यूरोप के कई देश इस समय रिकॉर्डतोड़ गर्मी का सामना कर रहे हैं। गुरुवार को 26 देशों में हीटवेव की चेतावनी जारी की गई है। फ्रांस, स्पेन समेत कई देशों में रेड अलर्ट लागू है। ज्यादातर देशों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है।

फ्रांस के आधे से ज्यादा हिस्से को भीषण गर्मी की वजह से रेड अलर्ट पर रखा गया है। इसके अलावा सरकार ने कई सार्वजनिक स्थानों पर शराब पीने पर भी प्रतिबंध लगा दिया है। फ्रांस की मौसम एजेंसी के मुताबिक, सोमवार की रात 1947 का तापमान रिकॉर्ड टूट गया। देश के कई हिस्सों में इस समय तापमान 43 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है।

बड़ी बात यह है कि फ्रांस में गोलफेक पावर प्लांट को भी बंद करना पड़ा। इसकी वजह भी भीषण गर्मी ही बनी। दरअसल, गर्मी के कारण गारोन नदी का तापमान करीब 28 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है।

फ्रांस में हालात लगातार बेकाबू होते जा रहे हैं। गर्मी से राहत पाने के लिए जो लोग नदियों, झीलों और अन्य जलाशयों में उतर रहे हैं, उनमें से कई हादसों का शिकार हो रहे हैं। अब तक करीब 40 लोगों की डूबने से मौत हो चुकी है, जिनमें ज्यादातर युवा शामिल हैं।

भीषण गर्मी को देखते हुए फ्रांस में 1,350 से ज्यादा स्कूल बंद करने पड़े हैं। इसी दौरान देश में होने वाला प्रसिद्ध संगीत उत्सव “फेट डे ला म्यूजिक” भी कई प्रतिबंधों के बीच आयोजित किया जा रहा है। सरकार ने सार्वजनिक स्थानों पर शराब पीने पर रोक लगा दी है। प्रशासन को आशंका है कि तेज गर्मी के बीच शराब का सेवन लोगों के स्वास्थ्य पर और बुरा असर डाल सकता है।

फ्रांस की मौसम एजेंसी मेटियो फ्रांस का कहना है कि मौजूदा हालात अगस्त 2003 जैसी स्थिति की याद दिला रहे हैं। उस समय फ्रांस में 16 दिनों तक भीषण गर्मी पड़ी थी और करीब 15,000 लोगों की मौत हो गई थी। इसे यूरोप के इतिहास की सबसे घातक हीटवेव में से एक माना जाता है।

ब्रिटेन की बात करें तो यहां बुधवार को तापमान 39 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया। यदि यही स्थिति बनी रही तो जून महीने का राष्ट्रीय रिकॉर्ड 35.6 डिग्री सेल्सियस टूट सकता है। ब्रिटेन के मौसम विभाग ने बुधवार और गुरुवार के लिए रेड एक्सट्रीम हीट वार्निंग जारी की है। ऐसी चेतावनी तब जारी की जाती है, जब गर्मी लोगों के स्वास्थ्य, परिवहन व्यवस्था और आवश्यक सेवाओं पर असर डालने लगती है।

ब्रिटेन के लिए चिंता की एक और बात यह है कि रात का न्यूनतम तापमान भी 20 डिग्री सेल्सियस से नीचे नहीं जा रहा है। मौसम विज्ञान की भाषा में इसे “ट्रॉपिकल नाइट्स” कहा जाता है।

स्पेन में भी हालात गंभीर बने हुए हैं। यहां कई इलाकों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चल रहा है। कुछ क्षेत्रों में तो रविवार रात से सोमवार सुबह तक तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से नीचे ही नहीं गया।

जर्मनी में भी गर्मी से जुड़े हादसे बढ़ रहे हैं। पिछले एक सप्ताह में नदी और झीलों में नहाने के दौरान पांच लोगों की मौत हो चुकी है। बवेरिया की झीलों में दो युवकों की मौत हुई है, जबकि बाल्टिक सागर में एक महिला के डूबने की खबर सामने आई है।

बेल्जियम का मौसम विभाग चेतावनी दे रहा है कि यह देश के इतिहास की सबसे भीषण गर्मी साबित हो सकती है। वहीं इटली में भी सरकार बढ़ते तापमान को लेकर चिंतित है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने रोम और मिलान समेत 15 शहरों के लिए रेड अलर्ट जारी किया है।

अब सवाल यह है कि आमतौर पर ठंडे रहने वाले यूरोप में इतनी भीषण गर्मी क्यों पड़ रही है?

विशेषज्ञों के मुताबिक, इसकी एक बड़ी वजह “ओमेगा ब्लॉक” है। यह एक ऐसी मौसमीय स्थिति होती है जिसमें हवा का सामान्य प्रवाह बाधित हो जाता है। इसकी वजह से “हीट डोम” बनता है। इसका मतलब है कि गर्म हवा किसी क्षेत्र के ऊपर फंस जाती है और बाहर नहीं निकल पाती। नतीजतन कई दिनों तक तापमान लगातार बढ़ता रहता है। यूरोप में मौजूदा हीटवेव का प्रमुख कारण भी यही माना जा रहा है।

इसके अलावा एक और वजह भी है। प्रशांत महासागर में ला नीना की स्थिति विकसित हो रही है जिसका असर वैश्विक मौसम पर पड़ सकता है। जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के लगातार इस्तेमाल से धरती का औसत तापमान बढ़ रहा है। यही कारण है कि हीटवेव जैसी घटनाएं पहले की तुलना में ज्यादा बार और ज्यादा तीव्रता के साथ देखने को मिल रही हैं।

यूरोप में एयर कंडीशनर की कम उपलब्धता भी लोगों की मुश्किलें बढ़ा रही है। आंकड़ों के अनुसार, यूरोप में केवल करीब 20% घरों में एयर कंडीशनर लगे हैं, जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा 90% से अधिक है। यही वजह है कि भीषण गर्मी के दौरान यूरोपीय देशों के लोगों को ज्यादा कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।