अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को कहा कि ईरान के साथ हुआ अस्थायी युद्धविराम अब “खत्म” हो गया है। यह बयान दोनों देशों के बीच फिर बढ़ी सैन्य गतिविधियों के बाद आया। हालांकि, ट्रंप ने यह भी कहा कि बातचीत का रास्ता अभी खुला रहेगा। साथ ही उन्होंने ईरान को कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी।

यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब दोनों देशों के बीच 60 दिन के अस्थायी समझौते के बाद स्थायी शांति समझौते की कोशिश चल रही है। लेकिन लगातार हो रहे हमले और जवाबी हमले इस प्रक्रिया को कमजोर कर रहे हैं। ईरान ने बहरीन और कुवैत में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इससे पहले अमेरिका ने टैंकरों पर हुए हमलों के जवाब में ईरानी ठिकानों पर हमला किया था।

यह वही घटनाक्रम दोबारा देखने को मिला जो 26 और 27 जून को भी हुआ था। उस समय ईरान ने उन व्यावसायिक जहाजों की आवाजाही रोकने की कोशिश की जो उसके साथ तालमेल के बिना होर्मुज जलमार्ग से गुजर रहे थे। इसके जवाब में अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने ईरानी ठिकानों पर बमबारी की और ईरान ने बहरीन और कुवैत में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया।

हमलों का यह सिलसिला दोनों देशों के बीच नाजुक युद्धविराम को खतरे में डाल रहा है। साथ ही 18 जून के समझौता ज्ञापन (MoU) को स्थायी शांति समझौते में बदलने की बातचीत पर भी असर डाल रहा है।

हालांकि ट्रंप के बुधवार के बयान से अनिश्चितता बढ़ गई है, लेकिन उन्होंने बातचीत की गुंजाइश छोड़ी है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी प्रतिनिधि बातचीत जारी रख सकते हैं। लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा, “वे बात कर सकते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि वे अपना समय बर्बाद कर रहे हैं।”

ट्रंप इससे पहले भी ईरान को लेकर कई बार कड़े बयान देने के बाद पीछे हट चुके हैं। लेकिन इस बार उनके बयान के बाद तेल की कीमतों में तेजी आई और शेयर बाजारों में गिरावट दर्ज की गई। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, बाद में नाटो नेताओं की बैठक के दौरान ट्रंप ने अस्थायी समझौता खत्म होने वाली बात दोहराई नहीं। लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच तनाव की वजह सिर्फ ये हमले नहीं हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा मुद्दा है — होर्मुज जलमार्ग का भविष्य।

होर्मुज जलमार्ग को लेकर क्यों बढ़ रहा है विवाद?

MoU के अनुच्छेद 5 के अनुसार, होर्मुज जलमार्ग के लंबे समय के प्रबंधन का फैसला ईरान और ओमान मिलकर करेंगे। यह फैसला अंतरराष्ट्रीय कानून और जलमार्ग से जुड़े तटीय देशों के संप्रभु अधिकारों के अनुसार होगा। 23 जून तक ईरान और ओमान ने संयुक्त रूप से एक कार्य समूह बनाने की घोषणा कर दी थी। इसका उद्देश्य जलमार्ग के भविष्य के संचालन को लेकर सहमति बनाना है।

यह व्यवस्था ईरान के उस उद्देश्य को पूरा करती है जिसमें वह चाहता है कि होर्मुज जलमार्ग युद्ध से पहले वाली स्थिति में वापस न लौटे। हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया में ओमान की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। अब तक ओमान ने जलमार्ग में किसी तय शुल्क व्यवस्था का विरोध किया है, क्योंकि ऐसा शुल्क United Nations Convention on the Law of the Sea (UNCLOS) के अनुच्छेद 26 के तहत प्रतिबंधित है।

इसके बजाय ऐसी व्यवस्था बनाई जा रही है जिसमें जहाजों से संभावित सेवाओं के बदले भुगतान लिया जा सकता है। UNCLOS के अनुच्छेद 43 की उदार व्याख्या के तहत यह संभव है। हालांकि ईरान और ओमान के बीच यह मतभेद बना हुआ है कि यह भुगतान स्वैच्छिक होगा या अनिवार्य। इससे यह साफ है कि होर्मुज के लंबे समय के प्रबंधन की व्यवस्था धीरे-धीरे तैयार हो रही है। लेकिन असली विवाद इसके तत्काल संचालन को लेकर है।

