चीन ने 6 जुलाई को अपनी समुद्र आधारित लंबी दूरी की अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) का परीक्षण किया। यह अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में सबमरीन आधारित बैलिस्टिक मिसाइल का उसका पहला परीक्षण था।

खबरों के मुताबिक, लेटेस्ट टेस्टिंग मिसाइल को दक्षिण चीन सागर में तैनात पीएलए नौसेना की जिन-श्रेणी टाइप 094 पनडुब्बी से लॉन्च किया गया था। इसमें एक नकली परमाणु बम लगा था जिसने 7300 किलोमीटर की दूरी तय की। बताया जाता है कि यह फिलीपींस के ऊपर से उड़ते हुए दक्षिणी प्रशांत महासागर में जा गिरी। यह नकली परमाणु बम दक्षिण प्रशांत परमाणु-मुक्त क्षेत्र में गिरा।

चीन के मिसाइल टेस्ट की खासियत

ज्यादा जानकारी उपलब्ध न होने के कारण यह निर्धारित करना बेहद मुश्किल है कि चीन की यह मिसाइल जू लैंग 2 (JL-2) थी या लेटेस्ट जू लैंग 3 (JL-3)। ऐसा इसलिए है क्योंकि JL-2 और JL-3 दोनों ही पनडुब्बी से दागी जाने वाली आईसीबीएम हैं, जिन्हें क्रमशः DF-31 और DF-41 के साथ संयुक्त रूप से विकसित किया गया है। आईसीबीएम की मारक क्षमता आम तौर पर कम से कम 5000 किमी होती है और JL-2 8000-9000 किमी की दूरी तय करने में सक्षम है जबकि JL-3 की मारक क्षमता कथित तौर पर 9000 किमी से अधिक है।

दोनों डिलीवरी सिस्टम चीन की मौजूदा टाइप 094 एसएसबीएन (बैलिस्टिक मिसाइलों से लैस परमाणु-संचालित पनडुब्बियां) के साथ जोड़े जा सकते हैं। इस वारहेड द्वारा तय की गई दूरी के आधार पर, यह सटीक रूप से निर्धारित करना मुश्किल है कि किस डिलीवरी सिस्टम का उपयोग किया गया था।

यह संभावना है कि चीन ने दो बार परीक्षण किया हो या कोई वैकल्पिक मार्ग अपनाया हो। ऐसा इसलिए क्योंकि अन्य देशों की तरह चीन भी मिसाइल परीक्षण या सैन्य अभ्यास से पहले नेविगेशन चेतावनी जारी करता है। इस बार जारी चेतावनी में संकेत दिया गया है कि वे दो परीक्षण मार्गों पर विचार कर रहे थे। पहला, दक्षिण चीन सागर से दक्षिणी प्रशांत महासागर की ओर प्रक्षेपण करना और दूसरा, उत्तर-पूर्व में बोहाई सागर से जापान के ऊपर से प्रशांत महासागर में प्रस्तावित प्रक्षेपण। एक अनुमान यह है कि दूसरा मार्ग तनाव बढ़ाने वाला साबित होगा जिससे चीन को पहला मार्ग चुनने के लिए मजबूर होना पड़ा होगा।

चीन अभी मिसाइल परीक्षण क्यों कर रहा?

इस दशक की शुरुआत से और विशेष रूप से पिछले दो वर्षों में चीन ने कई मिसाइल साइलो (Silos) का निर्माण किया है। इसके अतिरिक्त, इसने 2025 की सैन्य परेड में नई और उन्नत परमाणु वितरण प्रणालियों का प्रदर्शन किया और 2024 में प्रशांत महासागर में एक भूमि-आधारित आईसीबीएम परीक्षण किया। चीन चाहता है कि दुनिया, खासतौर पर अमेरिका उसकी बढ़ती परमाणु क्षमताओं पर ध्यान दे। इन विकासों का श्रेय चीन द्वारा अपने परमाणु त्रिशूल (भूमि, समुद्र और वायु के माध्यम से परमाणु हथियार पहुंचाने की क्षमता) के निर्माण का प्रदर्शन करने के प्रयासों को दिया जा सकता है।

इन घटनाक्रमों को चीन द्वारा परमाणु ढाल बनाने, महाशक्ति का दर्जा हासिल करने या हिंद-प्रशांत क्षेत्र में परमाणु प्रभुत्व को बेहतर बनाने के प्रयासों के लिए भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

क्या चीन की परमाणु नीति में बदलाव आया है?

चीन की घोषित परमाणु रणनीति में परमाणु हथियारों का पहले प्रयोग न करने की नीति, सुनिश्चित जवाबी कार्रवाई, परमाणु हथियार रहित राज्यों या परमाणु हथियार मुक्त क्षेत्रों में परमाणु हथियारों का उपयोग न करना या उपयोग की धमकी न देना आते हैं। इनमें कोई बदलाव नहीं आया है। हालांकि, चीन ‘न्यूनतम परमाणु प्रतिरोध’ की नीति का समर्थन करता है लेकिन हालिया बदलावों से संकेत मिलता है कि चीन अपने न्यूनतम परमाणु प्रतिरोध के दृष्टिकोण से पीछे हट रहा है। उदाहरण के लिए, चीन 2030 तक लगभग 1,000 परमाणु हथियार हासिल कर सकता है। वह अपनी परमाणु कमान, नियंत्रण और संचार प्रणालियों को बढ़ा रहा है।

भारत सहित इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के लिए इसके क्या मतलब हैं?

हालिया परीक्षण भारत और चीन के परमाणु शस्त्रागार और प्रक्षेपण क्षमताओं के बीच गुणात्मक और मात्रात्मक दोनों ही दृष्टियों से बढ़ते रणनीतिक अंतर को और पुष्ट करता है। हालांकि भारत ने अरिहंत श्रेणी की एसएसबीएन मिसाइलों को सक्रिय करके अपने परमाणु त्रिशूल को क्रियाशील कर लिया है लेकिन उसकी वर्तमान सबमरीन लॉन्च बैलिस्टिक मिसाइलों (SLBM) की मारक क्षमता कम है।

चीन के इस प्रदर्शन ने भारत के लिए अपनी लंबी दूरी की K-5 और K-6 मिसाइलों को तैनात करने की आवश्यकता को और बढ़ा दिया है ताकि दूसरे हमले में उत्तरजीविता के मामले में बराबरी सुनिश्चित की जा सके। चीन के हालिया परमाणु आधुनिकीकरण के संदर्भ में देखा जाए तो यह दक्षिण एशिया को परमाणु हथियारों की होड़ में धकेल देगा।

इसके अलावा, दक्षिण चीन सागर के क्षेत्र से जेएल मिसाइल के प्रक्षेपण के साथ चीनी पनडुब्बियों के पकड़े जाने का खतरा कम हो गया है। इसलिए, भारत को कम से कम हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमताओं और समुद्र तल की जानकारी का विस्तार करने की आवश्यकता है।

क्या अमेरिका को चीन के मिसाइल टेस्ट से डरना चाहिए?

अमेरिका और बाकी दुनिया के लिए, यह प्रक्षेपण चीन के परमाणु त्रिशूल के परिपक्व होने और उसकी उन्नत प्रतिरोधक क्षमताओं का प्रत्यक्ष प्रदर्शन था। हालांकि अमेरिका को चीन के परमाणु आधुनिकीकरण की जानकारी काफी समय से थी लेकिन इस परीक्षण ने अमेरिकी मिसाइल डिफेंस सिस्टम को काफी जटिल बना दिया है और उसे अपना ध्यान और संसाधन मध्य पूर्व से हटाकर पूर्वी एशिया पर केंद्रित करने के लिए बाध्य किया है। इसके अलावा, यह अमेरिका को चीनी तटरेखा और दक्षिण चीन सागर के करीब अधिक संसाधन, विशेष रूप से उन्नत पनडुब्बी रोधी युद्ध और निगरानी क्षमताएं तैनात करने के लिए भी मजबूर करता है।

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अमेरिका के हवाई राज्य से लास वेगास जा रही Southwest Airlines की एक फ्लाइट को उड़ान भरने के करीब 90 मिनट बाद बीच रास्ते से वापस लौटना पड़ा। विमान ने प्रशांत महासागर के ऊपर उड़ान के दौरान अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन संकेत (डिस्ट्रेस सिग्नल) जारी किया। इसके बाद उसे डैनियल के.इनोए अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा (Daniel K. Inouye International Airport) की ओर मोड़ दिया गया। खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें

(सुयश देसाई एक पॉलिटिकल साइंटिस्ट हैं और फिलाडेल्फिया स्थित विदेश नीति अनुसंधान संस्थान में फेलो हैं।)