राजु संथानम
यह उस समय की बात है, जब मैं मुंबई के क्रॉफर्ड मार्केट में एक पुलिस अधिकारी के धुएं से भरे कमरे में बैठा हुआ था। वहां एक नाम की काफी चर्चा हो रही थी- बिल्ला। वह सायन कोलीवाड़ा इलाके का एक कुख्यात अपराधी था। बिल्ला चोरी करता था और शहर के कई हिस्सों में उसकी वजह से डर का माहौल था।
यह बात 1970 के दशक के आखिर की है, जब मैं नरिमन पॉइंट स्थित इंडियन एक्सप्रेस के दफ्तर में काम किया करता था। हम पत्रकार तब भी एक खबर से दूसरी खबर के पीछे भागते रहते थे। ऐसे में दूसरे पत्रकारों से प्रतिस्पर्धा भी बनी रहती थी। उस जमाने में पुलिस कमिश्नर के दफ्तर का प्रेस रूम वह जगह होती थी, जहां पुलिस हर मामले की आधिकारिक जानकारी देती थी।
हालांकि, मैं सिर्फ आधिकारिक सूचनाओं पर निर्भर नहीं रहता था। मैंने भी अपने कुछ सूत्र बना रखे थे। एक पुलिस अधिकारी अक्सर मुझे चाय पर बुलाया करता था। उसी से मुझे पुलिस महकमे की अंदरूनी जानकारियां मिलती थीं। मैंने अपने करियर में मशहूर तस्कर हाजी मस्तान का इंटरव्यू भी किया था और उसमें भी इसी पुलिस अधिकारी की मदद मिली थी।
ऐसी ही एक मुलाकात के दौरान उस अधिकारी ने मुझे बताया कि अप्रैल 1978 में चोरी के एक मामले में गिरफ्तार किया गया बिल्ला पुलिस हिरासत से फरार हो गया है। उसे जंजीरों में बांधकर रखा जाता था, लेकिन इसके बावजूद वह भागने में कामयाब हो गया।
उसने 1 मई 1978 का दिन चुना था। यह महाराष्ट्र दिवस और मजदूर दिवस था। उस दिन ज्यादातर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी सरकारी कार्यक्रमों और सुरक्षा व्यवस्था में व्यस्त थे। बिल्ला ने इसी मौके का फायदा उठाकर भागने की योजना बनाई।
इंडियन एक्सप्रेस में बिल्ला के फरार होने की खबर सबसे पहले मैंने ही प्रकाशित की थी। यह खबर काफी बड़ी बन गई। हालांकि, मेरे लिए इसका रोमांच ज्यादा समय तक नहीं रहा। कुछ ही समय बाद मुझे भोपाल में नई जिम्मेदारी संभालने के लिए भेजा जा रहा था।
लेकिन उसी दौरान दिल्ली में एक और बड़ी घटना घट रही थी। नौसेना के कप्तान मदन मोहन चोपड़ा के बच्चे, 16 वर्षीय गीता चोपड़ा और 14 वर्षीय संजय चोपड़ा, अगवा कर लिए गए थे। बाद में उनकी हत्या कर दी गई। इस घटना ने पूरे देश को अंदर तक झकझोर दिया।
क्राइम रिपोर्टिंग में मैंने तब तक दो साल बिता लिए थे, लेकिन जो आगे होने वाला था, उसके लिए मैं बिल्कुल तैयार नहीं था। चार महीने बाद हमें पता चला कि गीता और संजय चोपड़ा की हत्या के मामले में गिरफ्तार किए गए लोग कोई और नहीं, बल्कि बिल्ला और उसका साथी रंगा थे।
असल में 26 अगस्त 1978 को गीता और संजय ऑल इंडिया रेडियो के एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए निकले थे। उन्हें शाम 7 बजे तक पहुंचना था और रात 9 बजे उनके पिता उन्हें लेने आने वाले थे। लेकिन दोनों अपनी मंजिल तक कभी पहुंच ही नहीं पाए।
