अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ शुरू किया गया सैन्य अभियान अब खत्म हो चुका है। लगभग चार महीने बाद दोनों पक्ष पाकिस्तान की मध्यस्थता में युद्ध समाप्त करने पर सहमत हो गए हैं। 19 जून को स्विट्जरलैंड के जिनेवा में एक वर्चुअल हस्ताक्षर समारोह के जरिए शांति समझौते को अंतिम रूप दिए जाने की योजना है। हालांकि युद्ध खत्म होने के बावजूद सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि आखिर इस संघर्ष में जीत किसकी हुई।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई बार इस अभियान को अमेरिका और इजरायल की पूर्ण जीत बताया है। लेकिन इंडिपेडेंट एनालिसिस इस दावे को पूरी तरह सही नहीं मानते। पीबीएस न्यूजआवर की फैक्ट-चेक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका और इजरायल ने युद्धक्षेत्र में महत्वपूर्ण सफलताएं हासिल कीं।

अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) के अधिकारियों ने कांग्रेस को बताया कि ईरान के मिसाइल, ड्रोन और नौसैनिक रक्षा उद्योग के 80 प्रतिशत से अधिक हिस्से को नष्ट या क्षतिग्रस्त कर दिया गया। इसके बावजूद विश्लेषकों का कहना है कि इसे “पूर्ण जीत” कहना सही नहीं होगा क्योंकि युद्ध के बाद ईरान की स्थिति कुछ मामलों में मजबूत हुई है।

एक विश्लेषक ने पीबीएस से कहा कि ईरान अब प्रभावी रूप से होर्मुज जलमार्ग (Strait of Hormuz) का “गेटकीपर” बन गया है। यह वही समुद्री मार्ग है जिससे सामान्य परिस्थितियों में दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस की आपूर्ति गुजरती है। विश्लेषकों के मुताबिक, इससे ईरान को लंबे समय तक आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव मिला है, जो युद्ध से पहले उसके पास नहीं था।

समझौते को लेकर भी बनी हुई हैं असहमतियां

ट्रंप ने हफ्ते के आखिर में कहा था कि समझौते पर रविवार तक हस्ताक्षर हो सकते हैं और इसके बाद होर्मुज जलमार्ग सभी जहाजों के लिए तुरंत खोल दिया जाएगा। हालांकि सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार यूरोप में प्रस्तावित आमने-सामने के हस्ताक्षर समारोह को रद्द कर दिया गया है और उसकी जगह इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर की व्यवस्था की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस बदलाव की एक बड़ी वजह ट्रंप का फ्रांस में होने वाले जी7 शिखर सम्मेलन से जुड़ा यात्रा कार्यक्रम था।

सीएनएन ने यह भी बताया कि अमेरिका और ईरान अभी भी समझौते की शर्तों को लेकर अलग-अलग सार्वजनिक बयान दे रहे हैं। विशेष रूप से ईरान को मिलने वाली वित्तीय राहत के मुद्दे पर दोनों देशों के दावे अलग हैं। अधिकारियों का कहना है कि यह साफ नहीं है कि यह सिर्फ सार्वजनिक संदेश देने की रणनीति है या फिर वास्तव में कोई बड़ा मतभेद अब भी मौजूद है।

पाकिस्तान कैसे बना मध्यस्थ?

एक साल पहले तक पाकिस्तान की सेना को लेकर अमेरिका में शक का माहौल था। रॉयटर्स के अनुसार, पाकिस्तान की सैन्य नेतृत्व को लंबे समय से आतंकवादी ठिकानों और परमाणु प्रसार से जुड़े आरोपों के कारण अमेरिकी अविश्वास का सामना करना पड़ रहा था। लेकिन अब पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर अमेरिका और ईरान के बीच सबसे महत्वपूर्ण मध्यस्थों में शामिल हो गए हैं।

इस बदलाव की शुरुआत जून 2025 में हुई, जब ट्रंप ने व्हाइट हाउस में असीम मुनीर के साथ एक असामान्य वन-टू-वन लंच बैठक की थी। उस समय अमेरिका यह विचार कर रहा था कि क्या उसे ईरान पर इजरायली हमलों में शामिल होना चाहिए। उसी दौरान पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने संकेत दिया था कि इस्लामाबाद सीधे तेहरान के संपर्क में है और दोनों पक्षों के बीच संदेश पहुंचाने को तैयार है।

फरवरी 2026 के आखिर में युद्ध शुरू होने के बाद पाकिस्तान की भूमिका और बढ़ गई। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से सीधे बातचीत कर तनाव कम करने की कोशिश की। वहीं गल्फ न्यूज के अनुसार असीम मुनीर ने ट्रंप से भी बातचीत की, खासकर उस समय जब अमेरिका ने एक प्रस्तावित सैन्य हमले को टाल दिया था।

अप्रैल तक पाकिस्तान ने दो सप्ताह का युद्धविराम कराने में मदद की, जिसे बाद में बढ़ाया गया। इस दौरान इस्लामाबाद में वार्ता भी आयोजित हुई। मई में असीम मुनीर दो बार तेहरान गए और उन्होंने तुर्की व मिस्र के साथ मिलकर अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के बीच अप्रत्यक्ष संवाद कायम रखने में भूमिका निभाई।

हालांकि अमेरिका में पाकिस्तान की इस भूमिका पर सवाल भी उठे। रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने पाकिस्तान पर भरोसा करने को लेकर चिंता जताई और अपुष्ट दावों का हवाला दिया कि ईरानी सैन्य विमानों को पाकिस्तानी ठिकानों पर शरण दी गई थी। इसके बावजूद ट्रंप ने बार-बार शहबाज शरीफ और असीम मुनीर की तारीफ करते हुए कहा कि उनका काम “बिल्कुल शानदार” रहा है।

युद्ध में कौन जीता?

इस सवाल का जवाब अलग-अलग पक्ष अलग तरह से दे रहे हैं। ट्रंप का कहना है कि अमेरिका और इजरायल ने निर्णायक जीत हासिल की। दूसरी ओर ईरानी अधिकारियों ने, जिन्होंने अप्रैल में पहले युद्धविराम पर सहमति दी थी, इस परिणाम को अमेरिका और इजरायल की “ऐतिहासिक और करारी हार” बताया है।

स्वतंत्र विश्लेषकों की राय भी एक जैसी नहीं है। अधिकांश का मानना है कि लगभग सभी पक्षों को किसी न किसी रूप में नुकसान हुआ है।
‘द वीक’ द्वारा प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय टिप्पणियों के एक संकलन में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को संघर्ष का सबसे बड़ा राजनीतिक नुकसान उठाने वाला नेता बताया गया। रिपोर्ट के अनुसार वे ईरान के परमाणु कार्यक्रम को निष्क्रिय करने के अपने लंबे समय से घोषित लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाए और युद्ध के बाद इजरायल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहले से अधिक अलग-थलग दिखाई दिया।

कई विश्लेषकों ने ट्रंप के बारे में भी इसी तरह का निष्कर्ष निकाला। उनका कहना है कि अमेरिका ईरान में शासन परिवर्तन नहीं करा सका और होर्मुज जलमार्ग पर ईरान की प्रभावी पकड़ इस युद्ध का सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक परिणाम बन गई।

सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) के विश्लेषण के अनुसार अमेरिका के लक्ष्य कई थे, जैसे – ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म करना और यहां तक कि शासन परिवर्तन कराना भी। जबकि ईरान का मुख्य उद्देश्य केवल इतना था कि उसकी सरकार युद्ध के बावजूद बनी रहे। CSIS का कहना है कि अब तक ईरान अपना यह प्रमुख लक्ष्य हासिल करने में सफल रहा है।

‘न्यूज वीक’ की 100-दिवसीय एनालिसिस में भी इसी तरह का निष्कर्ष निकाला गया। रिपोर्ट के अनुसार ईरान की पारंपरिक सैन्य क्षमता को गंभीर नुकसान पहुंचा है, लेकिन इस्लामिक गणराज्य की सत्ता कायम है और उसने होर्मुज जलमार्ग पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल संभावित समझौते की शर्तों को प्रभावित करने के लिए किया है।

कई आकलनों के अनुसार युद्ध के सबसे बड़े लाभार्थी वे देश हैं जो सीधे लड़ाई में शामिल नहीं थे। इनमें चीन का नाम सबसे ऊपर है। ऐसा इसलिए क्योंकि वह होर्मुज जलमार्ग से गुजरने वाले तेल का बड़ा खरीदार है और ईरान की बढ़ी हुई रणनीतिक भूमिका से उसे लाभ मिल सकता है। दूसरा नाम पाकिस्तान का है, जिसकी सैन्य नेतृत्व ने इस संकट का उपयोग अमेरिका के साथ अपने संबंधों को फिर से मजबूत करने के लिए किया।

भारत के लिए क्या मायने?

विश्लेषकों का मानना है कि भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलू पाकिस्तान का एक भरोसेमंद अमेरिकी मध्यस्थ के रूप में उभरना है। ऐसे समय में जब वर्षों तक वॉशिंगटन ने इस्लामाबाद से दूरी बनाए रखी थी, पाकिस्तान की यह नई भूमिका क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में एक उल्लेखनीय बदलाव मानी जा रही है।

हालांकि, सभी विशेषज्ञ युद्ध को जीत-हार के नजरिए से नहीं देखते। सेंटर फॉर इंटरनेशनल पॉलिसी की एक टिप्पणी में कहा गया कि जियो पॉलिटिक्स जीत और हार की बहस के बीच ईरान के आम नागरिकों की पीड़ा को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। महीनों तक चली बमबारी और संघर्ष का सबसे बड़ा असर आम लोगों पर पड़ा, जिन्होंने इस युद्ध की सबसे भारी कीमत चुकाई।

यह भी पढ़ें – अमेरिका-ईरान में हुआ शांति समझौता, फिर खुलेगा होर्मुज जलमार्ग, ट्रंप ने किया ऐलान

अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता हो गया है। दोनों ही देश लगभग 4 महीने से चल रहे संघर्ष को समाप्त करने पर सहमत हो गए हैं। बीते दिनों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई बार कहा था कि अमेरिका और ईरान समझौते के करीब हैं। पूरी खबर पढ़ें…