पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में एक बार फिर अशांति का माहौल है। वहां बड़े पैमाने पर हिंसा हुई है। हिंसा में 27 लोगों की मौत हो गई और 200 से ज्यादा लोग घायल हो गए। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में हुई इस ताजा हिंसा के बाद पाकिस्तान की हुकूमत और वहां की सेना पर मानवाधिकार कार्यकर्ता सवाल उठा रहे हैं।

पीओके के प्रशासन का कहना है कि कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए पुलिस की कार्रवाई जरूरी थी।

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि मुजफ्फराबाद, रावलकोट, पुंछ, मीरपुर और नीलम घाटी में इंटरनेट सेवाएं और मोबाइल नेटवर्क बाधित हैं।

हिंसा की इस ताजा घटना के पीछे कई वजहें हैं। एक वजह यह है कि पीओके की सरकार ने हाल ही में संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) पर प्रतिबंध लगा दिया। जेएएसी का गठन 2023 में हुआ था और यह कश्मीर के लोगों के लिए ज्यादा राजनीतिक अधिकार दिए जाने और शरणार्थियों के लिए आरक्षित सीटों को समाप्त करने की मांग करता है। इसके अलावा भी कई मुद्दों पर पीओके की सरकार से टकरा चुका है। जेएएसी कमेटी का कहना है कि हिंसा में मरने वाले की संख्या 35 तक पहुंच गई है।

पिछले साल भी पीओके में बिजली के बढ़े हुए बिल और आटे की बढ़ती कीमतों के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे, जिनमें तीन पुलिस अफसरों समेत कम से कम नौ लोगों की जान गई थी और सैकड़ों घायल हुए थे।

पीओके का इलाका काफी संवेदनशील है। पाकिस्तान ने इस पर कब्जा किया हुआ है। पिछले कुछ सालों में यहां लगातार जेएएसी के समर्थकों और सुरक्षा बलों के बीच झड़प हो चुकी है और इसमें बड़ी संख्या में आम लोगों के साथ ही पुलिस अफसरों की भी जान गई है।

पीओके में स्थानीय लोगों के हितों की अनदेखी का आरोप, सरकार के खिलाफ नाराजगी जैसे कई मुद्दों को लेकर माहौल तनावपूर्ण है। जेएएसी की ओर से 9 जून को बंद का आह्वान किया गया था लेकिन इससे पहले ही पुलिस ने इस संगठन पर प्रतिबंध लगाने के अलावा कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया।

जेएएसी की ओर से गेहूं और बिजली पर सब्सिडी देने की मांग सहित 38 सूत्री मांगें हुकूमत के सामने रखी गई थीं। पिछले साल कमेटी के प्रतिनिधियों, अफसरों और पाकिस्तान की सरकार के बीच हुई बातचीत के बाद 36 मांगों को मान भी लिया गया था। पीओके के प्रधानमंत्री फैसल मुमताज राठौर ने का कहना था कि बची हुई दोनों मांगों पर वह कमेटी के प्रतिनिधियों से बातचीत के लिए तैयार हैं।

इन बची हुई दो मांगों में से एक मांग यह है कि शरणार्थियों के लिए आरक्षित सीटों को खत्म किया जाए और सरकारी अफसरों-मंत्रियों को दिए जाने वाले फायदों को भी समाप्त किया जाए। सरकार का कहना है कि इन दोनों पर ही विधानसभा के द्वारा किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

जेएएसी पर प्रतिबंध के अलावा हिंसा की इस ताजा घटना के पीछे एक वजह यह भी है कि पीओके के सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि पाकिस्तान में रहने वाले कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटें संविधान के द्वारा संरक्षित हैं। अदालत ने यह भी कहा कि इन्हें बिना संवैधानिक संशोधन के खत्म नहीं किया जा सकता। यह सीटें उन लोगों के लिए आरक्षित रखी गई हैं जो कई दशकों पहले पाकिस्तान आए थे।

हिंसा की घटनाओं को लेकर न सिर्फ पीओके बल्कि कश्मीरियों प्रवासियों ने ब्रिटेन, अमेरिका और कुछ अन्य देशों में प्रदर्शन किए हैं। प्रवासी संगठनों ने आरोप लगाया है कि पाकिस्तान की सरकार और वहां की सेना लोगों की आवाज को दबाने की कोशिश कर रही है और उन्होंने पीओके में हो रहे घटनाक्रमों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय से ध्यान देने की मांग की है। उन्होंने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के घरों पर छापे मारने, प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने का मुद्दा उठाया है।

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