दो दिन बाद दोनों बच्चों के शव दिल्ली के रिज इलाके में मिले। 31 अगस्त 1978 को पुलिस ने एक पीले रंग की फिएट कार बरामद की। उस समय पुलिस को भी यकीन नहीं था कि इस अपराध से बिल्ला और रंगा का कोई संबंध है। कई रिपोर्टों के विपरीत, यह कार बुद्ध जयंती रिज इलाके में नहीं, बल्कि मजलिस पार्क इलाके में मिली थी।
पूरे देश की नजर इस मामले पर थी। इंडियन एक्सप्रेस लगातार इस केस से जुड़ी हर जानकारी प्रकाशित कर रहा था।
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं, तो उस समय की राजनीतिक परिस्थितियां भी असाधारण नजर आती हैं। मोरारजी देसाई की सरकार आंतरिक खींचतान से परेशान थी। इंदिरा गांधी सत्ता से बाहर थीं, लेकिन कांग्रेस वापसी का मौका तलाश रही थी। सरकारी अधिकारी तनाव में थे और पुलिस पर लगातार सवाल उठ रहे थे।
ऐसे समय में चोपड़ा भाई-बहन के अपहरण और हत्या की घटना ने सरकार के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी। कुछ दिन पहले ही रक्षा मंत्री जगजीवन राम के बेटे सुरेश राम का नाम एक सेक्स स्कैंडल में सामने आया था। वहीं, डाकू सुंदर के कथित एनकाउंटर को लेकर भी पुलिस महकमे पर सवाल उठ रहे थे।
जब गीता-संजय हत्याकांड सामने आया, तो दिल्ली पुलिस दो धड़ों में बंटी हुई दिखाई दी। कुछ अधिकारियों को लगता था कि यह सीधा अपहरण का मामला है, जबकि कुछ लोग इसे सुरेश राम से जुड़े विवाद से जोड़कर देख रहे थे। कुछ अधिकारियों को तो इसमें कांग्रेस की साजिश भी नजर आने लगी थी।
ऐसा इसलिए भी था क्योंकि उस समय कांग्रेस की छात्र इकाई लगातार प्रदर्शन कर सरकार से जवाब मांग रही थी। एक ऐसे ही प्रदर्शन में उस समय के विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पहुंच गए थे। इसी दौरान उनकी नाक पर पत्थर लग गया। हालात संभालने के लिए पुलिस को आंसू गैस छोड़नी पड़ी और तब जाकर भीड़ तितर-बितर हुई।
उधर मुंबई में पुलिस एक अलग ही अभियान चला रही थी। उसे बिल्ला की तलाश थी। इसी दौरान पता चला कि बिल्ला की मुलाकात रंगा से हो चुकी है, जो आगे चलकर उसका सबसे करीबी साथी बन गया।
पुलिस और अदालत के रिकॉर्ड बताते हैं कि श्याम सिंह ने ही बिल्ला की मुलाकात रंगा से कराई थी। श्याम सिंह बिल्ला के हिंसक स्वभाव और बदलते मिजाज से परेशान हो चुका था। वह दो अरब पर्यटकों की हत्या का भी गवाह रह चुका था और जानता था कि बिल्ला हर बीतते दिन के साथ और खतरनाक होता जा रहा है।
इसी वजह से श्याम सिंह को लगा कि बिल्ला को काम करने के लिए किसी युवा साथी की जरूरत होगी। यहीं से रंगा उसकी जिंदगी में आया। करीब छह फीट लंबा, मजबूत शरीर वाला रंगा पहली ही मुलाकात में बिल्ला को प्रभावित करने में सफल रहा।
दोनों ने मिलकर शुरुआती अपराधों में फिरौती के लिए एक बच्चे का अपहरण किया। हालांकि, उनकी योजना फेल हो गई और बच्चे को सुरक्षित छोड़ना पड़ा। इस नाकाम कोशिश के बाद दोनों के बीच तनाव जरूर बढ़ा, लेकिन उनकी साझेदारी बनी रही।
यह वह दौर था, जब मुंबई पुलिस बिल्ला के काफी करीब पहुंच चुकी थी। उसके खिलाफ कई गंभीर आपराधिक मामले दर्ज थे।
उस समय मुंबई में ऐसी खबरें भी सामने आती थीं कि बिल्ला सुनसान इलाकों, खासकर पवई झील के आसपास, प्रेमी जोड़ों को रोककर उनसे लूटपाट करता था। वह महिलाओं को लिफ्ट देने का झांसा भी देता था और बाद में उनके साथ अपराध करता था।
जब पुलिस का दबाव बढ़ने लगा, तो बिल्ला और रंगा ने मुंबई छोड़ने का फैसला कर लिया। यह दोनों की पहली दिल्ली यात्रा थी। वे इस शहर को ठीक से नहीं जानते थे, लेकिन उन्हें उम्मीद थी कि यहां पुलिस की नजरों से बचना आसान होगा।
इस बीच मुंबई पुलिस को भी शक हो गया था कि बिल्ला और रंगा दिल्ली भाग चुके हैं। गीता-संजय चोपड़ा हत्याकांड से पहले भी मुंबई पुलिस दो बार दिल्ली जाकर उनकी तलाश कर चुकी थी, लेकिन तब कोई बड़ी सफलता हाथ नहीं लगी।
हालांकि, कानून के हाथ लंबे होते हैं और मुंबई पुलिस के धैर्य ने भी उसकी मदद की। इस मामले में पहला बड़ा सुराग जुगल नाम के एक व्यक्ति से मिला। जुगल पहले बिल्ला और रंगा का साथी रह चुका था।
जुगल ने पुलिस को बताया कि बिल्ला और रंगा दिल्ली में ही छिपे हुए हैं। वे चोरी की कारों का इस्तेमाल कर रहे हैं और पकड़े जाने से बचने के लिए बार-बार नंबर प्लेट बदल देते हैं।
यह जानकारी मिलते ही मुंबई पुलिस एक बार फिर दिल्ली पहुंच गई। जांच के दौरान पुलिस उस पेंटर तक भी पहुंची, जो बिल्ला और रंगा के लिए फर्जी नंबर प्लेट बनाता था।
पेंटर ने जिन दो लोगों का हुलिया बताया, वह पूरी तरह बिल्ला और रंगा से मेल खाता था। अब पुलिस को यकीन हो गया था कि दोनों दिल्ली में ही मौजूद हैं।
इसी बीच मेरे पास एक बार फिर अपने पुराने पुलिस अधिकारी का फोन आया। तब तक मैं इस मामले से काफी हद तक दूर हो चुका था और मेरी दिलचस्पी भी कम हो गई थी। फिर भी मैं उनसे मिलने पहुंचा।
उस अधिकारी ने मुझे बताया कि मुंबई पुलिस चाहती है कि बिल्ला और रंगा की तलाश को और व्यापक बनाया जाए। ज्यादा पुलिसकर्मी लगाए जाएं और सबसे महत्वपूर्ण बात, दोनों की तस्वीरें सार्वजनिक की जाएं।
उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या इंडियन एक्सप्रेस बिल्ला की तस्वीर प्रकाशित कर सकता है। इसके बाद इंडियन एक्सप्रेस ने बिल्ला की तस्वीर अपने सभी संस्करणों में प्रकाशित कर दी।
तस्वीर छपने के कुछ दिनों बाद ही एक बड़ा घटनाक्रम हुआ। कालका मेल से सफर कर रहे सेना के कुछ जवानों ने ट्रेन में दो संदिग्ध लोगों को देखा। उन्होंने बिल्ला को पहचान लिया, क्योंकि उसकी तस्वीर वे अखबार में देख चुके थे।
स्थानीय अखबार ‘नवयुग’ ने भी इंडियन एक्सप्रेस से तस्वीर लेकर उसे प्रकाशित किया था। जवानों ने तुरंत अधिकारियों को सूचना दे दी।