असली टकराव अस्थायी व्यवस्था पर है

MoU के अनुसार, ईरान को 60 दिनों तक सभी व्यावसायिक जहाजों को बिना किसी शर्त के गुजरने देना है। अमेरिका इसका मतलब यह निकालता है कि जहाजों को ईरानी अधिकारियों के साथ किसी तरह का तालमेल करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

US Iran conflict, Trump Iran ceasefire, Strait of Hormuz crisis
होर्मुज जलमार्ग

इसी सोच के आधार पर अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) की अगुवाई में अमेरिका और ओमान के समर्थन वाली एक योजना बनाई गई थी। इसमें व्यावसायिक जहाजों और फंसे हुए जहाजों के बचाव के लिए ओमान के पानी से होकर एक अस्थायी दक्षिणी मार्ग और ईरान के लारक द्वीप के पास एक उत्तरी मार्ग बनाने की बात थी। लेकिन होर्मुज के मुख्य यातायात मार्ग अभी भी खदानों की सफाई के इंतजार में बंद हैं।

25 जून को ईरान ने उन जहाजों पर हमला किया जो दक्षिणी मार्ग से गुजर रहे थे और ईरान के साथ तालमेल नहीं कर रहे थे। इसके बाद अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ गया। 28 जून को ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि ईरान होर्मुज के लिए किसी “नए या अलग इंतजाम” को स्वीकार नहीं करेगा। उसका कहना था कि वही व्यवस्था लागू होनी चाहिए जिस पर पहले से बातचीत चल रही है।

यही वजह है कि होर्मुज का भविष्य तो काफी हद तक तय दिखाई देता है, लेकिन अगले कुछ महीनों की व्यवस्था को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। ईरान के लिए होर्मुज अब उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत बन चुका है। वह नहीं चाहता कि कोई अस्थायी व्यवस्था भी उसके प्रभाव को कम करे।

वहीं अमेरिका चाहता है कि 60 दिनों की बातचीत के दौरान जहाजों की आवाजाही पूरी तरह स्वतंत्र रहे। यही अंतर बातचीत को मुश्किल बना रहा है। इसके चलते 60 दिनों की अवधि आगे भी खिंच सकती है और होर्मुज में जहाजों की आवाजाही प्रभावित रह सकती है।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के आंकड़ों के अनुसार, मई-जून में होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों का सात दिन का औसत 6 से 12 के बीच रहा। जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह संख्या 104 से 115 थी।

इराक और लेबनान में भी दिख रहा असर

होर्मुज को लेकर विवाद भले ही अस्थायी हो, लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच भरोसे की कमी बहुत गहरी है। ईरान को लगता है कि अमेरिका उसके क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करने की कोशिश करता रहेगा। इसलिए तेहरान लगातार यह सुनिश्चित करना चाहता है कि वॉशिंगटन MoU की शर्तों से पीछे न हटे।

अमेरिका भी चाहता है कि वह क्षेत्रीय घटनाओं को इस तरह प्रभावित करे जिससे ईरान को लंबे समय में मिलने वाले फायदे कम किए जा सकें। इसका असर इराक और लेबनान जैसे देशों में दिखाई दे रहा है। इराक में अमेरिका की मौजूदगी कम होने और ईरान समर्थित पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज (PMF) के प्रभाव के कारण ईरान का प्रभाव मजबूत बना हुआ है।

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पिछले महीने लेबनान में हुए इजराइली हवाई हमले की जगह। (Image Source: AP)

हालांकि अमेरिका अभी भी इराक के साथ अपने संबंधों का इस्तेमाल कर सकता है। 15 जून को अमेरिकी दूत टॉम बैरक ने इराक यात्रा के दौरान नए प्रधानमंत्री अली अल-जैदी से ईरान समर्थित हथियारबंद समूहों के खिलाफ कदम उठाने को कहा था। 28 जून को ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची की इराक यात्रा के दौरान बगदाद ने कई वरिष्ठ नेताओं और अधिकारियों के खिलाफ आधी रात में कार्रवाई की। इनमें कई लोग तेहरान से करीबी संबंध रखने वाले बताए गए।

