उत्तर प्रदेश की राजनीति में सपा अब भगवान राम का हाथ थामकर 2027 विधानसभा चुनाव का बेड़ा पार करना चाह रही है। सपा का ये सियासी अंदाज अब खुद अखिलेश यादव के हावभाव में दिखने लगा है। विरोधियों द्वारा सपा पर मुस्लिम और यादव की पार्टी होने का आरोप लगाया जाता रहा है। शायद अपनी इसकी काट के तौर पर अब पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव भगवान राम और हनुमान जी के गुणगान करने लगे हैं। अखिलेश और सपा के इस बदले रुख को राजनीतिक जानकार “सॉफ्ट हिन्दुत्व” की राह पर चलने के रूप में देख रहे हैं।

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की हार और बंगाल में भाजपा की मजबूत पकड़ ने अखिलेश यादव की नींद में खलल तो जरूर ही डाल दी होगी, इसलिए जब दो दिन पहले लखनऊ में जब वकीलों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया तो एक वकील के हाथ में रामचरितमानस की प्रति होने के बाद भी उसे पीटा गया और उसका हाथ टूट गया तो सपा प्रमुख ने अपने कार्यकर्ताओं को उन्हें रामचरितमानस भेंट करने को कहा। इसे लेकर उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट भी किया, साथ ही भाजपा पर हिंदु धर्म का अपमान करने का आरोप लगाया।

रामचरिमानस को सांस्कृतिक संविधान बताया

इतना ही नहीं कभी राम के अस्तित्व पर सवाल उठाने वाली सपा के प्रमुख अखिलेश यादव ने रामचरितमानस को सांस्कृतिक संविधान तक कह दिया। साथ ही कहा कि भाजपा राम का नाम लेकर राजनीति करती है लेकिन उनकी पुलिस रामचरितमानस लिए वकील पर लाठी बरसाती है।

उन्होंने एक्स पर लिखा, “भाजपा प्रभु राम का नाम अपने राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि के लिए करती रही है। कल जिस प्रकार भाजपा सरकार ने हाथ में श्रीरामचरितमानस लिए हुए अधिवक्ता पर अति निंदनीय हिंसक लाठीचार्ज किया वो भाजपा की सनातन विरोधी सोच को दर्शाता है। इससे सांस्कृतिक-संविधान रूपी हमारे इस महाकाव्य और महा-मर्यादा ग्रंथ का महा-अपमान हुआ है। इस लाठीचार्ज में घायल हुए एवं धार्मिक रूप से मर्माहत हुए अधिवक्ता महोदय को हमारे जन-प्रतिनिधियों ने श्रीरामचरितमानस की एक नई प्रति देकर उनका कुशलक्षेम पूछा और निर्मम-निर्दयी अधर्मी भाजपा राज के विरुद्ध सदैव साथ देने के आश्वासन के साथ ही सहयोग व समर्थन देने की बात कही।”

आगे उन्होंने कहा, “भाजपा से संबद्ध सभी सच्चे धर्म प्रेमी लोगों और समस्त संत समाज से हम ये अपील करते हैं कि वो भाजपा के धार्मिक पाखंड का भंडाफोड़ करने के लिए आगे आएं और ‘अधर्मी भाजपा’ का मुखौटा उतार दें। अब धर्म-हित और देश-हित में वो समय आ गया है कि ये सच सबके सामने आना ही चाहिए कि भाजपाई अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए धर्म का आवरण धारण करके समाज में विभेद उत्पन्न करते हैं और साम्प्रदायिकता फैलाते हैं।”

बड़ा मंगलवार की शुभकामनाएं दी

इसके अलावा, अखिलेश यादव ने 19 मई के तृतीय बड़ा मंगलवार की शुभकामनाएं दी। साथ ही उन्होंने लखनऊ में लोगों के बीच भंडारा भी वितरित किया।

पार्टी नेताओं ने जमकर किए हैं अपमान

ऐसे में राजनीतिक पंडितों का मानना है कि अखिलेश ने आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी अभी से तेज कर दी है। वह अब सपा को हिंदू विरोधी छवि को साफ कर सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पकड़ रहे हैं। अखिलेश बंगाल में जो भूल ममता बनर्जी ने भगवान ‘राम’के नाम पर की, उसे वह नहीं दोहराना चाह रहे। हालांकि अखिलेश ने कभी सीधे तौर पर कभी भगवान राम या राम मंदिर पर कुछ नहीं कहा, लेकिन उनके पार्टी के नेताओं ने इसमें कोई कसर नहीं छोड़ी।

मई 2024 में सपा के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव ने अयोध्या में बने राम मंदिर के निर्माण को लेकर विवादित बयान दिया था और उन्होंने मंदिर को ठीक से न बनाए जाने का हवाला देते हुए इसे ‘बेकार’ करार दिया था, जिस पर भाजपा ने कड़ी आपत्ति जताई थी।

साल 2023 में सपा के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव स्वामी प्रसाद मौर्य ने रामचरितमानस की चौपाइयों को “पिछड़े-विरोधी और महिला-विरोधी” बताते हुए विवाद खड़ा कर दिया था। जिसके बाद अखिलेश को इस पर सफाई देनी पड़ी थी। हालांकि बाद में स्वामी प्रसाद मौर्य सपा से अलग हो गए।

जनवरी 2026 में फिरोजाबाद के सपा जिला अध्यक्ष शिवराज सिंह यादव ने कहा था कि वह हिंदू नहीं, बल्कि यादव हैं, जिससे राजनीतिक विवाद पैदा हो गया था। भाजपा ने इसे लेकर सपा को घेरा था।

हाल ही में सपा प्रवक्ता राजकुमार भाटी ने एक कार्यक्रम में ब्राह्मणों की तुलना वेश्या से कर दी थी, इसके बाद पार्टी में विवाद खड़ा हो गया। इसके बाद बसपा प्रमुख मायावती ने भी सपा को ब्राह्मण विरोधी करार दिया और ब्राह्मणों से माफी मांगने को कहा। बताया जाता है कि राजकुमार भाटी को लखनऊ बुलाकर अखिलेश यादव ने बंद कमरे में बात की और उन्हें समझाया।

सपा नेता यदुनंदन लाल ने प्रभु राम, माता कौशल्या पर अमर्यादित टिप्पणी की थी, जिसके बाद उन पर केस दर्ज किया गया था। साथ ही सपा ने उनकी प्राथमिक सदस्यता रद्द कर दिया था और कहा था कि यह उनके निजी विचार हैं।

समय-समय पर भाजपा ने भी सपा को हिंदू विरोधी और राम विरोधी बताती रहती है। हालांकि अखिलेश यादव और सपा के अन्य वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि उन्होंने कभी हिंदू भावनाओं की ठेस नहीं पहुंचाई।

ज्योतिष के हिसाब से कर रहे काम

रामचरितमानस और बड़ा मंगलवार की बधाई ने अखिलेश की बदलती राजनीति को सामने ला दिया है। बीते कुछ सालों में अखिलेश यादव लगातार अपनी हिंदू पहचान को सार्वजनिक तौर पर सामने रखते हैं। हाल ही में सैफई में बन रहे केदारेश्वर मंदिर की तस्वीरें और भगवान शिव की पूजा करते हुए उनके परिवार की फोटो भी सोशल मीडिया पर सामने आ चुकी है। उन्होंने खुद को ज्योतिषों के शरणागत बताते हुए कहा था कि अब अपना हर काम ज्योतिष की सलाह के हिसाब से करते हैं, क्या पहनना है, कब बाहर निकलना है और कब नहीं निकलता है, यह भी ज्योतिष की सलाह से तय करते हैं।

हालांकि राजनीतिक जानकारों को मानना है कि अखिलेश की यह रणनीति कोई नई नहीं है, पिछले कुछ सालों से वह लगातार इसी दिशा में काम कर रहे थे। लोकसभा चुनाव जीतने के बाद यूपी विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की सीट ब्राह्मण चेहरे माता प्रसाद पांडे को देना भी इसी रणनीति का हिस्सा था।

चुनाव में मुस्लिम और यादव वोटों तक सीमित नहीं रहेगी सपा

हालांकि भाजपा ने इसे सपा की दिखावटी राजनीति बताया और अखिलेश पर हिंदू विरोधी और ब्राह्मण विरोधी होने का दावा किया। अभी ये कहना मुश्किल है कि 2027 में उन्हें इससे फायदा होगा या नहीं लेकिन एक बात साफ-साफ दिख रही है कि आगामी विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी व उनकी छवि महज मुस्लिम और यादव वोटों तक सीमित नहीं रहेगी।

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