इसके बाद 8 सितंबर 1978 को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर बिल्ला और रंगा को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके साथ ही भारत की सबसे चर्चित, सबसे भयावह और सबसे बड़ी तलाशों में से एक का अंत हो गया।
यह मामला आगे चलकर दिल्ली की छवि पर भी गहरा असर डालने वाला साबित हुआ। आज जब दिल्ली को कई बार “क्राइम कैपिटल” कहा जाता है, तो उसकी जड़ें काफी हद तक इसी मामले तक पहुंचती हैं।
इस एक घटना ने बच्चों और उनके माता-पिता की पूरी एक पीढ़ी को मानसिक रूप से झकझोर दिया था। आज बिल्ला-रंगा केस पर OTT सीरीज भी बन चुकी हैं, जिनमें दिल्ली पुलिस की भूमिका को काफी सकारात्मक तरीके से दिखाया जाता है। लेकिन यह याद रखना चाहिए कि सच्चाई हमेशा कहानी से थोड़ी अलग होती है।
अगर हमें पुलिस की भूमिका को सही तरीके से समझना है, तो चोपड़ा हत्याकांड की पूरी टाइमलाइन समझना जरूरी है।
26 अगस्त 1978 की शाम करीब 6:30 बजे गीता और संजय चोपड़ा का गोल डाक खाना के पास से अपहरण किया गया था। वहां से गुजर रहे भगवान दास नाम के एक व्यक्ति ने यह घटना अपनी आंखों से देखी थी। वह उस समय स्कूटर पर सवार थे। उन्होंने देखा कि पीले रंग की एक फिएट कार में दो बच्चों को जबरदस्ती बैठाया जा रहा है।
उन्होंने यह भी देखा कि लड़की ड्राइवर के बाल खींच रही थी और लड़का दूसरे व्यक्ति से संघर्ष कर रहा था। भगवान दास ने तुरंत पुलिस कंट्रोल रूम (PCR) को फोन किया और कार का नंबर भी नोट करा दिया — HRK 8390। यह सूचना शाम 6:44 बजे पुलिस कंट्रोल रूम तक पहुंच चुकी थी।
कुछ मिनट बाद एक और राहगीर, इंदरजीत सिंह, ने भी यह घटना देखी। उन्होंने तो कार का पीछा भी किया और शंकर रोड तक पहुंच गए। लेकिन ट्रैफिक सिग्नल पार करने के बाद कार उनकी नजरों से ओझल हो गई। इसके बाद उन्होंने भी पुलिस को सूचना दी। तब समय शाम 7:40 बजे का था।
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। बिल्ला और रंगा दोनों बच्चों को बुद्ध जयंती पार्क ले जा चुके थे। इसी बीच बच्चों के पिता कैप्टन चोपड़ा भी अपने बच्चों की तलाश में लगे हुए थे। उन्होंने रात 10:15 बजे पुलिस में बच्चों के लापता होने की शिकायत दर्ज कराई। जब कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो उन्होंने रात 11:30 बजे फिर पुलिस से संपर्क किया।
लेकिन हैरानी की बात यह थी कि इतनी सारी जानकारी होने के बावजूद पुलिस इन सभी सुरागों को आपस में जोड़ नहीं पाई। यही आज भी दिल्ली पुलिस की सबसे बड़ी चूकों में गिना जाता है।
कैप्टन चोपड़ा लगातार पुलिस के पास जाते रहे। उनकी शिकायतों के बाद करीब 240 पुलिसकर्मियों की एक टीम बुद्ध जयंती पार्क में तलाशी अभियान चलाने पहुंची। पुलिस ने पूरे इलाके में खोजबीन की, लेकिन उसे कोई सफलता नहीं मिली। अगली सुबह एक ग्वाले ने दोनों बच्चों के शव बरामद किए।
सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि शव उस जगह से महज 200 गज की दूरी पर मिले, जहां पुलिस रात भर तलाशी अभियान चला रही थी। यानी पुलिस अपराधियों के काफी करीब पहुंच गई थी, लेकिन फिर भी बच्चों को बचा नहीं पाई।