लेबनान में भी स्थिति तनावपूर्ण है। ईरान चाहता है कि इजरायल युद्धविराम का पालन करे। लेकिन 26 जून के फ्रेमवर्क समझौते में इजरायल की वापसी को हिज्बुल्लाह के निरस्त्रीकरण से जोड़ा गया है। हिज्बुल्लाह ने इसे खारिज किया है और कहा है कि जब तक दक्षिण लेबनान पर इजरायली कब्जा जारी रहेगा, वह हथियार नहीं छोड़ेगा।

लेबनानी सरकार ने समझौते को समर्थन तो दिया है, लेकिन उसके पास इसे लागू कराने की क्षमता सीमित है। इससे वहां फिर से हिंसा बढ़ने का खतरा बना हुआ है।

बार-बार हो रहे हमलों का मतलब क्या है?

अमेरिका और ईरान के बीच लगातार हो रहे हमले दोनों देशों के बीच अविश्वास को बढ़ा रहे हैं। हालांकि दोनों पक्ष बातचीत जारी रखने के लिए तैयार दिखते हैं, लेकिन वे एक-दूसरे की स्थिति कमजोर करने के लिए दबाव की रणनीति अपना रहे हैं। खाड़ी देश भी इस नई स्थिति के अनुसार अपनी रणनीति बदल रहे हैं।

कतर ने 18 जून को घोषणा की कि वह 2022 के एक समझौते को आगे बढ़ाएगा, जिसके तहत ईरान के साउथ पार्स और कतर के नॉर्थ फील्ड गैस भंडारों को जोड़ने की योजना है। इससे ईरान को कतर के बिजली नेटवर्क से 1,000 मेगावाट तक बिजली ट्रांसमिशन क्षमता मिल सकती है।

वहीं सऊदी अरब कथित तौर पर “खाड़ी-ईरान सुलह शिखर सम्मेलन” की मेजबानी की तैयारी कर रहा है। ओमान, कतर और सऊदी अरब ईरान के साथ बातचीत और संबंध सुधारने की नीति अपना रहे हैं। जबकि बहरीन, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात की नीति ईरान के प्रति ज्यादा सतर्क रही है।

ईरान को लगता है कि अमेरिका उसके बढ़ते क्षेत्रीय प्रभाव को रोकने की कोशिश करेगा। जवाब में तेहरान भी अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए कदम उठाएगा। यही स्थिति आने वाले समय में सीमित सैन्य झड़पों, कड़े बयानों और धमकियों को जन्म दे सकती है। इसलिए MoU के बाद और अंतिम समझौते से पहले का समय बेहद संवेदनशील रहने वाला है।

संभव है कि अमेरिका और ईरान के बीच छोटे स्तर के हमले और तनाव जारी रहें। लेकिन इनका मुख्य उद्देश्य पूर्ण युद्ध नहीं, बल्कि बातचीत में अपनी स्थिति मजबूत करना हो सकता है।

(लेखक नई दिल्ली स्थित काउंसिल फॉर स्ट्रैटेजिक एंड डिफेंस रिसर्च में सीनियर रिसर्च एसोसिएट हैं।)

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अमेरिका ने बुधवार को ईरान पर एक बार फिर बड़े पैमाने पर सैन्य हमले शुरू किए। अमेरिकी सेना का कहना है कि इन हमलों का मकसद हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना है। अमेरिकी सेना की मध्य-पूर्व कमान (CENTCOM) ने बताया कि ये हमले ईरान की उस सैन्य क्षमता को कमजोर करने के लिए किए जा रहे हैं जिससे वह इस अहम समुद्री मार्ग को खतरे में डाल सकता है। ईरान पर अतिरिक्त अमेरिकी हवाई हमलों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कड़ा संदेश देते हुए कहा कि अमेरिका हर हमले का कई गुना ताकत से जवाब देगा। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक