दिल्ली-एनसीआर में अमूमन प्रदूषण को सर्दियों की समस्या मानकर देखा जाता रहा है, लेकिन इस बार भीषण गर्मी के बीच नोएडा और ग्रेटर नोएडा में गहराता वायु प्रदूषण का संकट चिंता का विषय बन गया है। स्थिति यह है कि हर दूसरे-तीसरे दिन ग्रेटर नोएडा और नोएडा की हवा ‘लाल श्रेणी’ यानी बेहद खराब स्तर पर पहुंच रही है।
इस बढ़ते प्रदूषण के बीच संबंधित विभागों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठने लगे हैं, क्योंकि सरकारी आंकड़े ही विभागों की ढिलाई की तस्दीक कर रहे हैं। वायु प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए जिम्मेदार विभाग की लापरवाही का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कार्रवाई का ग्राफ लगातार नीचे गिर रहा है।
आंकड़ों के मुताबिक, जब जनवरी महीने में प्रदूषण का स्तर अपने चरम पर था, तब विभाग सक्रिय नजर आ रहा था और उस दौरान एक ही महीने में नियम तोड़ने वाले 12,406 वाहनों के चालान काटे गए थे। इन वाहनों पर प्रति वाहन 10,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया गया था। इसके उलट, अप्रैल माह में विभाग की कार्रवाई में भारी गिरावट देखी गई है और यह संख्या अब तक केवल 7,565 चालान तक ही सिमट कर रह गई है।
प्रदूषण की मार केवल सड़कों तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रेटर नोएडा और पड़ोसी जिला गाजियाबाद पिछले कुछ दिनों से प्रदूषण के मामले में देश के सबसे प्रदूषित इलाकों की सूची में बने हुए थे। हालांकि, बुधवार को चली तेज हवाओं और हल्की बूंदाबांदी ने धूल के कणों को बैठाकर कुछ राहत जरूर दी है, जिससे वायु गुणवत्ता सूचकांक में थोड़ी कमी दर्ज की गई है। लेकिन यह राहत केवल तात्कालिक है।
विभाग की ढिलाई का सीधा असर जिले के लोगों की सतर्कता पर भी पड़ा है। जब विभाग मुस्तैद था और कार्रवाई का डर बना हुआ था, तब जनवरी माह में 13,452 लोगों ने स्वेच्छा से अपने वाहनों के प्रदूषण स्तर की जांच कराई थी। लेकिन जैसे ही अप्रैल में विभागीय सख्ती कम हुई, प्रदूषण जांच कराने वालों का आंकड़ा गिरकर मात्र 6,652 रह गया है।
यह स्थिति तब है, जब जिले में अभी भी लगभग एक लाख वाहन ऐसे सड़कों पर दौड़ रहे हैं, जिनकी प्रदूषण जांच की वैधता समाप्त हो चुकी है। इन ‘अनफिट’ वाहनों का सड़कों पर घूमना शहर की हवा को और अधिक जहरीला बना रहा है, फिर भी प्रशासन की ओर से कोई ठोस रणनीति नजर नहीं आ रही है।
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