हालांकि,यह पुलिस की इकलौती चूक नहीं थी। रंगा ने बाद में अपने कबूलनामे में बताया कि गीता चोपड़ा ने संघर्ष के दौरान बिल्ला के सिर पर जोरदार वार किया था जिससे उसके माथे पर चोट लग गई थी। हत्या के कुछ घंटों बाद ही बिल्ला और रंगा इलाज कराने विलिंगडन अस्पताल पहुंच गए थे। आज इस अस्पताल को डॉ. राम मनोहर लोहिया (RML) अस्पताल के नाम से जाना जाता है।
दोनों ने वहां मौजूद पुलिस अधिकारी को बताया कि कुछ लोगों ने उन पर हमला कर दिया है। सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि वे उसी फिएट कार में अस्पताल पहुंचे थे, जिसका इस्तेमाल अपहरण और हत्या में किया गया था। उन्होंने पुलिस को कथित हमले की जगह भी दिखाई और फिर वापस अस्पताल आ गए।
लेकिन वहां मौजूद सब-इंस्पेक्टर ने उनसे कहा कि वे अगले दिन आकर शिकायत दर्ज कराएं। जाहिर है, वे अगले दिन कभी लौटकर नहीं आए। बाद में जब बिल्ला और रंगा गिरफ्तार हुए और फिएट कार से मिले फिंगरप्रिंट्स का मिलान किया गया, तब जाकर दिल्ली पुलिस ने माना कि यही वे अपराधी थे जिनकी तलाश मुंबई पुलिस काफी समय से कर रही थी।
इसके बाद मामला अदालत पहुंचा। करीब चार साल तक मुकदमा चला और आखिरकार बिल्ला और रंगा को मौत की सजा सुनाई गई।
दोनों ने इस फैसले को ऊपरी अदालतों में चुनौती दी, लेकिन उन्हें राहत नहीं मिली। दिल्ली हाईकोर्ट ने मौत की सजा को बरकरार रखा। साथ ही अदालत ने दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी कड़ी टिप्पणी की।
अदालत ने कहा कि अगर पुलिस समय रहते उपलब्ध सूचनाओं पर कार्रवाई करती तो पूरी संभावना थी कि बच्चों की जान बचाई जा सकती थी। अदालती रिकॉर्ड बताते हैं कि पुलिस कंट्रोल रूम को पहली सूचना शाम 6:44 बजे मिल गई थी। इसके बावजूद स्थानीय थाने ने जांच के लिए अधिकारी को 7:05 बजे भेजा। इस देरी पर अदालत ने सवाल उठाए।
अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा था:”पुलिस को यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए थी कि अपराधी गोल डाक खाना के पास कार में बैठे रहेंगे और पुलिस का इंतजार करेंगे। अगर फ्लाइंग स्क्वॉड की गाड़ियां तुरंत सक्रिय कर दी जातीं तो हत्याओं को रोका जा सकता था। अपराधियों को पकड़ने के लिए तत्काल व्यापक अलर्ट जारी किया जाना चाहिए था।”
इसके बाद 21 अप्रैल 1981 को सुप्रीम कोर्ट ने भी बिल्ला और रंगा की मौत की सजा को बरकरार रखा। आखिरकार 31 जनवरी 1982 को दोनों को दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी दे दी गई। इसके साथ ही भारत के आपराधिक इतिहास के सबसे कुख्यात अध्यायों में से एक का अंत हो गया।
नोट: लेखक की आगामी पुस्तक “Billa-Ranga: A Nation Ambushed” संजय सिंह के साथ सह-लेखन में लिखी गई है और इसे HarperCollins प्रकाशित करने जा रहा है।
