनने तक का दावा किया था। इस चुनाव में बसपा का नारा था-ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी दिल्ली जाएगा। लेकिन आज बसपा का कोई नामलेवा नहीं है। उन्होंने पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनाव में अपनी छवि भाजपा की ब टीम की बना ली। उनका दलित वोट बैंक भी बिखर गया। वे अभी भी अपने भतीजे को आगे बढ़ाने और उसके ससुर के खिलाफ कार्रवाई में ही उलझी हैं। आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर युवा दलितों के नायक बनकर उभर रहे हैं। उन्होंने अकेले अपने दम पर नगीना से पिछला लोकसभा चुनाव जीता था। जहां बसपा का उम्मीदवार अपनी जमानत भी नहीं बचा पाया था। मध्य प्रदेश की दतिया सीट के उपचुनाव में उनके उम्मीदवार दामोदर यादव मंडल ने 22515 वोट लेकर सियासी पंडितों को हैरान कर दिया है। यानी कांशीराम की तर्ज पर अपनी पार्टी का विस्तार कर रहे हैं चंद्रशेखर। वे मायावती के लिए बड़ी चुनौती बन चुके हैं।
सवालों के घेरे में राहुल
कर्नाटक में अपनी सरकार को लेकर राहुल गांधी सवालों के घेरे में आ गए हैं। डीके शिवकुमार की सरकार में एक भी महिला मंत्री नहीं है, जबकि राहुल गांधी महिलाओं, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के कल्याण का राग अलापते रहते हैं। दरअसल, कर्नाटक में जब डीके शिवकुमार ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी तो केवल चौदह मंत्री ही बनाए। उनमें महिला कोई नहीं थी। दो महीने से वे इतने मंत्रियों से ही अपनी सरकार चला रहे थे। जबकि 224 सदस्यों की विधानसभा के हिसाब से राज्य में कुल 34 मंत्री बन सकते हैं। मंत्रिमंडल विस्तार में विलंब का कारण सिद्धरमैया के साथ तालमेल न होना था। फिर पिछले हफ्ते शिवकुमार दिल्ली गए और मंत्रिमंडल विस्तार की हरी झंडी ले आए। तभी उन्होंने 20 नए मंत्रियों को अपनी सरकार में शामिल कर लिया। विस्तार के समय सिद्धरमैया नदारद रहे। उनके करीबी विधायकों को शिवकुमार ने मंत्री नहीं बनाया। उम्मीद थी कि महिला मंत्री की कमी को पूरा करने के लिए गायत्री शांति गौडा को शपथ दिलाई जाएगी। पर ऐन वक्त पर उनका नाम कट गया। यानी 34 मंत्रियों में भी कोई महिला नहीं।
